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टूट रहा है अमेरिकी स्वप्न का जादू
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बेरोजगारी (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : Amar
वर्ष 2018 के ग्रीष्म ऋतु में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के चार छात्रों ने अखबारों की सुर्खियां बटोरी थीं। वे बहुत ही मामूली परिवार से ताल्लुक रखते थे, जिनके पास कोई पारिवारिक संपत्ति या ऊंची पहुंच नहीं थी, फिर भी उन्हें सौ फीसदी छात्रवृत्ति के साथ अमेरिकी कॉलेज में दाखिला मिला था।
सुदीक्षा भाटी, गुलेश कुमार शुक्ला, हेमलता शर्मा और पीयूष सैनी-ये सभी छात्र शिव नाडार फाउंडेशन के एक स्कूल विद्यांगन के छात्र थे। जब उनकी इस उपलब्धि के बारे में एक राष्ट्रीय अखबार ने खबर प्रकाशित की, तो उनके परिवार और स्कूल को भारी प्रसिद्धि मिली। सीबीएसई की बारहवीं बोर्ड में 98 फीसदी अंक लाने वाली भाटी को मैसाचुसेट्स के बाबसन कॉलेज में एक उद्यमिता कार्यक्रम में प्रवेश मिला। इन चारों छात्रों ने राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान इसलिए खींचा, क्योंकि वे भारत में लंबे समय से पनप रहे 'अमेरिकन ड्रीम' यानी अमेरिकी स्वप्न का हिस्सा थे। लाखों भारतीय अमेरिकी सफलता की कहानी को जीने का सपना देखते हैं।
अमेरिका की आबादी में भारतीय-अमेरिकियों की हिस्सेदारी करीब एक फीसदी है। फिर भी आप उन्हें अमेरिका की बड़ी कंपनियों के मुखिया, प्रतिष्ठित अमेरिकी कॉलेजों के डीन या प्रसिडेंट, पत्रकारिता के शीर्ष पर, प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में वर्चस्व, तथा आतिथ्य, परिवहन और रियल एस्टेट जैसे उद्योगों में फलते-फूलते देख सकते हैं। उन्होंने वहां की सरकार में भी असाधारण सफलता हासिल की है, जैसा कि अमेरिकी प्रौद्योगिकी उद्यमी और शिक्षाविद विवेक वधवा ने एक बार संकेत किया था।
बेशक अमेरिका जाने वाले सभी भारतीय अपने चुने हुए पेश में शीर्ष पर नहीं पहुंचते हैं और न ही वे सुर्खियां बनाते हैं, लेकिन भारत के अधिकांश मध्यवर्गीय लोग अमेरिका में शिक्षा और काम करने का मौका पाने का सपना देखते हैं। लेकिन अब लगता है कि भारतीयों के लिए वह अमेरिकी स्वप्न दूर होता जा रहा है। ढेर सारी बुरी खबरें आने लगी हैं। अमेरिका में यह चुनावी साल है और ट्रंप प्रशासन की घोषणाओं ने अमेरिका में गैर-प्रवासी वीजा पर काम करने वाले लोगों और भारतीय छात्रों के बीच व्यापक आतंक और अनिश्चितता पैदा कर दी है।
इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन कार्यालय ने अमेरिका में पहले से पढ़ रहे विदेशी छात्रों और जो इस शरद ऋतु में वहां दाखिले की योजना बना रहे थे, उनके लिए नए और सख्त वीजा संबंधी दिशा-निर्देशों की घोषणा की है। इस निर्णय के अनुसार, यदि कोविड-19 के कारण पढ़ाई पूरी तरह ऑनलाइन हो जाती है, तो सभी अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अमेरिका छोड़ना होगा। महामारी के दौरान लगभग सभी अमेरिकी विश्वविद्यालयों को अपने शिक्षण को ऑनलाइन करने पर मजबूर होना पड़ा। विदेशी छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाई के बावजूद अपना सेमेस्टर पूरा करने को कहा गया है।
अमेरिकी शिक्षा जगत में यह अनुमान लगाया गया था कि यह छूट लागू रहेगी, क्योंकि कोरोना वायरस के कारण स्वास्थ्य जोखिम जारी हैं, खासकर अमेरिका में, जहां दुनिया के किसी भी देश की तुलना में अब तक सबसे ज्यादा संक्रमितों की पुष्टि हुई है और सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इस अनुमान को ध्वस्त कर दिया। नतीजतन अमेरिका में रहने वाले दो लाख भारतीय छात्र (जो चीनी छात्रों के बाद दूसरा सबसे बड़ा समूह है) इस समय तनाव, भय और अनिश्चितता में फंसे हुए हैं। वे वास्तव में नहीं जानते कि उनके भविष्य का क्या होगा। क्या सभी कॉलेज विदेशी छात्रों को रहने की अनुमति देने के लिए अगले सत्र से पहले एक हाइब्रिड मॉडल (ऑनलाइन और इन-पर्सन) में चले जाएंगे?
उन भारतीय छात्रों का क्या होगा, जो बीच में स्वदेश लौट गए थे। शीर्ष अमेरिकी कॉलेज इसके खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। हार्वर्ड विश्वविद्यालय और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी उन पहले संस्थानों में हैं, जिन्होंने ट्रंप प्रशासन के उस आदेश के खिलाफ मुकदमा किया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय छात्रों से उनका वीजा छीन लिया और कोरोना वायरस के कारण उन्हें अपना कोर्स ऑनलाइन चलाने के लिए मजबूर किया। कई अन्य शिक्षण संस्थानों ने भी मुकदमा दायर किया है, लेकिन अनिश्चितता जारी है।
छात्रों को लगा यह झटका तब और गंभीर हो गया, जब विदेशी श्रमिकों का एच-1बी वीजा (गैर-प्रवासी कार्य वीजा) निलंबित कर दिया गया, जो सबसे ज्यादा भारतीयों को प्रभावित करता है। एच-1बी वीजा के निलंबन से विशेष रूप से भारतीय प्रौद्योगिकी कंपनियों और श्रमिकों को नुकसान पहुंचने की आशंका है। हर वर्ष जारी होने वाले 85,000 एच-1बी वीजा में करीब 70 फीसदी भारतीयों की हिस्सेदारी होती है।
लाखों अमेरिकियों के बेरोजगार होने की स्थिति में इन प्रभावित भारतीयों को राहत पहुंचाने के लिए वहां राजनीतिक समर्थन की संभावना बहुत कम है। तो क्या इसका मतलब यह है कि अमेरिकी स्वप्न ने अपनी चमक पूरी तरह खो दी है। व्यक्तिगत रूप से मुझे ऐसा ही लगता है, क्योंकि इस सपने पर अमेरिकी संरक्षणवाद की स्याह छाया पड़ गई है, जिसने बहुत से भारतीयों को झटका दिया है। हालांकि छोटे और मेट्रो शहरों के दसियों हजार युवा अब भी मानते हैं कि एक बार अगर आपने अमेरिका की धरती पर पैर टिका लिए, तो फिर समृद्धि और सफलता मिलेगी ही।
दूर के ढोल हमेशा सुहावने लगते हैं। अमेरिका में 'सफल' होने वाले कई भारतीयों ने विदेशियों से निपटने की बाधाओं की पूरी कहानी नहीं बताई है। सपने देखने से कोई किसी को नहीं रोक सकता और सपने हमेशा सीमाओं को नहीं मानते। यह देखते हुए कि दुनिया का लगभग हर देश (समृद्ध भी) कोरोना वायरस और आर्थिक सुस्ती की दोहरी चुनौतियों से जूझ रहा है और इसके अभी जारी रहने की आशंका है, ऐसे में मानकर चलना चाहिए कि बाधाएं बढ़ेंगी। इसलिए भारतीय युवाओं को एक ही क्षेत्र पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। यदि आप अमेरिका जाने का सपना देखते हैं, तो देखें, लेकिन यह सुनिश्चित करें कि यह आपका प्लान बी है, अन्य विकल्पों के लिए भी तैयारी करें।
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सुदीक्षा भाटी, गुलेश कुमार शुक्ला, हेमलता शर्मा और पीयूष सैनी-ये सभी छात्र शिव नाडार फाउंडेशन के एक स्कूल विद्यांगन के छात्र थे। जब उनकी इस उपलब्धि के बारे में एक राष्ट्रीय अखबार ने खबर प्रकाशित की, तो उनके परिवार और स्कूल को भारी प्रसिद्धि मिली। सीबीएसई की बारहवीं बोर्ड में 98 फीसदी अंक लाने वाली भाटी को मैसाचुसेट्स के बाबसन कॉलेज में एक उद्यमिता कार्यक्रम में प्रवेश मिला। इन चारों छात्रों ने राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान इसलिए खींचा, क्योंकि वे भारत में लंबे समय से पनप रहे 'अमेरिकन ड्रीम' यानी अमेरिकी स्वप्न का हिस्सा थे। लाखों भारतीय अमेरिकी सफलता की कहानी को जीने का सपना देखते हैं।
अमेरिका की आबादी में भारतीय-अमेरिकियों की हिस्सेदारी करीब एक फीसदी है। फिर भी आप उन्हें अमेरिका की बड़ी कंपनियों के मुखिया, प्रतिष्ठित अमेरिकी कॉलेजों के डीन या प्रसिडेंट, पत्रकारिता के शीर्ष पर, प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में वर्चस्व, तथा आतिथ्य, परिवहन और रियल एस्टेट जैसे उद्योगों में फलते-फूलते देख सकते हैं। उन्होंने वहां की सरकार में भी असाधारण सफलता हासिल की है, जैसा कि अमेरिकी प्रौद्योगिकी उद्यमी और शिक्षाविद विवेक वधवा ने एक बार संकेत किया था।
बेशक अमेरिका जाने वाले सभी भारतीय अपने चुने हुए पेश में शीर्ष पर नहीं पहुंचते हैं और न ही वे सुर्खियां बनाते हैं, लेकिन भारत के अधिकांश मध्यवर्गीय लोग अमेरिका में शिक्षा और काम करने का मौका पाने का सपना देखते हैं। लेकिन अब लगता है कि भारतीयों के लिए वह अमेरिकी स्वप्न दूर होता जा रहा है। ढेर सारी बुरी खबरें आने लगी हैं। अमेरिका में यह चुनावी साल है और ट्रंप प्रशासन की घोषणाओं ने अमेरिका में गैर-प्रवासी वीजा पर काम करने वाले लोगों और भारतीय छात्रों के बीच व्यापक आतंक और अनिश्चितता पैदा कर दी है।
इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन कार्यालय ने अमेरिका में पहले से पढ़ रहे विदेशी छात्रों और जो इस शरद ऋतु में वहां दाखिले की योजना बना रहे थे, उनके लिए नए और सख्त वीजा संबंधी दिशा-निर्देशों की घोषणा की है। इस निर्णय के अनुसार, यदि कोविड-19 के कारण पढ़ाई पूरी तरह ऑनलाइन हो जाती है, तो सभी अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अमेरिका छोड़ना होगा। महामारी के दौरान लगभग सभी अमेरिकी विश्वविद्यालयों को अपने शिक्षण को ऑनलाइन करने पर मजबूर होना पड़ा। विदेशी छात्रों को ऑनलाइन पढ़ाई के बावजूद अपना सेमेस्टर पूरा करने को कहा गया है।
अमेरिकी शिक्षा जगत में यह अनुमान लगाया गया था कि यह छूट लागू रहेगी, क्योंकि कोरोना वायरस के कारण स्वास्थ्य जोखिम जारी हैं, खासकर अमेरिका में, जहां दुनिया के किसी भी देश की तुलना में अब तक सबसे ज्यादा संक्रमितों की पुष्टि हुई है और सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इस अनुमान को ध्वस्त कर दिया। नतीजतन अमेरिका में रहने वाले दो लाख भारतीय छात्र (जो चीनी छात्रों के बाद दूसरा सबसे बड़ा समूह है) इस समय तनाव, भय और अनिश्चितता में फंसे हुए हैं। वे वास्तव में नहीं जानते कि उनके भविष्य का क्या होगा। क्या सभी कॉलेज विदेशी छात्रों को रहने की अनुमति देने के लिए अगले सत्र से पहले एक हाइब्रिड मॉडल (ऑनलाइन और इन-पर्सन) में चले जाएंगे?
उन भारतीय छात्रों का क्या होगा, जो बीच में स्वदेश लौट गए थे। शीर्ष अमेरिकी कॉलेज इसके खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। हार्वर्ड विश्वविद्यालय और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी उन पहले संस्थानों में हैं, जिन्होंने ट्रंप प्रशासन के उस आदेश के खिलाफ मुकदमा किया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय छात्रों से उनका वीजा छीन लिया और कोरोना वायरस के कारण उन्हें अपना कोर्स ऑनलाइन चलाने के लिए मजबूर किया। कई अन्य शिक्षण संस्थानों ने भी मुकदमा दायर किया है, लेकिन अनिश्चितता जारी है।
छात्रों को लगा यह झटका तब और गंभीर हो गया, जब विदेशी श्रमिकों का एच-1बी वीजा (गैर-प्रवासी कार्य वीजा) निलंबित कर दिया गया, जो सबसे ज्यादा भारतीयों को प्रभावित करता है। एच-1बी वीजा के निलंबन से विशेष रूप से भारतीय प्रौद्योगिकी कंपनियों और श्रमिकों को नुकसान पहुंचने की आशंका है। हर वर्ष जारी होने वाले 85,000 एच-1बी वीजा में करीब 70 फीसदी भारतीयों की हिस्सेदारी होती है।
लाखों अमेरिकियों के बेरोजगार होने की स्थिति में इन प्रभावित भारतीयों को राहत पहुंचाने के लिए वहां राजनीतिक समर्थन की संभावना बहुत कम है। तो क्या इसका मतलब यह है कि अमेरिकी स्वप्न ने अपनी चमक पूरी तरह खो दी है। व्यक्तिगत रूप से मुझे ऐसा ही लगता है, क्योंकि इस सपने पर अमेरिकी संरक्षणवाद की स्याह छाया पड़ गई है, जिसने बहुत से भारतीयों को झटका दिया है। हालांकि छोटे और मेट्रो शहरों के दसियों हजार युवा अब भी मानते हैं कि एक बार अगर आपने अमेरिका की धरती पर पैर टिका लिए, तो फिर समृद्धि और सफलता मिलेगी ही।
दूर के ढोल हमेशा सुहावने लगते हैं। अमेरिका में 'सफल' होने वाले कई भारतीयों ने विदेशियों से निपटने की बाधाओं की पूरी कहानी नहीं बताई है। सपने देखने से कोई किसी को नहीं रोक सकता और सपने हमेशा सीमाओं को नहीं मानते। यह देखते हुए कि दुनिया का लगभग हर देश (समृद्ध भी) कोरोना वायरस और आर्थिक सुस्ती की दोहरी चुनौतियों से जूझ रहा है और इसके अभी जारी रहने की आशंका है, ऐसे में मानकर चलना चाहिए कि बाधाएं बढ़ेंगी। इसलिए भारतीय युवाओं को एक ही क्षेत्र पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। यदि आप अमेरिका जाने का सपना देखते हैं, तो देखें, लेकिन यह सुनिश्चित करें कि यह आपका प्लान बी है, अन्य विकल्पों के लिए भी तैयारी करें।