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सियासी खेल: राजनीतिक सफलता के लिए मनोरंजन का भ्रम
Tue, 06 Jul 2021 02:45 AM IST
आलोक मेहता
आलोक मेहता
आलोक मेहता
Published by: आलोक मेहता
Updated Tue, 06 Jul 2021 02:45 AM IST
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कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू
- फोटो : Agency
राजनीति समाज सेवा के लिए है या सिद्धांतों के लिए अथवा सत्ता के लिए? अब यह प्रश्न भी उठने लगा है कि राजनीतिक सफलता के लिए क्या नेताओं को भीड़ जुटाने, उन्हें आकर्षित करने के लिए मनोरंजन की दुनिया यानी फिल्म/टीवी के जाने-माने वाले लोगों का साथ-सहयोग जरूरी है? ताजा मुद्दा यह है कि क्रिकेटर से टीवी के मनोरंजन चैनल में कॉमेडियन के रूप में शेरो-शायरी-चुटकुले वाले संवाद सुनाते हुए राजनीति में कूदे नवजोत सिंह सिद्धू को मनाने के लिए प्रियंका, राहुल गांधी और उनके सलाहकारों ने मुलाकात में कई घंटे और दिन बिताए। सिद्धू पहले भाजपा के कुछ नेताओं को लुभाकर राजनीतिक सत्ता का सुख ले चुके हैं और कांग्रेस ही नहीं, आप से भी पर्दे के पीछे सौदेबाजी करते रहे हैं।
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राजनीति में सक्रिय अथवा दशकों से उसे देखने वाले वे दिन याद करते हैं, जब नेताओं के लिए हजारों-लाखों की संख्या में सभाओं में भीड़ उमड़ती थी। कार्यकर्ता ही नहीं, नेता स्वयं मैदानों में दरियां बिछाते, माइक-स्पिकर लगाया करते थे। नेताओं और उनके विचारों से प्रभावित होकर फिल्म जगत के नामी लोग भी उनसे जुड़कर न केवल जुलूस में शामिल होते थे, बल्कि संसद में पहुंचने पर समाज सेवा में लग जाते थे या सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। इनमें सुनील दत्त का नाम आदर से लिया जा सकता है, जो लगभग पंद्रह साल सांसद रहे तथा नशाबंदी के खिलाफ उन्होंने लंबी पदयात्रा की।
दक्षिण भारत में कई फिल्मी हस्तियां सत्ता की राजनीति में आईं और उन्होंने अपने कार्यों से मतदाताओं का विश्वास अर्जित किया। एम जी रामचंद्रन, अन्नादुरई, करुणानिधि, जयललिता या एन टी रामा राव से आज भी तमिलनाडु, आंध्र, तेलंगाना की राजनीति प्रभावित है। इसलिए अन्य क्षेत्रों की तरह फिल्म या खेल जगत से राजनीति में आने पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। पर बाहुबलियों की तरह फिल्मी चेहरों को केवल भीड़ जुटाने की क्षमता के आधार पर वर्षों तक पार्टी और विचारधारा से जुड़े समर्पित नेताओं-कार्यकर्ताओं को तरजीह, पद, प्रतिष्ठा दिए जाने पर कष्ट होता है। लोकसभा या विधानसभा में उम्मीदवार बनने पर फिल्मी कलाकार की जीत का बड़ा आधार खास पार्टी का नाम और चुनावी चिह्न होता है। एक समय सर्वाधिक लोकप्रिय कहे जाने वाले सुपर स्टार को तो 1991 में कांग्रेस का हाथ मिला हुआ था, फिर भी वह भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से चुनाव हार गए थे। बाद में शत्रुघ्न सिन्हा को पराजित कर वह लोकसभा में आ अवश्य गए, पर न तो सदन में कोई महत्वपूर्ण योगदान दे सके, न ही उनके कारण अगले चुनाव में पार्टी को कोई लाभ मिला।
राज्यसभा में नामजद होने पर फिल्म या खेल से जुड़ी हस्तियों के अधिकाधिक अनुपस्थित रहने और सदन की कार्यवाही में हिस्सा न लेने पर भी विवाद उठते रहे हैं। मनमोहन सिंह सरकार में लोकप्रिय अभिनेत्री रेखा और क्रिकेट के जादूगर भारत रत्न सचिन तेंदुलकर की अपने छह वर्ष के कार्यकाल में शायद दस बार भी दर्शन न दिए जाने पर तीखी आलोचना हुई। इसमें भी उनसे अधिक कांग्रेस के नेताओं और उनके सलाहकारों को दोषी माना गया कि उन्होंने यह चयन क्यों किया? फिर पद स्वीकारने वाले को भी तय करना चाहिए था कि वे संसद और सेवा के लिए समय दे सकेंगे या नहीं।
दूसरी तरफ शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नामी कलाकार भी तीन दशक से सार्वजनिक जीवन में हैं। वह सांसद ही नहीं, भाजपा सरकार में मंत्री भी रहे, पर उनका पांच काम भी नहीं गिनाया जा सकता। वह केवल अपने नाम, संवाद और नेताओं की पसंदगी के कारण सत्ता का सुख लेते रहे, बिहार के मुख्यमंत्री बनने का सपना देखते रहे, पर दिल्ली-मुंबई में रहते हुए बिहार के हवाई दौरों से क्या कोई मुख्यमंत्री बन सकता है? पराकाष्ठा तो 2019 के लोकसभा चुनाव में हुई, जब उन्होंने कांग्रेस का दामन थामकर उसी पटना से चुनाव लड़ा, तो भाजपा के रविशंकर प्रसाद ने उन्हें बुरी तरह पराजित कर दिया। अति उत्साह में उन्होंने अपनी पत्नी पूनम सिन्हा को लखनऊ से चुनाव लड़वाकर हरवा दिया।
हाल के तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव में कमल हासन जैसे बेहतरीन अभिनेता ने उम्मीद के साथ चुनावी दांव खेला, पर वह बुरी तरह पराजित हो गए। फिल्म या खेल से जुड़े अनेक लोगों की राजनीतिक भूमिका पर बहुत कुछ बोला-लिखा भी गया है। पर आश्चर्य की बात है कि कांग्रेस और भाजपा ऐसे लोगों को भी महत्व दे रही हैं, जो सामाजिक-राजनीतिक सेवा में कोई भागीदारी नहीं करते, केवल भीड़ जुटा सकते हैं। हां, पूरी तरह पार्टी और क्षेत्र में सक्रिय रहने वाली स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी या सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय शबाना आजमी, जया बच्चन को अपवाद कहा जा सकता है। स्मृति ईरानी ने तो अमेठी से एक चुनाव हारने के बाद लगातार इलाके में काम किया और 2019 के चुनाव में कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी को परिवार के राजनीतिक गढ़ में पराजित कर दिया। इस तरह के अनुभव के बावजूद राहुल गांधी कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे दिग्गज नेता पर नवजोत सिंह सिद्धू को तरजीह दे रहे हैं। जबकि इंदिरा और राजीव गांधी पार्टी के नाराज बुजुर्ग नेताओं के आवास पर स्वयं सलाह-सहायता मांगने पहुंच जाते थे।
राजीव गांधी ने मित्र होने और लोकप्रियता के आधार पर अमिताभ बच्चन को प्रयागराज से लोकसभा चुनाव लड़ाया था। बाद में बोफोर्स कांड में नाम आने पर अमिताभ ने राजनीति ही त्याग दी। जया बच्चन सपा से राज्यसभा में हैं और बेहद सक्रियता से सदन की कार्यवाही में हिस्सा भी लेती हैं। इस दृष्टि से भारतीय लोकतंत्र को सशक्त करने के लिए चुनाव सुधार पर विचार-विमर्श के साथ राजनीतिक दलों को अपनी न्यूनतम आचार संहिता तय करनी चाहिए। स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान निर्माताओं ने राजनीति को समाज सेवा और विकास के लिए संसद और विधानसभा आदि में सदस्यता का प्रावधान किया था। उन्होंने इसे प्रोफेशन या बिजनेस नहीं सोचा और न ही माना। अब तो कई नेता इसे बिजनेस और शो की तरह ले रहे हैं। यह महापुरुषों के आदेशों का अनुगमन है या अपमान?