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समस्या केवल पराली नहीं: साफ हवा के लिए राजनीति को दोषारोपण से ऊपर उठना पड़ेगा; किन कार्यों में सरकार की सफलता?

Tue, 27 Oct 2026 03:27 AM IST
ज्योति भास्कर प्रो. डॉ. कृष्ण कुमार रत्तू
प्रो. डॉ. कृष्ण कुमार रत्तू Published by: ज्योति भास्कर Updated Tue, 27 Oct 2026 03:27 AM IST
सार

दिल्ली व उसके आसपास के इलाकों की हवा की गुणवत्ता बिगड़ते ही पंजाब व हरियाणा में पराली जलाने का मुद्दा राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन जाता है।

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stubble burning not only problem for clean air politics must move beyond blame game govt must stop self laud
एक्यूआई और वायु प्रदूषण बढ़ने पर पराली जलाने जैसी गतिविधियों पर बहस - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार
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धान की कटाई का मौसम आते ही पंजाब के खेतों से उठने वाला धुआं हमारी कृषि व्यवस्था, सरकारी नीतियों और पर्यावरण संबंधी सोच पर कई सवाल खड़े कर देता है। जहां दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई इलाकों में लोग साफ हवा के लिए तरसते हैं, वहीं पंजाब का किसान अगली फसल समय पर बोने की चिंता से जूझता है। ऐसे में, असली सवाल यह है कि क्या हम केवल सख्ती से पराली जलाने पर रोक लगा रहे हैं या किसानों को ऐसे वैज्ञानिक और किफायती विकल्प भी दे रहे हैं, जो उनकी आजीविका बचाते हुए पर्यावरण की रक्षा कर सकें?

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पराली के मसले को किसी एक राज्य, वर्ग या सरकार की असफलता कहकर किनारे नहीं किया जा सकता। जरूरी है कि समस्या की जड़ों को समझा जाए और उसका हल किसान को दोषी बनाने के बजाय उसे भागीदार बनाकर खोजा जाए। हर साल अक्तूबर-नवंबर में दिल्ली की हवा की गुणवत्ता बिगड़ने लगती है, तो पंजाब व हरियाणा में पराली जलाने का मुद्दा राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन जाता है। केंद्र व राज्य सरकारें एक-दूसरे पर सवाल उठाती हैं। इस राजनीतिक खींचतान में मूल सवाल खो जाता है कि साफ हवा के लिए देश की साझा रणनीति कहां है? हालांकि, दिल्ली व उत्तर भारत के वायु प्रदूषण का कारण केवल पराली ही नहीं है। वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, धूल तथा कूड़ा जलाना आदि भी प्रदूषण की गंभीरता को प्रभावित करते हैं।
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पराली प्रबंधन के लिए विज्ञान ने कई विकल्प पेश किए हैं। हैप्पी सीडर, सुपर सीडर और अन्य उपयुक्त कृषि मशीनों की मदद से पराली को खेत में रखते हुए गेहूं की बुआई की जा सकती है। हालांकि, इसके लिए किसान को सही प्रशिक्षण और कृषि विशेषज्ञों की सलाह देना जरूरी है। दूसरा विकल्प बेलर और रैकर जैसी मशीनों की मदद से पराली की गांठें बनाकर उन्हें बायोमास बिजली घरों, बायोगैस व बायो-सीएनजी इकाइयों और कागज उद्योगों तक पहुंचाना है। इससे पराली आय का स्रोत बन सकती है।
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पूसा डीकंपोजर जैसे जैविक तरीके भी पराली को खेत में गलाने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। पर, इनकी सफलता विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है। केंद्र और राज्य सरकारों ने भी पराली प्रबंधन के लिए मशीनों पर सब्सिडी और साझा मशीन सेवा केंद्र जैसी पहलें की हैं। हर गांव में व्यावहारिक योजना बनाकर सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों और पंचायतों के जरिये मशीनों का साझा उपयोग बढ़ाना होगा। छोटे व जरूरतमंद किसानों को विशेष मदद देने के साथ तकनीक की मदद से मशीनों की उपलब्धता और पराली की खरीद भी सुनिश्चित करनी चाहिए।

पराली न जलाने वाले किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन देना भी जरूरी है। सरकारों को सुनिश्चित करना चाहिए कि किसानों को नियमों की स्पष्ट जानकारी मिले, वैज्ञानिक विकल्प समय पर उपलब्ध हों और कानूनी कार्रवाई निष्पक्ष तरीके से हो। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विभाग, किसान संगठनों और गांवों की सहकारी संस्थाओं को मिलकर खेत-स्तरीय प्रदर्शन करने चाहिए। जो किसान सफलतापूर्वक पराली का प्रबंधन कर रहे हैं, उनके अनुभव अन्य गांवों तक पहुंचाए जाएं।

पराली का हल राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। हवा की कोई सीमा नहीं होती। पंजाब के खेतों से उठने वाला धुआं अन्य क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है और दूसरे स्रोतों का प्रदूषण पंजाब के लोगों की सेहत पर असर डाल सकता है। इसलिए केंद्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सरकारों को साझा योजना के साथ काम करना चाहिए। केंद्र द्वारा वित्तीय सहायता, राज्यों द्वारा जमीनी प्रबंध, उद्योगों द्वारा पराली की खरीद और वैज्ञानिकों द्वारा तकनीकी मदद-इन सभी प्रयासों को एकसाथ आगे बढ़ाना होगा। पंजाब को फसल विविधीकरण अपनाते हुए धान पर निर्भरता घटानी होगी। जब दूसरी फसलें भी आर्थिक रूप से लाभकारी होंगी, तभी किसान भरोसे के साथ उन्हें अपनाएंगे।


सरकारों की कामयाबी जुर्मानों, छापों या बयानों की गिनती से नहीं, बल्कि इससे मापी जानी चाहिए कि कितने किसानों को किफायती विकल्प मिले, कितनी पराली बिना जलाए संभाली गई और हवा की गुणवत्ता में कितना सुधार आया। पंजाब के खेतों को धुएं से बचाने और देश के लोगों को साफ हवा देने के लिए राजनीति को दोषारोपण से ऊपर उठना पड़ेगा।

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