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पर्वतीय किसानों की दयनीय हालत

Wed, 05 Jul 2017 07:22 PM IST
पंकज सिंह बिष्ट
पंकज सिंह बिष्ट Updated Wed, 05 Jul 2017 07:22 PM IST
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The pitiful condition of hill farmers
पंकज सिंह बिष्ट

आजकल कर्जमाफी को लेकर देश के कई राज्यों में किसान आंदोलन कर रहे हैं और खेती-बाड़ी छोड़कर शहरों में धरना दिए हुए हैं। पिछले कुछ दिनों में कई किसानों ने आत्महत्या कर ली है और यह सिलसिला अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रहा। मुश्किल यह है कि सरकार इसे इसे कर्जमाफी के नजरिये से देख रही है, जबकि मामला यह है कि किसानों को कड़ी मेहनत और अच्छे उत्पादन के बावजूद फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है।

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उत्तराखंड के किसानों का भी हाल भी अन्य राज्यों के किसानों की ही तरह हैं। नैनीताल जिले के अंतर्गत भीमताल निर्वाचन क्षेत्र का इलाका अपनी प्राकृतिक सुंदरता, फल पट्टी और सब्जियों की पैदावार के लिए प्रसिद्ध है। वहां के लोगों की आय का साधन खेती-बाड़ी ही है। कुछ दशक पहले इस क्षेत्र में आलू और सेब का काफी उत्पादन हुआ करता था, लोग नौकरी करने के बजाय खेती करना पसंद करते थे। लेकिन राज्य गठन के बाद इस स्थिति में तेजी से परिवर्तन आए हैं। आज यहां के किसान खेती–बाड़ी छोड़कर अपनी जमीनें बेच रहे हैं। इसका असली कारण उत्पादन का सही मूल्य न मिल पाना और ब्याजखोरी है। 
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सरकार किसान के लिए सस्ते कर्ज की व्यवस्था तो कर देती है, किंतु उनकी फसल के लिए बाजारों की तरफ कोई ध्यान नहीं देती। नतीजतन किसान को उतना मूल्य भी नहीं मिल पाता कि कर्ज ली गई राशि निकल सके। राज्य के गठन के बाद से ही भीमताल के फल एवं सब्जियों की खेती–बाड़ी करने वाले हजारों किसानों की मांग रही है कि उनके उत्पादों का समर्थन मूल्य तय कर दिया जाए। इस मुद्दे को लेकर स्थानीय प्रतिनिधियों ने अपनी राजनीति खूब चमकाई और जब जीत गए, तो इस मुद्दे को ही भूल गए। हल्द्वानी में मंडी तो बनवा दी गई, लेकिन मंडी की सारी दुकानें व्यवसायियों को दे दी गई। 
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किसान अपनी फसल बिना दलाल की मदद के बेच नहीं सकता। किसान आढ़तियों के माध्यम से अपनी फसल बेचते हैं, जिसमें कमीशन के तौर पर दो से पांच प्रतिशत किसानों को आढ़तियों को देना पड़ता है। जरूरत के वक्त ये आढ़तिए किसानों को जो कर्ज देते हैं, उसके बदले उनसे एक से पांच फीसदी तक ब्याज वसूलते हैं। ब्याज की दरें किसान की औकात देखकर तय की जाती हैं। अपने उत्पाद को मंडी में बेचने और ग्रेडिंग करने की जानकारी न होने के कारण किसान अपने उत्पाद की वह कीमत नहीं ले पाता, जो वास्तव में उन्हें मिलनी चाहिए। कई बार किसान फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलने के कारण फसलों को खेत में सड़ने-गलने के लिए छोड़ देते हैं। नतीजतन बाजार में फल कम पहुंचते हैं और उपभोक्ता फलों से वंचित रह जाते हैं। 

लगातार हो रहे मौसम परिवर्तन के कारण भी फसल का उत्पादन प्रभावित हो रहा है और किसान कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है। हालात यह है कि फलपट्टी और आलू उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र माने जाने वाले गांवों में किसानों ने अपनी जमीनें बेचनी शुरू कर दी हैं। बिल्डरों द्वारा इन जमीनों को बंजर घोषित करवा कर बड़े-बड़े होटलों, कोठियों का निर्माण कराया जा रहा है। गजार गांव के एक बुजर्ग किसान प्रताप सिंह कहते हैं कि यह क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और ठंडी जलवायु के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे देखते हुए शहर के लोग यहां पर जमीनें खरीदना पसंद करते हैं।

 
यदि इसी प्रकार सरकार किसानों की समस्याओं को अनदेखा करती रही, तो वह दिन दूर नहीं, जब इस क्षेत्र के किसान अपनी खेती की जमीन बिल्डरों को बेच देंगे। इसलिए जरूरी है कि समय रहते किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिया जाए, ताकि इनके उगाए फलों का स्वाद देशवासियों को मिल सके। 

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