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युद्ध की आंच: भारत के लिए 'सतर्क तटस्थता' से 'सक्रिय क्षेत्रीय सुरक्षा' का समय
Fri, 06 Mar 2026 08:25 AM IST
Pavan
अमर उजाला
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Published by: Pavan
Updated Fri, 06 Mar 2026 08:25 AM IST
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युद्ध की आंच
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विस्तार
अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा हिंद महासागर में एक ईरानी युद्धपोत को डुबाए जाने से, जिसमें 80 से ज्यादा नाविक मारे गए, जहां इस संघर्ष की आंच भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुंच गई है, वहीं उसके बाद ईरान ने इस्राइल पर मिसाइल से हमले किए, तो पलटवार करते हुए इस्राइल ने लेबनान स्थित ईरान समर्थित हिजबुल्ला को निशाना बनाया, जिससे इस युद्ध के लंबे खिंचने की आशंका गहरा गई है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि युद्ध रोकने के उद्देश्य से अमेरिकी सीनेट में लाया गया प्रस्ताव गिर गया, जो युद्ध को लेकर ट्रंप के प्रति समर्थन को दर्शाता है। इसके अलावा, नाटो प्रमुख ने भी ट्रंप के प्रति समर्थन जताया है।ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस देना, जो भारत के मिलाप-2026 युद्धाभ्यास का हिस्सा था, को डुबाए जाने की घटना भारत के लिए 'सतर्क तटस्थता' से 'सक्रिय क्षेत्रीय सुरक्षा' के लिए प्रेरित करने वाली है। हालांकि छह दिनों के भीषण संघर्ष के बाद भी यह साफ नहीं है कि यह युद्ध किस तरफ जा रहा है, पर यह तय है कि युद्ध में हथियारों का भंडार और उनकी आपूर्ति अहम भूमिका निभाते हैं। इस युद्ध की शुरुआत से ही दोनों पक्षों की तरफ से तेज हमले हो रहे हैं, लेकिन इस तीव्रता के साथ संघर्ष को लंबे समय तक जारी रखना मुश्किल होगा।
अमेरिका और इस्राइल ने ईरान में हमले इतने तेज कर दिए हैं कि वहां खामनेई के लिए होने वाले शोक समारोह को भी स्थगित करना पड़ा। इस बीच संतोष की बात है कि खाड़ी देशों में फंसे भारतीयों को लाने के लिए सरकार ने आपातकालीन अभियान शुरू कर दिया है और अब तक हजारों भारतीयों को सुरक्षित लाया भी गया है। लेकिन कतर से ऊर्जा आपूर्ति निलंबित होने और युद्ध को लंबा खिंचते देखकर स्वाभाविक ही भारत की चिंताएं बढ़ी हैं, लेकिन एक बार फिर रूस ने मदद का हाथ बढ़ाया है, जो भारत के लिए जीवनरेखा साबित हो सकता है।
शिप-ट्रैकिंग डाटा से पता चलता है कि पूर्वी एशिया की ओर जा रहे रूसी कच्चे तेल के कुछ शिपमेंट को अब भारत की ओर मोड़ा गया है। हो सकता है कि भारत रूस एवं अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ मिलकर एक सुरक्षित समुद्री गलियारा बनाने की पहल करे और कूटनीतिक रूप से युद्ध विराम के लिए दबाव बनाने का प्रयास करे। जहां तक अमेरिकी नाराजगी की बात है, तो भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वह अपने रणनीतिक हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। अब समय आ गया है कि भारत सावधानीपूर्वक कूटनीतिक पहल की दिशा में कदम उठाए, ताकि न तो उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़े और न ही राजकोषीय संतुलन गड़बड़ाए।