कांग्रेस नेतृत्व की दुविधा
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कांग्रेस को कवर करने वाले लेखकों के लिए इससे अच्छा और इससे बुरा अनुभव कभी नहीं रहा। हर रोज मीडिया का एक वर्ग आशा के अग्रदूत के रूप में प्रियंका गांधी के राजनीति में औपचारिक प्रवेश की घोषणा के कयास लगाता है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की भूमिका के बारे में भी लगातार अटकलें जारी हैं। इसके साथ ही इन खबरों को खारिज करने की बातें भी सामने आती हैं। एक भी दिन ऐसा नहीं जाता होगा, जब इन उच्च पदस्थ सूत्रों (गुलाम नबी आजाद) के आधार पर जारी मीडिया रिपोर्ट से इन्कार किया जाता हो।
हालांकि हाल ही में राज बब्बर को पार्टी की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया है। जिस बैठक में राज बब्बर को प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाने का फैसला हुआ, उसमें प्रियंका गांधी भी शामिल थीं। लेकिन यह देखने वाली बात होगी कि प्रियंका गांधी राज बब्बर को चुनाव प्रचार के दौरान कितना सहयोग करती हैं। उनकी सक्रिय भागीदारी के बिना राज बब्बर स्थितियों में बहुत ज्यादा बदलाव ला पाएंगे, इसकी संभावना कम है। यह ठीक है कि वह अच्छे वक्ता और सुलझे हुए नेता हैं, लेकिन मौजूदा स्थिति में अकेले दम पर कांग्रेस के लिए वोट बटोर पाने की बहुत ज्यादा क्षमता उनमें नजर नहीं आती।
कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि रणनीतिकार प्रशांत किशोर की उपस्थिति के कारण पार्टी के भीतर रस्साकशी चल रही है। निश्चित रूप से कोई नहीं जानता कि दो विरोधी पक्षों में से कौन गलत है। तटस्थ लोगों का कहना है कि यह प्रचार हलचल पैदा करने, मीडिया में जगह घेरने और पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने का हिस्सा है, लेकिन संचार रणनीति के जानकारों का कहना है कि इस प्रकार की रणनीति पार्टी के लिए आत्मघाती है।
आने वाले समय में दो में से एक बात सिद्ध हो जाएगी-या तो प्रशांत किशोर की बातों को राहुल-सोनिया गांधी वाकई सुनेंगे या प्रशांत किशोर अप्रासंगिक हो जाएंगे। अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक, कुछ भी स्पष्ट रूप से उभरकर सितंबर में सामने आएगा, जब कांग्रेस में बहुप्रतीक्षित नेतृत्व का फैसला होगा। क्या सोनिया गांधी राहुल को नेतृत्व सौंपेंगी या राहुल के साथ प्रियंका को भी कांग्रेस के नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी?
कामकाज के स्तर पर राहुल गांधी की टीम को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के कई पदाधिकारियों से समस्याएं होती हैं। यह एक खुला तथ्य है कि राहुल पार्टी प्रमुख का पदभार संभालने से पहले अहमद पटेल, मोतीलाल वोरा, जनार्दन द्विवेदी, बीके हरि प्रसाद, अंबिका सोनी जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को औपचारिक रूप से महत्वपूर्म पदों से हटाना चाहते हैं। लेकिन कथित तौर पर सोनिया गांधी ने इस तरह से कार्यकारिणी से किसी को बाहर करने से मना किया है। यही एक कारण है, जिसके चलते नेतृत्व के मुद्दे पर फैसला करने में देरी हो रही है। कांग्रेस के नए महासचिव के रूप में गुलाम नबी आजाद और कमलनाथ के चयन से साफ जाहिर है कि सोनिया गांधी नहीं चाहतीं कि राहुल कठोरता से कांग्रेस के पुराने सिपहसालारों को प्रमुख पदों से हटाने का कदम उठाएं।
कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रशांत किशोर के उभार के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। कोई भी दिन ऐसा नहीं बीतता होगा, जब सोनिया और उनके राजनीतिक सचिव अहमद पटेल को प्रशांत किशोर के कामकाज के रवैये को लेकर शिकायतें एवं चिट्ठियां न मिलती हों। लेकिन कुछ बातें हैं, जो प्रशांत किशोर के पक्ष में हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के कारण इन दिनों प्रियंका गांधी की तरफ लोगों का ध्यान गया है।
प्रशांत किशोर की प्रारंभिक प्रतिक्रिया थी कि उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी की सक्रिय भागीदारी के बिना फिर से जी उठने वाली भाजपा, सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और अनुशासित बसपा के खिलाफ कांग्रेस के खड़े होने की संभावना शून्य है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस किसी क्षेत्रीय कद्दावर नेता के अभाव में बुरी तरह से गांधी-नेहरू परिवार पर निर्भर है।
प्रशांत किशोर ने सफलतापूर्वक राहुल एवं सोनिया गांधी को इस बात के लिए मना लिया है कि पार्टी को उत्तर प्रदेश चुनाव में एक केंद्रीय चेहरा चाहिए, जैसे लोगों ने नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडु जैसे चेहरों को वोट दिया। राजनीतिक रूप से जागरूक उत्तर प्रदेश के मतदाता श्रीप्रकाश जायसवाल या बेनी प्रसाद वर्मा जैसे अपेक्षाकृत अनजान और बिना करिश्मा वाले नेता को वोट नहीं देना चाहेंगे।
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी हार के तुरंत बाद मई, 2014 में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने राजीव गांधी की हत्या के बाद यासिर अराफात की मई, 1991 में शोक यात्रा के बारे में एक कहानी सुनाई थी। बातचीत के क्रम में कांग्रेसी नेताओं के समूह ने पश्चिम एशिया के उस नेता से कहा, भाई, हम अपने चारों तरफ बस अंधेरा देखते हैं। अराफत ने गहरी संवेदना के साथ एक अरबी कहावत के जरिये उन्हें सांत्वना देने की कोशिश की, जब धूल भरी आंधी हमें घेर लेती है, तो हम उससे जूझने के बजाय थोड़ा झुक जाते हैं। आंधी के गुजर जाने के बाद हम फिर से उठ खड़े होते हैं।
अब इस सवाल को लेकर कांग्रेस खेमे में चर्चा चल रही है कि आखिर कब कांग्रेस फिर से संगठित या खड़ी होगी। कब राहुल और सोनिया गांधी इतना साहस जुटा पाएंगे, और कब उन्हें यह अंतर्दृष्टि मिलेगी कि वे अपनी पार्टी को फिर से व्यवस्थित और संगठित करें? और कब प्रशांत किशोर को ऐसा वातावरण मिलेगा कि यह चुनावी चाणक्य अपने विचारों को कार्यरूप दे सके। जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिल जाते, तब तक कांग्रेसी नेता यह गाने के लिए मजबूर होंगे--कम सेप्टेम्बर, एवरीथिंग रांग गोना बी ऑलराइट, कम सेप्टेम्बर... (आओ सितंबर, जो कुछ भी गलत हुआ है, सब ठीक हो जाएगा, आओ सितंबर)। लेकिन क्या ऐसा होगा?
-वरिष्ठ पत्रकार और 24, अकबर रोड के लेखक