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अच्छी नहीं हैं ऐसी घटनाएं
तवलीन सिंह
Updated Sun, 04 Oct 2015 07:28 PM IST
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जब से लोगों ने हंगामा मचाना शुरू किया मुंबई में गोश्त की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने को लेकर, तब से चिंता रही है मुझे कि इस हंगामे का परिणाम बुरा होगा। मुंबई में भाजपा की सरकार ने इस पर यह कहकर प्रतिबंध लगाया कि जैन समुदाय के पर्यूषण पर्व के दौरान उनकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कसाई घरों को बंद रखा जाना चाहिए। वहीं से शुरू हुआ सिलसिला और शीघ्र ही इस प्रतिबंध ने आंदोलन का रूप धारण कर लिया। नतीजतन अन्य राज्यों में भी गोश्त की बिक्री पर प्रतिबंध लगने लगा।
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इसे सांप्रदायिक मुद्दा बनते देर न लगी, और कश्मीर से कन्याकुमारी तक धीरे-धीरे तनाव का एक माहौल बनता चला गया। इस तनाव को बढ़ाने में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भी हाथ था, क्योंकि दोनों समुदायों के कट्टरपंथी लोगों को वहां अपनी बात रखने का मौका दिया गया। फिर राजनेता भी इन बहसों में हिस्सा लेने लगे। वहां उन्होंने कई उल्टी-सीधी बातें भी कहीं, जो नहीं कहनी चाहिए थीं।
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माहौल बिगड़ता गया, तनाव बढ़ता गया दोनों कौमों के बीच देश भर में। और पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश में दादरी के बिसाहड़ा गांव में इकलाख और उसके बेटे को भीड़ ने इस कदर पीटा कि पिता की मौत हो गई, जबकि बेटे को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस घटना के बाद पुलिस और पत्रकार जब उस गांव में पहुंचे, तो पता लगा कि हत्यारों ने इकलाख की जान एक अफवाह के आधार पर ली। अगर पिछले कुछ समय से माहौल को बिगाड़ने की कोशिश न की जाती, तो शायद इकलाख न मरता।
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इकलाख की हत्या की खबर उन देशों में भी फैल गई, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दौरे में निवेशकों को भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे थे कि भारत अब इतना आधुनिक देश बन गया है कि हम गांव-गांव में डिजिटल क्रांति लाने के लिए तैयार हैं। विदेशों में भारत का सिर ऊंचा करना नरेंद्र मोदी अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन उनके किए-कराए पर अब इस हत्या का साया पड़ गया है।
नुकसान जो होना था, वह तो हो गया है। लेकिन प्रधानमंत्री अगर चाहते हैं कि और नुकसान होने से रोका जाए, तो जरूरी है कि वह अपने सांसदों और विधायकों को यह सख्त निर्देश दें कि वे सांप्रदायिक वक्तव्य देना बंद करें। दादरी की घटना पर कई राजनेताओं ने गलत किस्म के बयान दिए हैं। भाजपा के स्थानीय नेता तो महापंचायत बुलाकर आरोपी युवाओं को रिहा करवाने की बात कर रहे थे। भाजपा के सिर्फ एक नेता तरुण विजय ने साफ शब्दों में कहा कि इस हत्या से सबसे ज्यादा नुकसान प्रधानमंत्री को हुआ है। काश कि यही बात भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं से भी सुनने को मिलता, ताकि स्पष्ट हो जाता देश और दुनिया के सामने कि इस तरह की हत्याएं भारत की परंपरा में नहीं हैं। ये देश को शर्मिंदा करती हैं।
काश कि प्रधानमंत्री ने उस समय कुछ बोला होता, जब उनके अपने मुख्यमंत्री गोश्त पर प्रतिबंध लगाने लगे थे। इस तरह के प्रतिबंध प्रधानमंत्री की उस घोषणा के विपरीत हैं, जिसके तहत वह देश में बदलाव लाना चाहते हैं। वह इसलिए कि परिवर्तन, विकास, आधुनिकता, समृद्धि उन देशों में नहीं आती हैं, जहां जंगल राज होता है। ये चीजें वहां आती हैं, जहां कानून-व्यवस्था मजबूत होती है, और जहां इकलाख जैसे व्यक्ति बेमौत नहीं मारे जाते।