तालिबान के साथ खुलकर बैठने का अर्थ
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अफगानिस्तान में तालिबान की हमलावर सैन्य गतिविधियों में बढ़ोतरी और तालिबान के 'जनक' मौलाना समी-उल-हक की रावलपिंडी में हत्या की पृष्ठभूमि में मास्को वार्ता संपन्न हुई। रूस कई महीने से इसकी तैयारी कर रहा था। इसे रूस की कूटनीतिक विजय माना जा सकता है, क्योंकि वह अफगानिस्तान सरकार, तालिबान, अमेरिका, भारत, चीन और पाकिस्तान सहित कई देशों के प्रतिनिधियों को एक मेज पर लाने में सफल रहा। हालांकि अफगान राष्ट्रपति मोहम्मद अशरफ गनी ने विदेश मंत्रालय से किसी को भेजने के बजाय उच्च शांति परिषद के नुमाइंदों को भेजा। भारत सरकार ने भी विदेश सेवा के दो अवकाश प्राप्त राजनयिकों को भेज कर वार्ता में अनौपचारिक उपस्थिति दर्ज कराई। विदेश मंत्रालय ने यह स्पष्टीकरण जरूरी समझा, 'इस वार्ता में शिरकत हमारी कोई मजबूरी नहीं थी। गैर सरकारी स्तर पर शामिल होना हमारा सुविचारित फैसला था। हमने कब कहा कि तालिबान के साथ बातचीत होगी? हमने यह नहीं कहा कि तालिबान से भारत की बातचीत होगी।'
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भारत सरकार ने पर्दा पूरी तरह नहीं उठाया। जितना उठा, उसका भी बड़ा महत्व है। अफगानिस्तान की निर्वाचित सरकार ने तालिबान से वार्ता के दरवाजे हमेशा खुले रखे हैं। युद्धरत होने के बावजूद अमेरिका 'अच्छे तालिबान' से लगातार संपर्क में रहा है। पाकिस्तान तो तालिबान का पावरहाउस ही है। चीन ने अफगानिस्तान में पीडीपीए (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ अफगानिस्तान) की कम्युनिस्ट सरकार से लेकर अब तक सभी संगठनों और गुटों से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संबंध रखे हैं। अफगानिस्तान में सोवियत सैनिक प्रवेश के साथ शुरू हुआ संकट अंततोगत्वा सोवियत संघ के विखंडन का बड़ा कारण बना। विश्वविख्यात लाल सेना को तालिबान फौजियों के हाथों शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। फिर भी रूस ने तालिबान के साथ डोर बनाए रखी और इस समय वह जो कर रहा है, वह उसके राष्ट्रीय हितों का तकाजा है। मौजूदा समय में मध्य एशियाई देशों और फारस की खाड़ी में चल रहे शह-मात के अंतरराष्ट्रीय खेल के मद्देनजर पारस्परिक और सामूहिक संबंधों को नए आयाम देने की जरूरत थी। भारत के थोड़ा पर्दा उठाने का रहस्य इसी में है।
दिसंबर 1999 में भारतीय यात्री विमान आईसी-814 के अपहरण के समय भारत ने अपने को असहाय पाया। पाकिस्तान के लिए मैदान खुला हुआ था। तालिबान सरकार पाकिस्तान पर इस तरह निर्भर थी कि आईएसआई एजेंट कंधार से तीन कुख्यात आतंकी नेताओं को सरेआम निकाल ले गए और वह कुछ न कर सकी, हालांकि यह अफगान प्रभुसत्ता का उल्लंघन था। बाद में खबर आई थी कि तालिबान कंधार में भारतीय यात्रियों की रिहाई चाहते थे। भारत को तालिबान सरकार से सक्रिय संबंध न रखने की कीमत चुकानी पड़ी। इसी के बाद विदेश मंत्रालय में गहन मंथन शुरू हुआ। पाकिस्तान से मदद के बावजूद तालिबान ने पाक-अफगान सीमा, डूरेंड लाइन को कभी तस्लीम नहीं किया। वे भी अपने विकल्पों का विस्तार चाहते थे। अप्रैल 2010 में तालिबान प्रवक्ता के इस बयान ने सबको चौंका दिया, 'हम न तो पाकिस्तान और न भारत की हिमायत करते हैं। हम यह नहीं कहते कि भारत अफगानिस्तान से चला जाए। भारत से तालिबान का कोई सीधा टकराव नहीं है। यह मुमकिन है कि तालिबान और भारत एक साथ काम करें।' पिछले करीब दस वर्षों में भारत ने निर्वाचित अफगान सरकार से विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग करने के साथ ही तालिबान गुटों से भी रिश्ते बनाए हैं।
मास्को वार्ता में तालिबान ने मांग की कि अमेरिका सबसे पहले अपने सैनिक हटाए। उन्होंने कहा कि शांति वार्ता और प्रतिबंध साथ-साथ नहीं चल सकते। इसलिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ओर से तालिबान नेताओं पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं। वे वर्तमान अफगान संविधान को भी मानने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने यह मांग भी की कि अमेरिका और उसकी 'संरक्षित' सरकार ने जिन हजारों लोगों को जेल में डाल रखा है, उन्हें रिहा किया जाए। सारांश यह कि नजीबुल्ला के खिलाफ लड़कर तालिबान ने जो हासिल किया था, अब वे ये सब बिना आगे लड़े हासिल करना चाहते हैं। शांति वार्ता के सफल होने की हालत में काबुल हुकूमत की शक्ल क्या होगी? क्या मिली-जुली सरकार संभव होगी? जाहिर है, तालिबान 'पश्चिम की नकल पर बने इस्लाम विरोधी' संविधान के तहत काम नहीं करेंगे, क्योंकि वे अपना कट्टरपंथी, वहाबी इस्लामी आधार कमजोर नहीं कर सकते। तालिबान का एजेंडा निजाम-ए-मुस्तफा है, न कि बहुलतावादी लोकतांत्रिक सरकार। चीन की चिंता उइगुर मुसलमानों में और रूस की चिंता अपने मुस्लिम बहुल इलाकों में उग्रवाद है। काबुल में वहाबी निजाम उन्हें परेशान करेगा। पाकिस्तान का स्थायी एजेंडा अफगानिस्तान में 'सामरिक पहुंच' है। फिलहाल वह इससे वंचित है। भारत के स्थायी लक्ष्य भी स्पष्ट हैं- अफगानिस्तान में विकास की मद में लगे करोड़ों डॉलर व्यर्थ न जाने पाएं, काबुल में मित्र सरकार बनी रहे, ईरान-अफगान सीमा तक पहुंच निर्बाध रहे और जलालाबाद सहित सभी पांच वाणिज्य दूतावास बेरोक-टोक काम करते रहें। इस एजेंडे की सुरक्षा के लिए कोई भी कूटनीतिक या आर्थिक मूल्य अधिक न होगा।
मास्को ने ताशकंद समझौते के जरिये अमेरिका को दक्षिण एशिया से बेदखल करने की कोशिश की थी। मास्को वार्ता की शुरुआत भी उसी दिशा में है। चीन और रूस मिलकर अमेरिका को पूरे इलाके में प्रभावहीन करना चाहते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति ने उनका काम आसान भी कर दिया है। रूसी विदेश मंत्री ने कह भी दिया, 'अफगानिस्तान में कोई भू-राजनीतिक खेल न खेले।' यह इशारा अमेरिका की ओर ही हो सकता है।
अमेरिका, रूस और चीन को साधने के साथ ही पाकिस्तान की दुरभिसंधियों को नाकाम करना भारतीय विदेश और समर नीति की एक बड़ी चुनौती होगा। आशा की जा सकती है कि तालिबान के साथ रिश्ते भारत को इन चुनौतियों से निपटने में मददगार होंगे।