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विकास पर डॉ. कलाम का नजरिया और उनके आखिरी विचार

Fri, 15 Apr 2016 12:47 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Fri, 15 Apr 2016 12:47 PM IST
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the development ideas of Dr. Kalam and his book 'Advantage India'
डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम

शाश्वत विकास से हरियाली, प्रदूषण रहित स्वच्छ वातावरण, सभी के लिए समृद्धि, युद्ध के भय के बगैर शांति और विश्व में सभी देशों में सभी नागरिकों के लिए एक खुशनुमा स्थान को प्राप्त करने का सामर्थ्य मिलता है।

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स्वर्गीय डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम के यही वो आखिरी शब्द हैं- जो उन्होंने 17 जुलाई 2015 को शिलॉन्ग के एक व्याख्यान में कहे थे...और इसके बाद अब्दुल कलाम को किसी ने कुछ भी कहते हुए नहीं सुना। इन दो पंक्तियों में डॉक्टर कलाम ने न सिर्फ अपने जीवन के परम उद्देश्य के दर्शन करवाए हैं बल्कि काबिलियत के दम पर इस धरती को ठीक वैसा बनाने का अपना मकसद भी जाहिर कर दिया है और इसी से ये भी साफ हो जाता है कि वो किस सूत्रवाक्य की खातिर अपना सारा जीवन लगाना चाहते थे।
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डॉक्टर कलाम के आखिरी शब्दों को यूं तो कही जगह आदर्श वाक्य के तौर पर उद्घोषित किया जाता है लेकिन जिस एक जगह इस मंत्र को दस्तावेजी आकार देकर उसे सार्थक शक्ल प्रदान की है, वो है उनकी लिखी आखिरी पुस्तक 'एडवांटेज इंडिया' का वो 199 वां पन्ना, जहां उनके शिलॉन्ग के आईआईएम में दिए गए भाषण का ये हिस्सा दर्ज है।
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राजपाल एंड सन्स की ओर से प्रकाशित इस पुस्तक में डॉक्टर कलाम ने अपनी उस दृष्टि से परिचय कराया है, जिसके बारे में सिवाय डॉक्टर कलाम और उनके आस पास रहने वाले चंद मुट्ठी भर लोगों के अलावा शायद ही किसी को इल्म हो सकता है कि डॉक्टर कलाम कैसे मामूली से मामूली दिखने वाले हालात में भी उम्मीद और जज्बे का किस्सा देखने और सुनने की क्षमता रखते हैं।

एडवांटेज इंडिया चुनौतियों से उपलब्धियों तक पुस्तक में डॉक्टर कलाम और उनके सहयोगी की दिल्ली से जौनपुर की यात्रा का जिक्र है। इस यात्रा में कच्चे पक्के रास्तों से गुज़रते हुए डॉक्टर कलाम एक बार बादशाहनगर जैसे बेहद मामूली कस्बे पर रुकते हैं और वहां चाय पीने के लिए एक छोटी दुकान तक जाते हैं। लेकिन उस दुकान ने उनकी सोच और मानसिकता पर गहरा असर छोड़ा...क्योंकि उस दुकानदार के तौर तरीके और उसके व्यापार की आर्थिक समझ ने उनके भीतर एक तरह की जिज्ञासा भर दी, उसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए उन्होंने उस इलाके के दुकानदारों में छुपी उद्यमिता को करीब से देखा... और फिर वो फॉर्मूला बड़े बड़े कॉरपोरेट घरानों तक इस गरज से पहुंचाया... ताकि मुल्क के दूसरे हिस्से के हुनरमंद कारोबारियों को भी इसका फायदा मिल सके।

अपनी उस यात्रा के दौरान उनका कदम कदम पर मिलने वाली रुकावटों का जिक्र, खस्ताहाल सड़कों का अपनी आर्थिक तरक्की में पड़ने वाली बाधाओं का विश्लेषण और छोटे कस्बे के लोगों की आंखों में छुपे बड़े बड़े सपनों का आसमान उनकी इस किताब में देखने को मिलता है।

इस किताब के पहले ही हिस्से में डॉक्टर कलाम और किताब लेखन में उनके सहयोगी सृजन पाल सिंह की बातचीत पुस्तक और उनकी यात्रा के रोमांच और रोचकता का परिचय दे देती है... इतना ही नहीं बातचीत का वो ही हिस्सा ये भी तय कर देता है कि इस किताब से वाकई नए उद्यमी और तरक्की के रास्ते पर दौड़ती इस दुनिया के साथ कैसे कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ने का जज्बा पैदा कर सकते हैं।

अपने जीवन की इस अंतिम किताब के जरिए डॉक्टर कलाम ने ये भी बताने की पुरजोर कोशिश की है कि मौजूदा वक्त में स्वच्छ भारत, मेक इन इंडिया, स्मार्ट सिटीज़ जैसी योजनाएं वास्तव में देश की उस ताकत को एक दिशा दे सकती हैं जिसे ये मुल्क अपनी सबसे बड़ी ताकत भी समझता है.. और वो ताकत है देश की युवा शक्ति, जो डिजिटल युग के साथ कदम बढ़ाते हुए विकास के पथ पर इतनी आगे जा सकती है, जिसके बारे में शायद कोई मुल्क सपना तक नहीं देख सकता।


यूं तो डॉक्टर कलाम का भारत की तरक्की और तरक्की की दिशा में भारत के बढ़ते कदमों का उल्लेख अपने आप में किसी भी तरह के सबूत और दृष्टांत का मोहताज नहीं है... लेकिन फिर भी डॉक्टर कलाम एक शिक्षाविद भी हैं लिहाजा अपनी बात को तर्कों की कसौटी पर खरा उतारने के लिए उन्होंने जो आंकड़ों प्रस्तुत किए, उन्होंने उनकी बात और तर्क को खरा सोना बना दिया है।

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