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भुवनेश्वर यानी हिंदी के बर्नाड शॉ
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सांकेतिक तस्वीर
भुवनेश्वर की बिखरी स्मृतियों की तलाश और उनके रचनाकर्म की चर्चा वहां भी नहीं होती, जो जगहें उनकी हालाते-जिंदगी की चश्मदीद गवाह थीं। जन्म उनका शाहजहांपुर में हुआ और वह मरे कहां, यह ठीक-ठीक किसी को अब तक पता नहीं। एक गुमनाम मौत उनकी जिंदगी की खतौनी में लापरवाही से दर्ज कर दी गई। वर्ष 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्षीय संबोधन में प्रेमचंद ने भुवनेश्वर और जैनेंद्र का जिक्र किया था। तब ये दोनों नए रचनाकार थे। प्रेमचंद ने कहा था कि जैनेंद्र में दुरूहता और भुवनेश्वर में कटुता कम हो, तो इनका भविष्य उज्ज्वल है।
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भुवनेश्वर के नाटकों का संग्रह कारवां जब छपा, तो वह उन्हें ख्याति के बहुत ऊंचे पायदान पर ले गया। हिंदी में एब्सर्ड (असंगत) नाटकों का यह प्रस्थान बिंदु मान लिया जाने लगा। भानु भारती ने एक समय कहा भी था कि जब उन्होंने भुवनेश्वर के नाटक तांबे के कीड़े पर काम करना शुरू किया, तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि आखिर 1946 में जब विश्व रंगमंच पर ऑयनोस्की और बैकेट का आगमन नहीं हुआ था, तो भुवनेश्वर द्वारा ऐसे नाटकों की परिकल्पना करना कितना आश्चर्यजनक है। छोटे कद, उलझे और बिखरे हुए बाल, मैला-सा पुराना कुर्ता-पायजामा, पैरों में साधारण-सी चप्पल और उंगलियों में सुलगी हुई बीड़ी फंसाए इसी मामूली आदमी ने अपनी प्रतिभा के बल पर हिंदी नाटकों के एक युग का सूत्रपात किया था। निर्दय और कटु सत्य के इसी लेखक ने गांधीवाद को नकारा भी और साम्यवाद को इस देश की समस्याओं का हल बताया।
उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ में काम भी किया। अपने शुरुआती दौर यानी 1930 के आसपास उन्हें गांधी में आस्था भी थी। भुवनेश्वर अपने नाटकों में स्वतंत्रता जैसे चिर-प्रतीक्षित पर्व को ‘गुलामी और परतंत्रता की जय’ के नाम से स्मरण करते हैं, क्योंकि वह जानते थे कि आजादी परतंत्रता की वजह से है। आजादी से मोहभंग या विद्रोह तो नितांत परवर्ती स्वर है, पर भुवनेश्वर उसे उतने पहले जान-समझ गए थे। भुवनेश्वर नए नाटक की जमीन लेकर हिंदी की दुनिया में धमाके के साथ उपस्थित हुए थे।
उन्होंने नाटकों को नई भाषा और अभिव्यक्ति दी। उनके नाटक दर्शकों को भी नाटक में हिस्सेदारी करने के लिए उकसाते हैं। उनके एक नाटक ऊसर में एक पात्र कहता है, ‘मेरा जिंदगी का एटीट्यूड बिल्कुल मुख्तलिफ है। तुम अपने सोशलिज्म-ओशलिज्म के जोश में शायद यह समझ बैठे हो कि जिंदगी का गहरे से गहरा मतलब तुम्हारे लिए साफ हो गया है, जैसे कोई बड़ा सर्कसी घोड़ा तुम्हारे काबू में आ गया, पर जिंदगी अगर इस तरह लटके और फॉर्मूले में बांधी जा सकती, तो आज तक कब की खत्म हो जाती।’
उन्होंने करीब दर्जन भर कहानियां भी लिखीं, जिनमें भेड़िये सबसे ऊपर है। अपने जीवनकाल में ही भुवनेश्वर तथाकथित भद्र समाज के लिए चुनौती बन गए थे। उन्हें कई लोग ‘बोहेमियन’ के तौर पर याद करते हैं। रामविलास शर्मा ने उन्हें ‘न्यूरोटिक’ कहा, तो शमशेर ने उनके लिए नवाब, गिरहकट, ‘विट’ लिखा है। नवाब यानी जेब खाली, लेकिन आदतें रईसों जैसी। रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' ने एक बार कहा था कि ‘न जाने क्यों भुवनेश्वर को यह गिला रहता था कि वह साहित्य-जगत में अस्वीकृत होने और ठोकर खाते हुए मिटते जाने के लिए ही लेखक बने हैं।’
भुवनेश्वर की इसी संवेदनशीलता ने उन्हें जीवन के अंतिम दिनों में आदमी भी नहीं रहने दिया। उन्होंने इलाहाबाद या बनारस में कहीं फुटपाथ या किसी टिन शेड के नीचे ठंड से दम तोड़ दिया। लोग फर्क नहीं कर सके कि वह किसी भिखारी की मृत्यु थी अथवा हिंदी के बर्नाड शॉ की क्षमता रखने वाले साहित्यकार भुवनेश्वर की। भुवनेश्वर की नियति पर रघुवर सहाय की टिप्पणी सर्वाधिक सटीक है, 'उनके साथ समाज ने जो किया, वह सच बोलने और सच्चे होने की ऐसे समाज द्वारा दी गई सजा थी, जो अपने को गुलामी से निकालकर आजाद होने के विरुद्ध था।
सच बोलने की ऐसी हरकतों पर समाज का एक आक्रमक वर्ग कभी-कभी बहुत प्रकट सजाएं भी देता है। जो विरोधी भड़ककर एक बार उग्र हो उठता है, उसे वह सबके सामने दबा डालता है। जिन्हें आंखों से दिख जाता है कि किसी को नष्ट किया जा रहा है, उन्हें बताया जाता है कि उग्र होना सही नहीं है। जो लेखन में उग्र नहीं होते, परंतु जिनका रुख आत्मसमर्पण का नहीं होता, उन्हें धीरे-धीरे भूखा-प्यासा रखकर मारा जाता है और मारने के लिए कुछ मूल्यों की रक्षा को बहाना बनाया जाता है।
मालूम यही होता है कि किसी-किसी प्रतिभा को यथास्थितिवादी समाज सूंघकर पहचान लेता है कि इसमें असहमति का तत्व है। उसकी रचनाओं में वह थोड़ा झलकता भी होगा, पर अकेले लेखक के बूते का फिर भी नहीं है कि समाज में अपनी रचनाएं समझने का वातावरण पैदा करे, यह तो उसी के जैसे असहमत लोगों के सहयोग से हो सकता है। भुवनेश्वर को यह सहयोग मिला जरूर, पर सपाट सहमति के पक्ष में ज्यादा ताकतें काम कर रही थी।
भुवनेश्वर निपट अकेले थे-इतने अकेले कि उनके पाठक भी प्रायः उन्हीं के जैसे अकेले हो गए। किसी लेखक को भुला दिए जाने का कारण यही पाठक का अकेले हो जाना है। लेखक तो अकेला होता ही है, तभी वह लिखता है, पर जब व्यवस्था के षड्यंत्र उसके पाठकों को अकेला कर देते हैं, तब भुवनेश्वर जैसी मौतें होती हैं।’