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Kashi: कॉस्मिक काशी के कॉस्मेटिक कौतूहल

Sun, 05 Feb 2023 06:17 AM IST
gautam chatterjee गौतम चटर्जी
Updated Sun, 05 Feb 2023 06:17 AM IST
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सार
बाहर से दिखने वाली कॉस्मेटिक काशी इस क्षेत्र का मन है और इसका आंतरिक तत्व कॉस्मिक (वैश्विक) काशी यहां का हृदय। कॉस्मेटिक काशी में परिवर्तन संभव है, इसलिए होता रहता है। कॉस्मिक काशी अनादि, अनंत और अपरिवर्तनीय है।
 
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The Cosmetic Curiosities of Cosmic Kashi
काशी विश्वनाथ धाम - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काशी विश्व का सबसे प्राचीन शहर है। रोम का स्थान उसके बाद आता है। जाहिर है, इस प्राचीन शहर को अब तक खंडहर हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। कोविड के बाद काशी के प्रति कौतूहल में इतनी वृद्धि हुई है कि शहर भीड़ से भर गया है। पहले भी पूरी दुनिया यहां सदियों से आती रही है। हर कोई यहां आना और आकर रहना चाहता है। बाहर से आए जिस किसी से भी पूछो, वह यही कहता है कि यह शहर उसे पसंद है, यहीं बस जाने का मन करता है। लेकिन क्यों, इसका उत्तर साफ तौर पर मिल नहीं पाता।



इस रहस्य को हम इस तरह से समझ सकते हैं। बाहर से दिखने वाली कॉस्मेटिक (पार्थिव या भौगोलिक) काशी इस क्षेत्र का मन है और इसका आंतरिक तत्व कॉस्मिक (वैश्विक) काशी यहां का हृदय। कॉस्मेटिक काशी में परिवर्तन संभव है, इसलिए होता रहता है। कॉस्मिक काशी अनादि, अनंत और अपरिवर्तनीय है। कॉस्मेटिक काशी में भीड़ है, धूल है, शोर है, अपशब्द और आदिम जनजातीय व्यवहार है। कॉस्मिक काशी में यहां के ऋषि-मुनियों की अहर्निश और अक्षुण्ण तपस्या है, मानव कल्याण के वरेण्य व्रत हैं। असंख्य साधकों की आत्मिक तरंगें पूरी पृथ्वी को आकर्षित करती हैं, इसलिए वे यहां खिंचे चले आते हैं, क्योंकि वही उनकी अपनी आत्मा है, वही शिव उनकी आंतरिक पृथ्वी का लयात्मक सौंदर्य है, आनंद गान है। चूंकि वे कॉस्मेटिक शहर को देखते हैं, शहर के मन से जुड़ते हैं इसलिए उत्तर नहीं दे पाते। शहर का हृदय कब उनके हृदय से जुड़ गया, उन्हें पता ही नहीं चल पाता। कॉस्मिक होने की संभावना यहीं है।


कॉस्मेटिक काशी का इतिहास कुछ इस तरह है, जिसे अभी तक लिखा नहीं गया है। महाजनपद बनने से पहले यह आनंद कानन था। वृहत्तर भारतवर्ष में एकमात्र स्थान, जहां ऋषि-मुनि सहज ही साधना कर सकते हैं और जीवन को वैदिक बना सकते हैं। उन्होंने ही यहां की कॉस्मिक कहानी रची, जिसमें मनुष्य का आध्यात्मिक उत्तरण था। यह बुद्ध से पहले की बात है। तब यह क्षेत्र पंचक्रोशी था यानी तब के पांच कोस में विस्तृत, जो अभी तक है। उन्हीं दिनों में एक जनजाति यहां आकर रहने लगी, जिसका नाम था कासिस। उनके कारण आनंद कानन का नाम हुआ कासी, जिसका तत्सम उच्चार है काशी।

पूरे देश के परिप्रेक्ष्य में यह महाजनपद बना। इसका कॉस्मेटिक क्षेत्र कन्नौज से गोरखपुर तक फैलता रहा। यहां वरुणा और असि नदियों के कारण एक सीमित क्षेत्र वाराणसी प्रकट हुआ। गुर्जर प्रतिहार शासन तक वाराणसी कई बार काशी की राजधानी बनी। गहरवाड शासन में यानी 10 वीं शती में चंद्रदेव जैसे शासक ने यहां पंचक्रोशी में स्थित एक शिव मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, जो छठी शती ईसवी का है और जो पंचक्रोशी में आने वाले पांच मंदिरों में प्रथम है। यही वह एकमात्र मंदिर है, जिस पर आतताइयों की छाया नहीं पड़ सकी। यही वह स्थान है, जहां कर्दम और भरत मुनि हुए। सांख्य दर्शन के प्रतिष्ठाता कपिल मुनि कर्दम मुनि के ही पुत्र हैं।

अब तक यह पूरा क्षेत्र अर्धोन्मीलित अवस्था में है। यानी आंख आधी खुली हुई और आधी बंद, शिवचक्षु की तरह। आधी बंद आंख कॉस्मेटिक काशी है और आधी खुली आंख कॉस्मिक काशी। इस तरह हम इस क्षेत्र के मन कॉस्मेटिक काशी को वाराणसी और हृदय कॉस्मिक काशी को काशी कह सकते हैं। मन इस क्षेत्र का आवरण है, जो निरावरण प्रकाशमय काशी पर छाया रहता है। 20 वीं शती में यहां रहकर कई महापुरुषों ने इस आवरण को अपनी योग प्रविधि के बूते हटाया और यहां की प्राचीन और दुनिया की पहली शैवदृष्टि को फिर से प्रतिष्ठित करने में सफलता पाई, जिनमें हम श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय और पंडित गोपीनाथ कविराज का नाम ले सकते हैं। उनके क्रियायोग और अखंड महायोग इस समय पूरी पृथ्वी का अनवरत कौतूहल हैं।

लोग इस कारण भी यहां खिचे चले आते हैं। पर त्रासदी यह है कि उन्हें ऐसी योग प्रविधियों के बारे में बताने वाला कोई नहीं है। शिक्षा, संगीत आदि की तरह अध्यात्म भी इन दिनों कॉस्मेटिक काशी यानी वाराणसी में लुप्तप्राय है। समय के साथ जनजातीय व्यवहार प्रगाढ़ होता रहा है।

कबीर की काशी में सभी अध्यात्म को समझना चाहते हैं, जैसे इतिहास को समझते हैं। अरूप अनुभूत करने की आंतरिक शक्ति प्रज्ञा है और रूप को समझने के लिए बाहरी इन्द्रियां। दोनों ही शक्तियां मनुष्य मस्तिष्क में उपहार की तरह उपलब्ध हैं। समझने वाला मस्तिष्क धार्मिक और दैव प्रतीकों को भी इतिहास दृष्टि से समझना चाहते हैं, लेकिन उन्हें कौन बताए कि दैव प्रतीकों का इतिहास क्रम नहीं होता कि पहले ब्रह्मा आए, फिर सरस्वती आईं, मानो पहले मुगल आए, फिर अंग्रेज। कॉस्मेटिक मन कॉस्मिक भाव को समझना चाहता है। आत्मा के बारे में यहां के योगियों ने तंत्रभाषा में बताया है कि आत्मा मनुष्य देह में स्थित है और उसकी लंबाई आठ उंगली है, जिसके आधार पर शिवलिंग का प्रतीक रचा गया। लेकिन यह आंतरिक स्थिति उसी तरह अरूप है, जैसे इड़ा और सुषुम्ना नाड़ियां। इसी दृष्टि से कॉस्मिक काशी में नटराज का वैश्विक नर्तन प्रतिपल सक्रिय है।
 

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