फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   The challenge of fulfilling expectations

उम्मीदें पूरी करने की चुनौती

Sun, 17 Aug 2014 05:29 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
नीलांजन मुखोपाध्याय Updated Sun, 17 Aug 2014 05:29 PM IST
विज्ञापन
The challenge of fulfilling expectations

लाल किले से स्वतंत्रता दिवस के अपने पहले भाषण के बाद नरेंद्र मोदी को अपने कामकाज में जुट जाना पड़ेगा। यह इसलिए भी बेहद जरूरी है, क्योंकि प्रधानमंत्री के भाषण से जो उत्साह और उम्मीद पैदा हुई है, वह पिछले कई वर्षों में नहीं देखी गई। यह साफ है कि मोदी लहर बरकरार है और जनता उन पर भरोसा कर रही है, जबकि अच्छे दिन अभी आने बाकी हैं। निश्चय ही, मोदी ने जो वायदे किए हैं, उन्हें पूरा करने के लिए योजनाबद्धता भी जरूरी है और कौशल भी।

विज्ञापन


अब जातिगत और सांप्रदायिक हिंसा पर दस साल तक रोक लगाने के उनके सुझाव को ही लें। क्या प्रधानमंत्री यह कह रहे हैं कि दस साल बाद सांप्रदायिक हिंसा की वापसी होती है, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है? सवाल यह है कि आखिर ऐसी हिंसा पर तय समयावधि के लिए अंकुश लगाना वह सुनिश्चित कैसे करेंगे। जाति और संप्रदाय की हिंसा के पीछे कोई एक संगठन तो होता नहीं कि उससे संवाद का आह्वान किया जाए। मोदी अगर कहते कि माओवादियों के साथ संघर्ष विराम लागू किया जाएगा, तो इसे समझा जा सकता था, क्योंकि वैसी स्थिति में सरकार उन्हें बातचीत के लिए आमंत्रित कर सकती है। लेकिन उस सांप्रदायिक हिंसा पर अंकुश लगाने के लिए आप किसे बुलाएंगे, जो दो समुदायों के कट्टर समूहों के उकसावे से फैलती है? या उन लोगों के साथ आप कैसे और किस तरह संवाद स्थापित करेंगे, जो सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के विरुद्ध युद्ध छेड़ते हैं?
विज्ञापन


राजनीति के तौर-तरीके को बदले बिना सांप्रदायिक और जातिगत हिंसा कतई नहीं रोकी जा सकती। मोदी शांति की बात करें और उनके कुछ पार्टीजन कट्टरवादी रास्ता चुनें, इससे समाधान नहीं होगा। पिछले सप्ताह सांप्रदायिक हिंसा पर संसद में जो बहस हुई, उसमें भाजपा के सांसद योगी आदित्यनाथ का रुख प्रधानमंत्री से मेल नहीं खाता था। बहस के दौरान उन्होंने कहा, 'हिंदुओं को जब धमकाया जाता है, तब उन्हें संगठित होकर मुकाबला करना चाहिए।' ऐसे में, सांप्रदायिक हिंसा पर अंकुश लगाना मोदी के लिए स्वाभाविक तौर पर कठिन होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन


स्कूली बच्चों के लिए शौचालय के प्रधानमंत्री के सुझाव पर काफी कुछ कहा जा चुका है। यहां चुनौती स्कूलों में शौचालयों के निर्माण की नहीं है, क्योंकि यूपीए के दौर में इस पर काफी काम हो चुका है। वर्ष 2013-14 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, करीब 85 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय हैं। चुनौतियां दूसरी हैं। जैसे कि देश में स्कूलों की भारी कमी है। इसके अलावा जिन स्कूलों में लड़कियों के शौचालय हैं, उनमें से अधिकांश में या तो ताले लगे रहते हैं या उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। स्थिति तो हमारे शहरों के सार्वजनिक शौचालयों की भी बेहद खराब है, जिस कारण लोगों को निबटने के लिए खेतों में जाने या खुले में खड़े होने का पुराना तरीका अपनाना पड़ता है।

सरकार के भीतर से जो संकेत आ रहे थे, उसमें योजना आयोग को खत्म करने का फैसला प्रत्याशित ही था। पर जो संस्था उसकी जगह लेने जा रही है, उस पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। संस्थाओं को लोकतांत्रिक तरीके से काम न करने देना मोदी के स्वभाव में है, इसलिए नई संस्था के बारे में कौतूहल पैदा होना स्वाभाविक है। क्या यह नई संस्था केंद्रीकरण को बढ़ावा देगी, जो मोदी के कामकाज के तरीके के अनुरूप है या प्रधानमंत्री संघीय व्यवस्था के अनुरूप राज्यों को स्वतंत्र तरीके से चलने देंगे? इस सवाल का जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में है।

बहरहाल, मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को प्रोत्साहित करने की बात कहकर हमारे प्रधानमंत्री ने उस चीन को चुनौती दी है, जो वर्षों से अर्थव्यवस्था के इस क्षेत्र का निर्विवाद नेता है। उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में विदेशी इक्विटी का जो निमंत्रण दिया है, उसका भी राजनीतिक तौर पर विरोध हो सकता है। इसके विरोधियों में संघ परिवार से जुड़े ट्रेड यूनियन और कृषि क्षेत्र से जुड़े संगठन हो सकते हैं। एनडीए सरकार ने हाल ही में श्रम सुधार से जुड़े जो कदम उठाए, संघ परिवार ने उसका विरोध किया। ऐसे में, क्या प्रधानमंत्री अपनी मातृ संस्था के भीतर से उठने वाली आवाजों को शांत कर पाएंगे?

नरेंद्र मोदी ने महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री जन धन योजना की घोषणा की है। यह देखना है कि इसे कैसे लागू किया जाएगा और इसके बीमा से जुड़े हिस्से को कैसे पेश किया जाएगा। क्या लोगों से प्रीमियम जमा करने के लिए कहा जाएगा? बीमा का लाभ मृत्यु के बाद परिजनों को मिलेगा या कार्यक्षेत्र में दुर्घटना की स्थिति में? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि समाज के जिस क्षेत्र के लिए यह सहूलियत लक्षित है, वे हिंसा और जोखिम की स्थितियों में अधिक अरक्षित होते हैं। ग्रामीण विकास को जमीनी स्तर पर शुरू करने और इसे व्यक्तिगत स्तर पर हर सांसद की सीधी भागीदारी से जोड़ने का कदम महत्वपूर्ण तो है ही, यह एक अर्थपूर्ण बदलाव भी है। इससे 'माई-बाप' की छवि से इतर सरकार की ऐसी छवि निर्मित होगी, जो सेवा प्रदाता के तौर पर जनता का भाग्य बनाता है।


नरेंद्र मोदी ने अपनी पिछली आक्रामक छवि त्याग दी है, जो बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन उतना ही जरूरी अब निरंतर बेहतर कामकाज का प्रदर्शन करना भी है। उनसे चूक यह हुई कि शुरुआती पचास दिनों तक स्थितियों को उन्होंने उनके हाल पर छोड़ दिया। पर लोगों का समर्थन व भरोसा वापस पाने के बाद वह सार्वजनिक आलोचना का जोखिम नहीं उठा सकते। तब तो और नहीं, जब उनकी सरकार के सौ दिनों की अवधि ज्यादा दूर नहीं है।

(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed