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लोकतांत्रिक शासन की ताकत

Tue, 14 Aug 2018 05:48 PM IST
मृदुला मुखर्जी, इितहासकार
मृदुला मुखर्जी, इितहासकार Updated Tue, 14 Aug 2018 05:48 PM IST
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The power of democratic governance
स्वतंत्रता दिवस
देश की आजादी की 72वीं वर्षगांठ हमारे लिए उल्लास का अवसर है। जब देश आजाद हुआ था, तब उसके साथ विभाजन, सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन की पीड़ा भी जुड़ी हुई थी। इस संकट के समाधान में लंबा वक्त लगा। फिर भी घाव पूरी तरह भर नहीं पाए। इन सबके बावजूद एक नवोदित राष्ट्र के तौर पर हम जल्दी ही उठ खड़े हुए। 1950 में हमने संविधान लागू किया और उसके एक साल बाद हमने पहले आम चुनाव की तैयारियां भी शुरू कर दी थीं। विशाल जनसंख्या, अशिक्षा, अकाल आदि कई चुनौतियां नए बने राष्ट्र की परीक्षा ले रही थीं।

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इन सबके बीच नागरिक स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, समान मताधिकार, निष्पक्ष चुनाव और लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना जैसी उपलब्धियां कम नहीं थीं। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कृषि और उद्योग, दोनों को समान महत्व दिया और नई संस्थाओं के निर्माण और उनकी स्वतंत्रता व स्वायत्तता बनाए रखने में गहरी रुचि दिखाई। बीती सदी के पचास और साठ के दशक में आजाद हुए दूसरे देशों की ओर देखें, तो हम पाते हैं कि उनका प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। यही बताता है कि तुलनात्मक रूप से भारत की उपलब्धि कितनी बड़ी थी।

इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू करने का फैसला हमारे लोकतंत्र को ही पीछे ले जाने जैसा था। आपातकाल ने हमें डराया, विचलित किया। लेकिन हममें यह शक्ति थी कि हम उस काले दौर से बाहर निकल पाए। आपातकाल हटने के बाद चुनाव हुए और लोकतंत्र की गाड़ी फिर आगे बढ़ने लगी। लोकतांत्रिक शासन ने हमारी राजनीतिक व्यवस्था को स्वच्छ व पारदर्शी बनाने की दिशा में ही काम नहीं किया, बल्कि इस बीच हमने विविध क्षेत्रों में कई उपलब्धियां भी हासिल कीं। अन्न संकट दूर करने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत हुई।

उन्नत बीजों, रासायनिक उर्वरक और सिंचाई के जरिये अनाज उत्पादन में बढ़ोतरी होने लगी। वर्ष 1991 में नई आर्थिक नीति लागू करने के बाद देश में उच्च आर्थिक वृद्धि संभव हुई। उद्योगों में सार्वजनिक क्षेत्र के समानांतर निजी क्षेत्र को तरजीह मिलने का लाभ हुआ। लोगों की आय बढ़ी, पर नई अर्थनीति से असमनाताएं भी बढ़ीं। महज एक फीसदी धनी लोगों का देश के 58 फीसदी संसाधनों पर कब्जा है। इस असमानता को दूर करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। चुनौतियां और भी हैं, जैसे सामाजिक सद्भाव का ताना-बाना कमजोर पड़ रहा है। अब एक नए किस्म का राष्ट्रवाद उभर रहा है।

हमारे प्रचलित मूल्यों और स्थापित राष्ट्र नायकों को हटाकर नई तरह की सोच और नए नायक खड़े करने की कोशिश हो रही है। राष्ट्रवाद का जो आदर्श स्वतंत्रता संग्राम के दौर में था, उससे यह अलग है। राष्ट्रवाद के साथ बहुलतावाद, सबकी सुरक्षा और समृद्धि जुड़ी है। लेकिन यह ऐसा राष्ट्रवाद है, जो तोड़ता है, जिसमें नॉन स्टेट ऐक्टर्स को महत्व मिल रहा है और धार्मिक अल्पसंख्यक निशाना बन रहे हैं। 

भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। सैन्य शक्ति के मामले में हम चौथे पायदान पर हैं। बेशक देश की बड़ी आबादी को गरीबी रेखा से ऊपर लाने में सफलता मिली है, पर अब भी बहुत कुछ करना बाकी है। हमारा विकास असमान विकास है। दक्षिण के राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव विकास के दूसरे क्षेत्रों में जैसी सफलता हासिल की है, उत्तर भारत को उससे सीखना चाहिए। सबकी समृद्धि और सबके विकास पर ही देश का विकास निर्भर है। इन सबके बावजूद देश और इसकी जनता पर मुझे पूरा भरोसा है। पहले की तरह हम तमाम मुश्किलों से पार पा जाएंगे।
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