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सत्ता की चाबी इनके पास है

Sat, 18 May 2013 03:04 PM IST
अरुण नेहरू
अरुण नेहरू Updated Sat, 18 May 2013 03:04 PM IST
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they have key of power

मीडिया का यह रवैया देखने लायक है कि पहले तो वह विवाद पैदा करता है, फिर समाधान सुझाता है, और जब सरकार कोई पहल करती है, तो उसका श्रेय खुद ले लेता है। सबको समझना चाहिए कि हमारी व्यवस्था में किसी भी तरह की ज्यादती स्वीकार्य नहीं है। आम आदमी हमेशा ही सरकार से आगे की सोचता है।

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राजनीतिक ज्यादती की सजा तो नेताओं को मतपत्रों के जरिये मिल जाती है, लेकिन न्यायिक अति सक्रियता निकट भविष्य में व्यापक पारदर्शिता एवं जवाबदेही की मांग करेगी। फिलहाल सबसे जरूरी यह है कि कोई भी सांविधानिक संस्था अपनी लक्ष्मणरेखा पार न करे।
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चूंकि सभी कानून का राज चाहते हैं, इसलिए लगता है कि नीति-नियंताओं का 95 फीसदी सुधार का समर्थन करेगा। यदि आप अतीत पर नजर डालें, तो पाएंगे कि निहित स्वार्थों को हटाने की कोशिश होने पर शासन के सभी अंगों ने स्वयं ही पहल की।
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यह पहले भी कहा जा चुका है कि संकट के क्षणों में विभिन्न संस्थानों को बचाने में उच्चतर न्यायपालिका की अहम भूमिका होगी। उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालयों के कई विद्वान न्यायाधीशों ने निचली अदालतों से संबंधित कई मामलों पर अपनी नाराजगी जाहिर की है और यथाशीघ्र जरूरी कार्रवाई की है।

निचली अदालतों पर से लोगों का भरोसा उठता गया है, यह इससे भी स्पष्ट है कि पिछले एक वर्ष में ही निचली अदालतों में जहां मुकदमों की संख्या घटी है, वहीं उच्चतर न्यायपालिकाओं पर मुकदमों का बोझ बढ़ गया है। तथ्य यह है कि शासन के तीनों अंगों में जवाबदेही के एक समान मानकों के बिना व्यवस्था में स्थिरता संभव नहीं है, क्योंकि वैसे में कोई भी संतुलन बिगाड़ देगा।

हमें विभिन्न मसलों पर शांति के साथ विचार कर सावधानीपूर्वक कदम उठाने की जरूरत है, क्योंकि दुनिया में काफी कुछ बदल रहा है। इस देश का सामूहिक विवेक कुछ चुने हुए लोगों या वोट के जरिये हम पर शासन करने वाले मुट्ठी भर नेताओं में निहित नहीं है, बल्कि वह देश की 90 फीसदी जनता में निहित है।

संकट के क्षणों में भी जनता की अच्छाई बची रहती है। अभी हम संकट में नहीं हैं, लेकिन लगातार नकारात्मक चीजों के जरिये उसे पैदा कर रहे हैं। हर कोई एक-दूसरे पर आरोप मढ़कर खुद को पाक-साफ साबित करने की कोशिश कर रहा है।

लोकसभा चुनाव की जो स्थिति कुछ महीने पहले थी, वह पूरी तरह बदल गई है, क्योंकि कांग्रेस हिमाचल प्रदेश एवं कर्नाटक विधानसभा का चुनाव जीत गई है, जबकि भाजपा केवल गुजरात का गढ़ बचा पाई। इसमें भी कोई शक नहीं कि लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी पिछली बार की 16 सीटों में दो-तीन सीटों की और बढ़ोतरी कर लेंगे, लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस को व्यापक फायदा होगा और उसे हिमाचल प्रदेश में भी जीतना चाहिए।

लोकसभा चुनाव में भाजपा भी बड़ी जीत का दावा कर सकती है, लेकिन मुश्किल यह है कि शीर्ष स्तर के विवाद ने ही उसका रास्ता बाधित किया है। इसका ज्वलंत उदाहरण कर्नाटक है, जहां भाजपा आलाकमान को समस्या मालूम थी, लेकिन वह उचित कार्रवाई करने में अक्षम रहा। इसके बावजूद उसे बेहतर नतीजे की उम्मीद थी, पर आम आदमी ने कांग्रेस का समर्थन किया। नतीजे के बाद मुख्यमंत्री पद पर सिद्धरमैया का चयन भी बिना किसी हंगामे के हो गया।

आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 130 से 140 सीटें मिल सकती हैं, जबकि भाजपा को 120 से 125 सीटें। जैसा कि जाहिर ही है, चुनावी जंग में धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता का मुद्दा जीवंत रहेगा। तमाम क्षेत्रीय दल भावी गठबंधन के लिए कांग्रेस और भाजपा की ओर देख रहे हैं। वस्तुतः अन्नाद्रमुक और बीजद को छोड़कर सभी क्षेत्रीय दल दबाव में हैं। फिर भी मुझे यकीन है कि क्षेत्रीय ताकतें लोकसभा की 250-270 सीटें जीतेंगी।

राजस्थान में वसुंधरा राजे की सक्रियता दिखी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वहां भाजपा आगे है,लेकिन कांग्रेस भी चुनावी धमाके से बाज नहीं आएगी। लिहाजा वहां कांटे की टक्कर की उम्मीद की जा सकती है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राजस्थान में अपना जनाधार खो दिया था और कांग्रेस की 20 सीटों की तुलना में उसे बस पांच सीटें मिली थीं। मध्य प्रदेश में भाजपा की 16 सीटों की तुलना में 13 सीटें जीतकर कांग्रेस बहुत पीछे नहीं थी। हां, छत्तीसगढ़ में भाजपा ने जरूर 11 सीटों में से 10 जीत लीं। इसी तरह कांग्रेस ने दिल्ली की सभी सात सीटें जीती थीं।

बिहार में पिछले दिनों हमने राजद द्वारा आयोजित विशाल परिवर्तन रैली देखी। लगता है कि लालू यादव बेहतर स्थिति में रहेंगे। इसी तरह ममता बनर्जी हावड़ा लोकसभा उपचुनाव और जुलाई में होने वाले पंचायत चुनाव में अपनी खोई जमीन पाने की पुरजोर कोशिश करेंगी। पर माकपा भी वहां हर एक सीट के लिए कड़ी टक्कर देगी।


पाकिस्तान में हुआ चुनाव सफल रहा, जिसका पूरा श्रेय वहां की जनता को जाता है, जिन्होंने फिर से एक लोकतांत्रिक सरकार को मौका दिया है। वहां नई सत्ता व्यवस्था को क्रमिक ढंग से अपनी जगह बनाने देना बेहतर है। अगले प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने हमारे प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर एक सही संकेत दिया है और हमारी ओर से भी उन्हें आमंत्रित करने का फैसला भी उचित है। भाजपा के जसवंत सिंह और यशवंत सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेताओं ने स्वाभाविक ही इसका स्वागत किया है। जाहिर है, हम भविष्य में अच्छे दिनों की उम्मीद कर सकते हैं।

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