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नागरिकता कानून की जरूरत
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नागरिका विधेयक का विरोध
हिंदू उजड़े तो कहां जाए? दुनिया में एक ही देश है, जहां आज भी हिंदू किसी तरह बहुसंख्यक बने हुए हैं। पर वहां भी विभिन्न कारणों और परिस्थितियोंवश आग्रही हिंदू विभिन्न प्रकार के आघातों एवं व्यंग्य प्रहारों का शिकार बनते हैं। स्वतंत्र गणतंत्र में एक प्रदेश को यह श्रेय भी है कि वहां लाखों हिंदू निकाले गए और शरणार्थी बने, जिन्हें स्वतंत्र भारत की सरकार ने शरणार्थी का दर्जा देकर उनके रहने के लिए शिविर और बच्चों को स्कूल, कॉलेजों में प्रवेश के लिए विशेष प्रावधान किए। यह स्वतंत्र भारत में हिंदुओं की स्थिति है, तो पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश जैसे सांविधानिक तौर पर घोषित इस्लामी देशों में हिंदुओं, सिखों का क्या हाल होगा?
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मोदी का नागरिकता कानून उन गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए है, जिनके लिए दुनिया में एक मात्र आशा और आसरा केवल हिंदुस्तान है। मैं लाहौर, कराची और मीरकोट में ऐसी हिंदू महिलाओं से मिलकर आया था, जो अब भी बाजार में बिंदी या मंगलसूत्र पहनकर नहीं निकल पातीं। कराची के क्लिफटन सागर तट पर बना प्रसिद्ध शिव मंदिर आज भी है, पर वहां पुजारी मंदिर के भीतर भी मुस्लिम अर्ध चंद्राकार टोपी पहनते हैं। पर उन्हें अगर शरण लेनी हो, तो क्या हिंदुओं को ईरान, सऊदी अरब या कुवैत में नागरिकता मिलेगी? जब सत्तर साल की प्रतीक्षा के बाद देश में एक ऐसा प्रधानमंत्री खड़ा हुआ, जिसने अपनी माटी की सुगंध बदन पर लपेटे, हिंदू, सिखों, ईसाइयों को पड़ोसी देशों में दैनिक अपमान और प्रताड़ना से बचाने के लिए कानून बनाने की हिम्मत की, तो उसे सर्वदलीय सर्वसम्मति से पारित करने के बजाय सेक्यूलर हिंदू ही उसके विरोध में खड़े हो रहे हैं।
भारत में नागरिकता कानून 1955 में पारित हुआ था। अब इसमें एक संशोधन पंक्ति जोड़ी जा रही है-'यदि वह व्यक्ति अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आया हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई है, जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा छूट दी गई है अथवा पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम 1920 के खंड-3, उपखंड-2 और प्रावधान-सी से छूट प्राप्त हो अथवा जिनको विदेशी नागरिक अधिनियम, 1946 के प्रावधानों के प्रभाव से छूट प्राप्त हो, उन व्यक्तियों को इस अधिनियम (नागरिकता अधिनियम) के अंतर्गत अवैध प्रवासी नहीं माना जाएगा।'
इसके विरोध में उठ रही आवाजें भारत में अल्पसंख्यक मतों को खोने के भय से प्रेरित हैं। यह कैसी वेदनाजनक बात है कि हम अपने ही धर्म बंधुओं को कष्ट और विपदा की स्थिति में भी शरण देने से इसलिए मना कर रहे हैं, क्योंकि डर है कि इससे गैर हिंदू भारतीय वोट बैंक हाथ से निकल जाएगा। हिंदुओं की रक्षा से मुसलमानों को क्यों चिंता होनी चाहिए? उन्हें तो पिछला इतिहास देखते हुए हिंदुओं की रक्षा के लिए और भी बढ़-चढ़कर आगे आना चाहिए।
जुलाई, 2018 में लोकसभा में पूछे एक प्रश्न के उत्तर में सरकार ने कहा कि अफगानिस्तान सहित लगभग 71 देशों से भारतीय नागरिकता पाने के लिए कुल 4,044 आवेदन विचाराधीन हैं। अर्थात नागरिकता कानून लागू होने के बावजूद किसी प्रदेश विशेष पर कोई बड़ा दबाव नहीं पड़ने वाला। असम, अरुणाचल जैसे प्रदेशों की समस्या अवैध घुसपैठिए हैं, न कि प्रताड़ित और लुटे-पिटे शरणार्थी हिंदू, बौद्ध और सिख।
सब व्यक्ति सब कामों के लिए नहीं जाने जाते। तिरुवल्लुर की रचना तिरुकुरल, सुदर्शन की कहानी हार की जीत, प्रेमचंद का उपन्यास गोदान, नरेंद्र कोहली की रामकथा, बस एक-एक रचना ही उन्हें अमर बनाने के लिए पर्याप्त है। इंदिरा गांधी के लिए 16 दिसंबर, 1971 की विजय और अटल जी का पोकरण पर्याप्त है। नरेंद्र मोदी नागरिकता कानून के लिए कोटि-कोटि भारतीयों की कृतज्ञता और भारत पर विश्वव्यापी हिंदुओं के भरोसे की पुनर्स्थापना अर्जित कर हमेशा के लिए याद किए जाएंगे।
आज के हिंदू यह आभास ही नहीं कर पाते कि इस भारत के धर्म, संस्कृति और आपदाग्रस्त जन की रक्षा के लिए भारतीय महापुरुषों ने अपने सिर आरे से कटवाए थे, जिंदा तेल से खौलाया जाना और बदन पर कपास बांधकर धीमी आंच में चमड़ी पिघला-पिघलाकर मरना स्वीकार किया था। कभी भारत के हिंदुओं ने दुनिया के विरोध की चिंता किए बिना यहूदियों, पारसियों, तिब्बतियों, चकमाओं को अपने यहां शरण दी और विश्व में शरणदाता के नाते प्रतिष्ठित हुए। आज वे हिंदू न केवल अपने ही देश में, बल्कि पड़ोसी देशों में भी शरणार्थी बनने पर मजबूर हैं। पर उनका अपना देश हिंदुस्तान इस बारे में एकमत नहीं है। हिंदुओं को केवल हिंदुस्तान में ही नहीं, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, मुल्तान, पेशावर, कराची, लाहौर, बन्नू, बहावलपुर, रावलपिंडी, करतारपुर, सिलहट, चटगांव और ढाका से मारपीट कर बलात्कार और धर्मांतरित कर निकाला गया। विश्व में हिंदुओं पर नाजियों द्वारा यहूदियों पर किए अत्याचारों से ज्यादा भयानक अत्याचार हुए और जब कभी वे आपदाग्रस्त हुए, केवल और केवल भारत ने ही मां की ममता के आंचल समान उन्हें शरण दी और अपनाया। भारत के सिवाय हिंदुओं के लिए कोई देश या मातृभूमि हो सकती है! मोदी का नागरिकता संशोधन कानून हजारों वर्षों से भारत के प्रति हिंदुओं के भरोसे और भारत की हिंदुओं के प्रति अलिखित, अमिट जिम्मेदारी को जिंदा करता है।
भारतीय नागरिकता कानून में यह संशोधन 2016, जुलाई में राजनाथ सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया था। बाद में यह स्थायी समिति में गया और पारित हुआ। यह संशोधन किसी भी दृष्टि से किसी भी वर्तमान भारतीय के अधिकारों को न कम करता है और न ही प्रभावित करता है। भारत में फलस्तीनी, तिब्बती, रोहिंग्या मुस्लिम, बांग्लादेशी मुस्लिम स्वागत और शरण पा सकते हैं, पर हिंदुओं के लिए दरवाजे बंद होने चाहिए। यह बात भारत के ही सेक्यूलर कहें, तो इससे बढ़कर और क्या दुर्भाग्य होगा?