इस मोहलत के मायने
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पिछले चार नवंबर से ईरान के गले पर अमेरिकी प्रतिबंधों का शिंकजा कस गया। विगत अप्रैल में अमेरिका द्वारा ईरान के साथ 2015 में हुई संधि को खत्म करने की घोषणा के साथ ही पूरी दुनिया के तेल बाजार में अस्थिरता सहित कई प्रकार की आशंकाएं पैदा हो गई थीं। भारत के सामने भी तेल आयात को लेकर प्रश्न खड़े हो गए थे। अपनी आवश्यकता का करीब 83 प्रतिशत तेल आयात करने वाले देश के लिए तेल मूल्यों में वृद्धि के बीच अति सामान्य शर्तों पर एक बड़े आपूर्तिकर्ता का स्रोत पूरी तरह से बंद हो जाने का परिणाम कितना अनर्थकारी हो सकता था, यह बताने की आवश्यकता नहीं। जाहिर है, अमेरिका द्वारा भारत को ईरान से तेल आयात पर छह महीने के लिए मिली छूट तत्काल भारी राहत का विषय है। भारत कुल तेल आयात का लगभग 26 प्रतिशत ईरान से ही मंगाता है। ईरान के साथ तेल आयात का बड़ा लाभ यह है कि उसके भारी अंश का भुगतान रुपयों में होता है। चूंकि अमेरिका के साथ भी भारत के व्यापारिक रिश्ते हैं, लिहाजा भारत के लिए इन दोनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती थी। इसलिए अमेरिका द्वारा तत्काल राहत मिलना वास्तव में मोदी सरकार की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता है।
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इन दो धुर विरोधियों या यों कहिए कि एक दूसरे के दुश्मन बन चुके देशों के बीच संतुलन साधने तथा अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सफलता पाने के लिए किस स्तर की गहरी कूटनीतिक कवायद की आवश्यकता हुई होगी, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। भारत ने कूटनीतिक अभियान चलाते हुए जहां ईरान को आश्वस्त किया कि वह अपने मित्र देश को मंझधार में नहीं छोड़ सकता, वहीं अमेरिका को विश्वास दिलाया कि ईरान से तेल आयात करना भारत की अर्थव्यवस्था के हित में है, और अगर भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर हुई, तो यह अमेरिकी हितों के लिए नुकसानदेह होगा। विदेश सचिव विजय गोखले की ईरान यात्रा के दौरान आपसी व्यापार दोगुना करने का निश्चय हुआ।
भारत ने अमेरिका को यह विश्वास दिलाया कि चीन ईरान के साथ है और वह फायदे में रहेगा तथा भारत घाटे में। दूसरे, चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत के लिए तो महत्वपूर्ण है ही, अमेरिकी हितों की भी पूर्ति करनेवाला है। साथ ही अमेरिका के साथ भी 2+2 बैठक की गई और भारत अमेरिका को यह समझाने में सफल रहा कि भारत का किसी दृष्टि से कमजोर पड़ना अमेरिकी हितों को ही नुकसान पहुंचाने वाला होगा।
कुछ लोग इसे छह महीने की तात्कालिक रियायत मान रहे हैं। यह एक बड़ी उपलब्धि को छोटा करके देखना है। यह भारतीय नेतृत्व की धाक और साख, दोनों को प्रमाणित करने वाली परिणति है। इससे यह साबित हुआ है कि अगर नेतृत्व में साहस और इच्छाशक्ति हो, तो आप विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रीय हित साध सकते हैं।
छह महीने पूरे होने के बाद अमेरिका क्या रुख अपनाता है, यह देखना होगा। उस समय तक ईरान के साथ उसके संबंध कैसे रहते हैं, इस पर काफी कुछ निर्भर करता है। यूरोपीय संघ से लेकर उसके प्रमुख देश तक मध्यस्थता करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत ने इस कूटनीतिक अभियान के तहत यूरोपीय संघ से बातचीत की तथा इसके कुछ प्रमुख देशों के नेताओं से भी। ईरान संकट के समाधान की दिशा में भी भारत की कोशिश जारी है। हो सकता है कि इसके बेहतर परिणाम आएं। बहरहाल, अमेरिकी छूट मई, 2019 तक कायम रहेगी। इसका अर्थ हुआ कि मोदी सरकार को लोकसभा चुनाव तक कच्चे तेल को लेकर तनाव नहीं होगा।