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उन्हें विरोध पसंद नहीं

Mon, 24 Oct 2016 07:26 PM IST
क्षमा शर्मा
क्षमा शर्मा Updated Mon, 24 Oct 2016 07:26 PM IST
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They do not like conflict
क्षमा शर्मा

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता पिछले कुछ दिनों से बीमार हैं। उनके समर्थक तरह-तरह से उनके ठीक होने की प्रार्थना कर रहे हैं। कोई रात-दिन पूजा में लगा है, तो किसी ने अपने पूरे शरीर में कीलें ठुकवा ली हैं। लोग जान देने पर भी उतारू हैं। अपनी नेता की स्वास्थ्य की कामना अच्छी बात है। मगर अब तक आठ लोग सिर्फ इसलिए पकड़े जा चुके हैं कि वे जयललिता के स्वास्थ्य को लेकर मजाक कर रहे थे, या उन्होंने कुछ उलटा-पुलटा लिख दिया। अट्ठाईस वर्षीय युवक को फेसबुक पोस्ट पर पकड़ा गया। ऐसे ही एक बैंक कर्मचारी और एक दूसरे आदमी के खिलाफ एक नाराज महिला ने सिर्फ इसलिए एफआईआर कर दी कि वे जयललिता की बीमारी को लेकर कुछ मजाक कर रहे थे। उन दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसी तरह दो लोगों को इसलिए पकड़ा गया कि वे अम्मा के स्वास्थ्य को लेकर अफवाहें फैला रहे थे।

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एक तरफ अदालतें कहती हैं कि अगर आप किसी नेता के खिलाफ कुछ बोल रहे हैं या देश के खिलाफ नारे लगा रहे हैं, तब भी इसे देशद्रोह नहीं माना जा सकता। दूसरी तरफ नेताओं को लेकर इस तरह का व्यवहार कि कोई कुछ कह भर दे कि उसे मारने-पीटने और गिरफ्तार कराने की धमकी मिलने लगती है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और उनके समर्थकों ने भी यही माहौल बना रखा है। कार्टून बनाने भर से एक प्रोफेसर को पकड़ लिया जाता है। हाल ही में एक लड़की ने ममता बनर्जी के खिलाफ कुछ कह दिया, तो तृणमूल के लोग उसकी जान के पीछे पड़ गए। गौरतलब है कि बाल ठाकरे की मृत्यु पर भी शिवसेना के हाथों दो लड़कियों को इसी तरह की आफत झेलनी पड़ी थी।
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अगर नेताओं से इस बात की शिकायत की जाए, तो वे बड़ी मासूमियत से कहते हैं कि उनके समर्थक यदि ऐसा कर रहे हैं, तो वे क्या करें। दरअसल नेताओं को यह बात बहुत अच्छी लगती है कि उनके बिना कहे ही उनके समर्थक मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। इसे वे अपनी लोकप्रियता समझते हैं। ऐसे में लोकतंत्र और अपनी बात को कहने की आजादी की याद किसी को नहीं आती। लेकिन वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि आज आप नेता हैं, तो लोग आपके लिए ऐसा कर रहे हैं। लेकिन कल जब वक्त बदल जाएगा, तब कोई और नेता होगा और उसके समर्थक भी ऐसा करेंगे। समर्थन के नाम पर हिंसा और मारपीट को बढ़ावा देना, कानून हाथ में लेना कहां तक ठीक है। लोकतंत्र के वेश में उस तरह की तानाशाही को निमंत्रण देना है, जहां सिर्फ नेता सही होता है, बाकी सब लोग गलत होते हैं। यह एक प्रकार से अघोषित आपातकाल है, जहां बोलने भर से आप अपराधी साबित किए जा सकते हैं।
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देखा यह गया है कि महिलाएं भी पद पाते ही पुरुषों की तरह ही नहीं, बल्कि उनसे भी खराब व्यवहार करने लगती हैं। यह कैसा लोकतंत्र है, जहां डंडे और धमकी के बल पर लोगों से अपनी बात मनवाने की कोशिश की जाती है? वैसे जब चुनाव होते हैं, तब यही नेता लोकतंत्र की हजार कसमें दिन-रात खाते हैं। मगर चुनाव जीतते और पद प्राप्त करते ही हर वायदे की तरह हर शपथ भी भुला दी जाती है। देखने वाली बात यह है कि जिन हिंदी भाषी क्षेत्रों को हिकारत की नजर से देखा जाता है, वहां शायद ही किसी नेता को लोग भगवान की तरह पूजते हैं। बल्कि जिसे सिर पर उठाया है, उसे उतारने में भी वे वक्त नहीं लगाते।

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