हमने लोकपाल क्यों बनाया
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सरकार ने ढोल-नगाड़ों के साथ लोकपाल बिल को कानून तो बना दिया, पर इसे अमल में लाने में कई दिक्कतें आ रही हैं। इस बात को गंभीरता से महसूस करना चाहिए कि आखिर सर्वोच्च न्यायालय के जाने-माने वकील फली एस नरीमन और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के टी थॉमस ने सर्च कमेटी में शामिल होने से इन्कार क्यों किया। दोनों न्यायाधीशों ने अपने-अपने तर्क में यह बात सामने रखी है कि ऐसी सर्च कमेटी का स्वरूप दिखावटी है, उसे किसी भी तरह के अधिकार नहीं दिए गए हैं। सरकार का कार्मिक एवं प्रशासनिक विभाग सर्च कमिटी को एक सूची मुहैया कराएगा, जिसमें से कुछ नाम उसे छांटने होंगे। मजे की बात यह कि सिलेक्शन कमेटी उसी सूची में से कोई नाम चुने, यह जरूरी नहीं। यानी सारे अधिकार प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष, लोकसभाध्यक्ष और न्यायिक प्रतिनिधियों वाली सिलेक्शन कमेटी के पास ही है। फिर सर्च कमेटी का औचित्य ही क्या रह जाता है? ऐसी स्थिति में अगर दो प्रख्यात न्यायविदों को इस कमेटी से जुड़ना वक्त गंवाने जैसा लगता है, तो इसे समझा जा सकता है।
लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक के पारित होने के बाद आम लोगों के मन में यह भाव आया कि भ्रष्टाचार को कुंद करने के लिए हमने कानूनी हथियार ईजाद कर लिया है। देर से ही सही, देश की संसद ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक महत्वपूर्ण विधेयक पारित किया है। लेकिन इतने भर से अगर समाधान निकल जाता, तो देश के कानूनों ने बहुत कुछ बदल दिया होता। लोकपाल विधेयक को यहां तक ले आने के बाद भी संदेहों का उपजना यही संकेत करता है कि वास्तविक लक्ष्य पर राजनीतिक हितों को तरजीह दी जा रही है। अगर हम व्यवस्था को बदलने के प्रति कृतसंकल्प हैं, तो फिर इस तरह के विवाद भरोसा नहीं जगाते। जिस विधेयक को लेकर इतनी बहस हुई, देश भर में संवाद और जनांदोलन हुए, क्या उसके शुरुआती कदम ही संदेह और विवाद की नींव पर खड़े होने चाहिए? कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं, जब महत्वपूर्ण कमेटी में किसी व्यक्ति को चुने जाने पर विपक्षी दल को आपत्ति हो। मन में अगर वाकई व्यवस्था को बदलने का संकल्प हो, तब यह नहीं सोचा जाता कि किसी महत्वपूर्ण कमेटी में नामित होने वाला कोई व्यक्ति किसी खास राजनीतिक दल के हितों के अनुरूप है। सत्ता पक्ष से अगर शिकायत है, तो विपक्षी राजनीति से भी पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है।
इरादा अगर ठीक होता, तो सर्च कमेटी को शक्तिशाली बनाया जाता। खासकर तब, जब आप उस कमेटी में देश के विद्वान अनुभवी न्यायाधीश जजों को शामिल कर रहे हैं। सर्च कमेटी को नख-दंतहीन बनाने का नुकसान यह होगा कि लोकपाल की दौड़ में योग्य, अनुभवी और निष्पक्ष प्रत्याशियों के पिछड़ जाने की पूरी आशंका बन जाएगी। लोकपाल को जांच के काम में पर्याप्त स्वतंत्रता तो मिलनी ही चाहिए। ऐसा कहीं से नहीं लगना चाहिए कि लोकपाल या लोकायुक्त के लिए चयन प्रक्रिया सरकार के पक्ष में हो। ऐसे गंभीर मामलों में चलताऊ काम की अपेक्षा कतई नहीं की जा सकती। लेकिन सत्ता राजनीति ने सारी कोशिश इसी में लगा दी कि सरकार की ताकत बनी रहे, उसके अधिकार पर कहीं कोई काट-छांट नहीं हो। चारों तरफ से आलोचना झेलने के बाद राजनीतिक दलों ने लोकपाल पर सहमति तो बना दी, लेकिन देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए माकूल परिस्थितियां उत्पन्न करने का हौसला उनमें नहीं दिखता।
स्वच्छ प्रक्रिया, ईमानदार सोच और मौजूदा व्यवस्था को बदलने की प्रतिबद्धता जब तक न झलके, तब तक सिर्फ लोकपाल के नाम पर लोकपाल बना देने का कोई मतलब नहीं है। अरुणा राय ने लोकपाल के मसौदे में कई महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया था। उस दिशा में सोचा जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा न करके चुनाव से पहले यह संदेश देने की कोशिश की गई कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ गंभीर है। आखिरी समय में, ऐन चुनाव से पहले भ्रष्टाचार-विरोधी विधेयक पारित करने या अध्यादेश लाने की कोशिशों से कुछ होता नहीं है।
लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक के कामकाज में तेजी चुनाव के बाद ही आएगी। इसकी प्रक्रिया तभी शुरू होगी। लेकिन अगली सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, लोकपाल को लेकर उसके आग्रह भी मौजूदा सरकार की तरह ही होंगे। जनता की नाराजगी कम करने के लिए लोकपाल का एक दिखावटी ढांचा खड़ा कर देने के अलावा वह कुछ नहीं करेगी। राजनीतिक दलों ने यह तो भांप लिया है कि उनके तौर-तरीकों से जनता नाराज है, इसके बावजूद वे अपने कामकाज का ढर्रा बदलने को अब भी राजी नहीं हैं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल को पारित कराने के बाद अहम सवाल यही है कि इसका इस्तेमाल कौन करता है, किस तरह से करता है। कहीं एक नेता दूसरे नेता के खिलाफ तो नहीं कर रहा, कहीं एक नौकरशाह, किसी नेता या दूसरे नौकरशाह के खिलाफ तो नहीं कर रहा। कहीं कुछ राजनीतिक दल मिलकर तीसरे राजनीतिक दल के खिलाफ तो नहीं कर रहे। अगर इन इरादों के साथ लोकपाल का इस्तेमाल होने लगेगा, तो फिर यह खेल ही होगा। लेकिन अगर कवायद देश की व्यवस्था में सुधार और भ्रष्टाचार को मुक्त करने की है, तो लोकपाल और लोकायुक्त एक गंभीर कदम होगा। इसमें सबसे अहम बात यही है कि आखिर हमने लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक बनाया किसलिए है। क्या हमारे राजनीतिक दलों को इसका एहसास है?