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जी, नोट भी हैं और नोटा भी
सहीराम
Updated Tue, 05 Nov 2013 07:58 PM IST
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एक बार फिर चुनाव के दिन आए हैं। ये दिन ऐसे ही आते हैं, जैसे आए दिन बहार के। इन दिनों सब नेता अच्छी-अच्छी बातें करने लगते हैं। कोई कड़वा नहीं बोलता। विरोधी के लिए बेशक बोलते हों, पर जनता के लिए तो कतई नहीं बोलते। सब मीठा-मीठा बोलते हैं। हालांकि बताते हैं कि कई बार छुरी भी मीठी होती है। कई बार लगता है कि चलो, हमारे भी दिन फिरे। बताते हैं कि बारह बरस में तो घूरे के भी दिन फिरते हैं। पर इस मायने में हमारी बस्ती, हमारी सड़कें वगैरह घूरे से अच्छी होती है कि उनके दिन पांच साल में फिर जाते हैं।
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तो जी, अगर ये चुनाव के दिन हैं, तो नोटों के दिन भी हैं। इन दिनों में नेता बहुत कुछ बांटते हैं। चुनाव की आचार संहिता लागू होने से ऐन पहले तक धड़ाधड़ स्कीमें बांटते हैं। योजनाएं बांटते हैं। रिबन काटते हैं। उसके बाद वायदे बांटते हैं। उनके पास सभी तरह के वायदे मिलते हैं। फिर ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आते हैं, वे शराब और मुर्गा बांटने लगते हैं। नोट बांटने लगते हैं। तमिलनाडु के चुनाव के बाद से अब हर चुनाव में गाड़ियां भर-भर नोट मिलने लगे हैं। जब करोड़ों पकड़े जाते हैं, तो करोड़ों बंटते भी जरूर होंगे। क्योंकि जितनी शराब पकड़ी जाती है, उससे ज्यादा बंट भी जाती है। कानून और व्यवस्था वाले न शराब पूरी पकड़ पाते हैं, न ही नोट।
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इसीलिए तो नेताओं के वे वीडियो अक्सर टीवी खबरों में दिख जाते हैं, जिनमें वे नोट बांटते पाए जाते हैं। जी, आप हमेशा यही क्यों सोचते हैं कि सीडियां और वीडियो क्लिपिंग्स सिर्फ अभिनेत्रियों की फिल्मों जैसी ही होती होंगी। वीडियो क्लिपिंग्स नोट बांटने वाली भी होती हैं और वे वैसी शर्मिंदगी भी पैदा नहीं करती। बल्कि वे तो गर्व का विषय हो सकती हैं। वे तो दानवीर होने का प्रमाण होती हैं और हमारे समाज में दानवीरों को कभी शर्मिंदगी के साथ नहीं देखा जाता।
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खैर जी, चुनाव आए हैं, तो ये जरूर नोट बंटने के भी दिन हैं। पर देखिए इन्हीं दिनों में चुनाव आयोग नोटा ले आया। मतलब अब आप वोट देने जाएं, तो जरूरी नहीं कि किसी को वोट देकर ही आएं। बल्कि आप वोटिंग मशीन का कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं वाला बटन भी दबा सकते हैं। तो जी एक तरफ नोट हैं- लहराते हुए, उड़ते हुए, बंटते हुए और दूसरी तरफ नोटा है। पसंद अपनी-अपनी। नोट भी ले सकते हैं और बिना नोट के भी वोट दे सकते हैं। नहीं तो नोटा तो है ही।