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पाकिस्तानी सेना से टकराती अदालत
Thu, 19 Dec 2019 06:01 PM IST
Raman Singh
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर
Published by: Raman Singh
Updated Thu, 19 Dec 2019 06:01 PM IST
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परवेज मुशर्रफ
- फोटो : a
यह खबर बिल्कुल धमाके की तरह थी और सचमुच इस पर यकीन करना मुश्किल था। इस्लामाबाद की एक विशेष अदालत ने पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ को राजद्रोह के लिए मौत की सजा सुनाई। ऐसा पाकिस्तान में पहले कभी नहीं हुआ था, जहां असैन्य शासन के बजाय मार्शल लॉ का शासन ज्यादा रहा है। दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों और उच्च अदालतों ने 'जरूरी कानून' का उपयोग करके हमेशा मार्शल लॉ को न्यायोचित ठहराया है और सैन्य तानाशाहों ने पद छोड़ने के बाद चैन से आरामपूर्वक जीवन बिताया है। कोई भी उन्हें छूने की हिम्मत नहीं करता था। जनरल जिया उल हक जैसे अतीत के तानाशाहों ने संविधान का मजाक उड़ाया था और कहा था कि यह सिर्फ पंद्रह पेज का दस्तावेज था, जिसे वह आसानी से फाड़ सकते थे।
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लेकिन विशेष अदालत के इस नवीनतम फैसले को 'ऐतिहासिक' बताया जा रहा है, क्योंकि किसी को याद नहीं कि आखिरी बार कब पाकिस्तानी अदालतों ने शक्तिशाली सेना को चुनौती दी थी। अदालतें ज्यादा मुखर होती दिख रही हैं, जैसा कि इससे पहले वर्तमान सैन्य प्रमुख जनरल बाजवा को सेवा विस्तार देने के मामले देखा गया था। सरकार से कहा गया है कि संसद छह महीने में सेना अधिनियम में संशोधन करे या फिर प्रधानमंत्री इमरान खान एक नया सेना प्रमुख नियुक्त करें।
लेकिन विशेष अदालत का यह फैसला अलग है। हतप्रभ पाकिस्तानियों को उस विस्तृत फैसले का इंतजार है, जो बताएगा कि पूर्व सैन्य प्रमुख को राजद्रोह का दोषी क्यों घोषित किया गया और पाकिस्तान के संविधान का उल्लंघन करने के लिए मौत की सजा सुनाई गई। यहां तक कि रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय भी चकित है, क्योंकि उसने कभी सोचा भी नहीं था कि अदालतें इतनी साहसी होंगी कि उसके पूर्व सैन्य प्रमुख को फांसी देने का आदेश देंगी। सैन्य मुख्यालय यह समझने में विफल रहा है कि यह फैसला सैन्य प्रतिष्ठान के बारे में नहीं है, बल्कि सेना के एक पूर्व जनरल के बारे में है, जिसने संविधान का मजाक उड़ाया था। एक अभूतपूर्व कदम के रूप में सेना ने अदालत पर निशाना साधते हुए कहा कि सेना में इस फैसले से गम और गुस्सा है और मुशर्रफ देशद्रोही नहीं हैं।
मीडिया से बात करते हुए प्रधानमंत्री इमरान खान के कई वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे हैं, जिसमें उन्होंने मुशर्रफ को कई बार देशद्रोही कहा है। यह वीडियो तब का है, जब परवेज मुशर्रफ राष्ट्रपति थे और उन्होंने आपातकाल की घोषणा की थी। वास्तव में उन्होंने उसमें मुशर्रफ के खिलाफ बहुत कठोर भाषा का इस्तेमाल किया था। लेकिन आज उनकी पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ की सरकारी पूरी तरह से मुशर्रफ के समर्थन में है और अटॉर्नी जनरल ने कहा है कि जब इस मामले में अपील की जाएगी, तो वह अदालत में मुशर्रफ का समर्थन करेंगे।
यह स्पष्ट है कि इमरान खान सैन्य मुख्यालय को नाराज नहीं करेंगे और जब सैन्य मुख्यालय ने सार्वजनिक रूप से मुशर्रफ को अपना समर्थन दिया है, तो वह भी ऐसा ही करेंगे। लेकिन पाकिस्तान में लोकतंत्र समर्थक और प्रमुख राजनीतिक दल खुश हैं और इस फैसले को ऐतिहासिक बता रहे हैं। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने कहा कि यह एक लोकतांत्रिक फैसला है और उम्मीद है कि देश की अदालतें अब लोकतांत्रिक फैसले देना जारी रखेंगी। उन्होंने कहा कि 'अतीत में हमारी संस्थाएं हमेशा गैर-लोकतांत्रिक ताकतों के साथ खड़ी रहीं। लेकिन इस फैसले के बाद हम उम्मीद कर सकते हैं कि हमारी अदालतें आने वाले दिनों में न्याय और लोकतंत्र के पक्ष में खड़ी रहेंगी।'पीपीपी अध्यक्ष के लिए यह स्वागतयोग्य फैसला है, क्योंकि जब मुशर्रफ शासन में थे, तो उनकी मां बेनजीर भुट्टो की रावलपिंडी में हत्या कर दी गई थी और उन्होंने उन्हें चेतावनी दी थी कि अगर वह पाकिस्तान लौटती हैं, तो वह उनकी सुरक्षा के लिए जवाबदेह नहीं होंगे।
हालांकि इस बात की संभावना नहीं है कि मुशर्रफ कभी दुबई से पाकिस्तान लौटेंगे और उन्हें फांसी दी जाएगी। नवीनतम खबरों से पता चलता है कि वह गंभीर रूप से बीमार हैं और उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ती है। उन्होंने वर्ष 2016 में पाकिस्तान छोड़ा था और अंततः अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित किया था। तब उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था, क्योंकि अक्सर उन्हें तस्वीरों में गोल्फ खेलते और यहां तक कि पार्टियों में डांस करते देखा जाता था। लेकिन स्वस्थ होने के बावजूद उन्हें पाकिस्तान लौटने और अदालतों का सामना करने से डर लगता था।
बेनजीर भुट्टो के करीबी सहयोगी रहे पूर्व सांसद फरहतुल्लाह बाबर, जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के वरिष्ठ सदस्य हैं, ने कहा कि संविधान की सर्वोच्चता को बरकरार रखते हुए विशेष अदालत के न्यायधीश राष्ट्रीय नायकों की जमात में शामिल हो गए हैं। फैसले के बाद उन्होंने कहा कि परवेज मुशर्रफ को जिंदा रहने दिया जाए, उनके गुर्गों को उन्हें शहीद बनाने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। जब तक देशद्रोही या बेईमानी का यह बिल्ला उनके गले में लटका रहेगा, फैसले का उद्देश्य बेहतर ढंग से पूरा होगा। पाकिस्तान में बहुत से लोग मौत की सजा के खिलाफ हैं और कहते हैं कि इस तरह की सभी सजाओं को उम्रकैद में तब्दील कर देना चाहिए। फरहतुल्लाह कहते हैं कि 'मुशर्रफ को फांसी नहीं होगी, शायद उन्हें नहीं होनी चाहिए। मुशर्रफ की किस्मत महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि फैसले की प्रतीकात्मकता महत्वपूर्ण है। इतिहास यह दर्ज करेगा कि पहली बार एक तानाशाह को उच्च राजद्रोह के लिए, संविधान को पलटने के लिए मौत की सजा सुनाई गई। इसे किसी भी तरह से विस्मृत नहीं किया सकेगा।'
अब पाकिस्तान में मार्शल लॉ घोषित करना इतना आसान नहीं होगा, जैसा कि अदालत ने संकेत दिया है। शायद द न्यूज इंटरनेशनल ने इसे बहुत अच्छी तरह से कहा है कि एक चीज के बारे में इतिहास का सबक बहुत स्पष्ट हैः 'फैसला हो या न हो, कहीं भी कोई तानाशाह, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली, सुंदर और डरावना क्यों न हो, कभी-भी लोगों और देश की नियति पर कब्जा करने के लिए पर्याप्त मजबूत नहीं होता, यदि उसे इच्छा या अनिच्छा से, राजनीतिक या गैर-राजनीतिक ताकतों, अच्छे और बुरे लोगों और सामाजिक, राजनीतिक व न्यायिक संस्थाओं से सक्रिय सहयोग न मिले।'