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दुश्मनी और दोस्ती में जल्दबाजी ठीक नहीं

Sun, 28 Jun 2020 07:54 AM IST
Alok Mehta आलोक मेहता
Updated Sun, 28 Jun 2020 07:54 AM IST
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There is no hurry in hostility and friendship
भारत-चीन सीमा विवाद - फोटो : Amar Ujala

भारत के दूरदर्शी संपादक-विचारक राजेंद्र माथुर ने 1963 में अपने अखबार में लिख दिया था, 'अगर ज्ञात सबूतों के आधार पर ही विचार किया जाए तो यह प्रतीत होता है कि भारत के प्रति चीन का रवैय्या धीरे-धीरे अधिक सख्त और बदनीयत होता गया है। तिब्बत में बगावत के बाद उसने भारत को जो चिट्ठियां लिखीं, वे इतनी जहरीली और गर्वभरी थीं कि दोस्त क्या दुश्मन देश भी एक दूसरे को नहीं लिखा करते। शायद तभी से चीन ने निर्णय ले लिया था कि वह भारत को चैन से नहीं बैठने देगा।' वह बहुत सही साबित होते रहे हैं।


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1962 से अब तक चीन कि कोशिश रही है कि लद्दाख और अरुणाचल की सीमाओं पर वह घुसपैठ की कोशिशें करता रहे, ताकि जब भी बातचीत का अवसर आए, तब वह अपने पत्तों को तुरुप का पत्ता बना या दिखा सके। फिर भी भारत हमेशा धैर्य के साथ शांति, सद्भाव, कूटनीति अपनाते हुए दृढ़ता के साथ संबंध एवं टकराव से निपटता रहा। लद्दाख में इस बार उसने लंबे अर्से के बाद घातक घुसपैठ की कोशिश की, जिसे भारत की बहादुर सेना ने नाकाम करने के साथ करारा जवाब भी दे दिया। इसलिए अब चीन की ही पहल पर बातचीत का सिलसिला शुरू होने पर मशीन से गर्म पानी करके चाय या कहवा बना लेने जैसे परिणाम की अपेक्षा और दिन-रात सवाल पूछने का औचित्य नहीं है। हिमालय में बर्फ पिघलने के लिए उचित समय की प्रतीक्षा अच्छी होती है।

असल में भारत में तपस्या-प्राणायाम की संस्कृति पर गौरव के बावजूद लोकतंत्र में भी सामान्य जन या राजनीतिक दल भी चमत्कार चाहते हैं। अभी हमारे सैनिक कहां पहुंचे, चीन के कितने सैनिक किस निशान तक कितने हाथियों के साथ हैं। हम भूल जाते हैं कि क्रिकेट के खेल प्रदर्शन से कुछ घंटों या दिनों में अरबों रुपयों की कमाई हो जाती है, लेकिन दुनिया के दस से भी कम देशों में यह लोकप्रिय है। अमेरिका और चीन तो मैदान में उतरने के इच्छुक तक नहीं रहते। हां, सामरिक और कूटनीति में वे दूरगामी योजनाएं बनाकर मैदान में उतरते हैं। अब भारत को लोहे से इस्पात या कुछ और बनाने के लिए आग पर लोहा पीटने एवं गर्म पानी से ठंडा करने का आधुनिक तरीका आ गया है।

शरद पवार और नरेंद्र मोदी जैसे नेता कबड्डी खेल के दांव-पेच सीखते हुए सत्ता की राजनीति में सफलता से ऊंचाइयों पर पहुंचे हैं। 1993 में चीन के साथ हुए ऐतिहासिक समझौते के समय शरद पवार कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार के रक्षा मंत्री थे। इसलिए फिलहाल भाजपा सरकार के घोर राजनीतिक विरोधी होते हुए भी उन्होंने लद्दाख में हुए सैन्य टकराव पर एक भी कटु शब्द कहने के बजाय सरकार और सेना के कदमों का समर्थन किया। ममता बनर्जी तक ने बहुत परिपक्वता से भारत के कदमों का साथ दिया। लेकिन गांधी, नेहरू और लोहिया समर्थक कांग्रेस, समाजवादी दलों ने बेहद गैर जिम्मेदाराना ढंग से बयानबाजी कर देश-दुनिया को भ्रमित करने और एक हद तक भारत को नीचे दिखाने के प्रयास किए।

अपने देश में प्रगतिशील कहलाने वाले ऐसे नामी लोग हैं, जो कश्मीर को ही आजाद करने का मतलब पाकिस्तान को सौंप देने या पहले कभी अक्साई चिन को चीन के सुपुर्द कर शांति कायम हो सकने की सलाह देने में भी संकोच नहीं करते। सोचिए, यह बात तो गांव का सामान्य भला आदमी भी नहीं कहेगा और सुनकर लड़ने लग जाएगा। जहां तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को गुजरात में झूले पर बिठाकर बात करने या छह साल में अठारह बार मिलने की बात है, तो राजनीति से अधिक कूटनीति को गहराई से समझने वाले इसे उचित मानेंगे।

नेहरू, शास्त्री, इंदिरा, राजीव, राव, देवेगौड़ा, अटल, मनमोहन के सत्ता काल में चीन, अमेरिका, पाकिस्तान से कितने गंभीर तनाव के दौर में भी क्या सद्भाव सौजन्य से बातचीत नहीं हुई, युद्ध के बावजूद समझौते नहीं हुए? परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका और उसके मित्र देशों के प्रतिबंधों के बाद भी देर सबेर आर्थिक व्यापारिक संबधों को नहीं बढ़ाया गया। जो पार्टी या नेता अमेरिका,चीन, पाकिस्तान तक से जाने अनजाने सहायता, अनुदान ले लेते हैं, विदेशी मेहमानों का सत्कार करने में नहीं चूकते, उनसे कम से कम सुरक्षा के मामलों में अधिक संयम से बोलने, काम करने की अपेक्षा रहती है।

बहरहाल, इस समय तनाव के साथ सैन्य और राजनयिक स्तर पर वार्ताएं शुरू हुई हैं। ये महीने भर या उससे भी अधिक चल सकती हैं। दूसरी तरफ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यदि चीन अपनी तैनाती बढ़ाता है, तो भारतीय सेना भी तो अपनी संख्या, सड़क, हथियार इत्यादि को अपने अधिकार क्षेत्र में बढ़ाकर रखती रहेगी। मूल समझौता तो इसी बात का है। ज्यादा चिंता तो चीन को है, क्योंकि हाल में लद्दाख-जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक प्रशासनिक ढांचे में बदलाव के साथ भारत सरकार ने पाकिस्तान कब्जाए कश्मीर और अक्साई चिन को नक्शे में अपने अधिकार का दिखा दिया है।

चिन से लगे सिंगकियांग के लोप नौर में चीन का परमाणु परीक्षण केंद्र भी है। इसीलिए उसने अभी पाकिस्तान को भी सीमा पर अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने का हुक्म दिया है। पाक अधिकृत कश्मीर आज नहीं तो कल यानी आने वाले किसी भी वर्ष में भारत का होने वाला है। संभव है, हम चीन को उसकी बनाई सड़कों के रस्ते बंद न करें। लेकिन यह तय है कि धैर्य और उचित समय का ध्यान रखने पर इस बार तुरुप के पत्ते भारत की सेना और सरकार के पास रहेंगे।

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