फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   The exact stake to visit Israel

इस्राइल यात्रा का सटीक दांव

Wed, 10 Jun 2015 07:54 PM IST
निकोलस ब्लारेल
निकोलस ब्लारेल Updated Wed, 10 Jun 2015 07:54 PM IST
विज्ञापन
The exact stake to visit Israel

नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से भारत और इस्राइल के बीच के रिश्तों के मद्देनजर बढ़ती रणनीतिक गहराई को बयां करने में सबसे सटीक उक्ति वह थी, जो इस्राइल के रक्षा मंत्री ने विगत फरवरी में अपनी भारत यात्रा के दौरान खुले तौर पर कही थी। उन्होंने इसे 'रिश्ते का सार्वजनिक' हो जाना कहा था। गौरतलब है कि अब तक दोनों देशों के बीच वाणिज्य और रक्षा क्षेत्रों में अपेक्षा से कम, मगर मजबूत रिश्ते रहे हैं। ऐसे में, भारतीय विदेश नीति के ज्यादातर विश्लेषकों ने दोनों देशों के रिश्तों में आई हालिया तेजी से आम जनमानस में जगी उत्सुकता का स्वागत किया है। वैसे, दोनों देशों के रिश्तों को लेकर लोगों का उत्साह कोई नई बात नहीं है, क्योंकि दोनों देशों के बीच जो कुछ भी हो रहा है, वह पिछले काफी समय से लगातार लोगों की नजर में है। अब पिछले दशक को ही लें। इस दौरान कई भारतीय मुख्यमंत्रियों ने कृषि और जल उपयोग तकनीक के क्षेत्र में मदद और निवेश की चाह से इस्राइल की यात्रा की। रक्षा क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच संयुक्त उपक्रम स्थापित हुए। भारतीय मीडिया ने इन सबको बहुत अच्छे से कवर भी किया। मगर जो बात भारत और इस्राइल के लोगों के बीच के रिश्तों के मद्देनजर मील का पत्थर बनने वाली है, वह है, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी इस्राइल यात्रा।

विज्ञापन


मोदी की इस यात्रा के महत्व की अनदेखी नहीं की जा सकती। इस्राइल की यात्रा करने वाले मोदी पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। इससे पहले एक दशक तक कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने राजनीतिक तौर पर इस्राइल की अनदेखी की थी। हालांकि यूपीए के कई मंत्रियों ने पिछले एक दशक के दौरान इस्राइल की यात्रा की। इसमें पूर्व विदेश मंत्री एस एम कृष्णा की 2012 की बेहद प्रतीकात्मक इस्राइल यात्रा भी शामिल है, जो उन्होंने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रिश्तों की शुरुआत की बीसवीं सालगिरह मनाने के उपलक्ष्य में की थी। मोदी की इस यात्रा की जरूरत इससे भी समझी जा सकती है कि 2003 में एरियल शैरोन की नई दिल्ली यात्रा के बाद से अब तक भारतीय प्रधानमंत्री की इस्राइल यात्रा की औपचारिकता भी नहीं निभाई गई।
विज्ञापन


नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भाजपा ने इस्राइल को हमेशा एक महत्वपूर्ण और भरोसेमंद सहयोगी माना है। ऐसे में, उनकी इस यात्रा की घोषणा पर कोई हैरत नहीं होनी चाहिए। दरअसल, 2006 में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर इस्राइल की यात्रा करने के बाद से ही मोदी इस रिश्ते के राजनीतिक आयाम को मजबूती देने की बात कहते आए हैं। जाहिर है कि बात इस्राइल यात्रा की राजनीतिक इच्छा की नहीं है, सवाल तो यह है कि अब आखिर ऐसा क्या हो गया है कि भारत सरकार को इस्राइल के साथ रिश्तों में नफा-नुकसान के आकलन की जरूरत महसूस हो रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह तर्क दिया जा सकता है कि मौजूदा हालात में इस्राइल यात्रा का मोदी का फैसला उचित नहीं है। फलस्तीन को लेकर दो-राष्ट्र वाले समाधान पर अपने अनमने रवैये को लेकर इस्राइल की नई सरकार पहले ही कूटनीतिक तौर पर अकेली पड़ती दिख रही है। फिर, स्वतंत्र फलस्तीन को लेकर भारत के ऐतिहासिक समर्थन को देखते हुए यह भी कहा जा रहा है कि इस यात्रा से अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भारत का पक्ष कमजोर होगा। कुछ का यह भी मानना है कि भारत अब तक पश्चिम एशिया में बहुध्रवीय व्यवस्था का समर्थक रहा है, मगर नेतनयाहू सरकार को खुला समर्थन देकर वह अपना समझौतावादी रुख ही दिखाएगा। इसके अलावा, मोदी की इस्राइल यात्रा भारत की मुसलमान आबादी को भी नाराज कर सकती है।

इन सबके बावजूद तीन बाते हैं, जिनकी वजह से भारत सरकार को वर्तमान भू-राजनीतिक संदर्भों में प्रधानमंत्री की इस्राइल यात्रा उचित जान पड़ सकती है। पहली, पश्चिम एशिया क्षेत्र के मौजूदा हालात में भारत के लिए संभावनाएं खुलती हैं। यह स्थिति कुछ मायनों में 1990 के दशक की शुरुआत जैसी है, जब भारत ने इस्राइल के साथ रिश्तों को सामान्य करने का फैसला किया था। तब खाड़ी युद्ध और ओस्लो शांति प्रक्रिया ने अरब मुस्लिम दुनिया के भीतर विभाजन को रेखांकित किया। इससे नरसिंह राव सरकार को मौका मिला कि वह अरब सहयोगियों को नाराज किए बगैर इस्राइल के साथ सामान्य रिश्ते बहाल कर लें। आज यमन में जो हालात हैं, उसमें शिया-सुन्नी (ईरान-सऊदी अरब) के बीच के विभाजन ने लोगों का ध्यान इस्राइल-फलस्तीन मुद्दे से हटा दिया है। ऐसे हालात ने भारत के लिए भी एक कूटनीतिक रास्ता खोल दिया है।

दूसरी बात यह है कि इस्राइल की इस यात्रा पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐतराज होने की आशंकाए सीमित ही दिख रही हैं। दरअसल, 1990 के दशक के अंत तक इस्राइल और भारत के रिश्तों को लेकर काफी गलतफहमियां थीं। मगर, इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि पिछले दो दशकों में, चाहे रक्षा क्षेत्र हो, या फिर कृषि व जल तकनीकी, भारत को इस्राइल की मदद मिलती रही है। फिर, चीन-इस्राइल के बढ़ते संबंधों को देखते हुए मोदी की यह यात्रा भारत और इस्राइल के बीच के पुराने रक्षा संबंधों को नई ताकत देगी।


तीसरी बात यह है कि मोदी सरकार पहले ही संयुक्त राष्ट्र में घोषणा कर चुकी है कि फलस्तीन के मुद्दे पर अपने पक्ष में कोई बदलाव लाए बगैर वह इस्राइल के साथ मजबूत रिश्ते चाहती है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी कह चुकी हैं कि विगत जुलाई में वह इस्राइल के साथ फलस्तीन और जॉर्डन की यात्रा भी करेंगी। अभी तय नहीं है कि मोदी फलस्तीन की यात्रा करेंगे या नहीं। मगर, एक ही यात्रा के दौरान बहुत से पश्चिम एशियाई देशों की यात्रा करके मोदी एक नई कूटनीतिक परंपरा का परिचय जरूर देंगे, जिसमें किसी खास देश को ज्यादा महत्व देने जैसा कोई संदेश नहीं होगा।

-लिडेन यूनिवर्सिटी, नीदरलैंड में इंटरनेशनल रिलेशंस के असिस्टेंट प्रोफेसर और द इवोल्यूशन ऑफ इंडियाज इस्राइल पॉलिसी के लेखक

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed