फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   The Board proceeded to beat the ewer

मंडल से कमंडल को मात देने की तैयारी

Fri, 18 Jul 2014 08:19 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
उमेश चतुर्वेदी Updated Fri, 18 Jul 2014 08:19 PM IST
विज्ञापन
The Board proceeded to beat the ewer

तो यह तय हो गया कि बिहार का अगला विधानसभा चुनाव दोनों भाई मिलकर ही लड़ेंगे। बात हो रही है लालू प्रसाद यादव और जनता दल यूनाइटेड की। इसकी शुरुआत अगले महीने होने जा रहे विधानसभा उपचुनावों से होने जा रही है। 11 विधानसभा सीटों के लिए हो रहे चुनाव में दोनों दल साथ उतरेंगे और उम्मीद की जा रही है कि भाजपा-लोकजनशक्ति और राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी गठबंधन से मुकाबला करेंगे।

विज्ञापन


समाजवादी राजनीति में 1994 के पहले तक दोनों नेताओं को भाई-भाई के तौर पर ही देखा जाता रहा है। लालू यादव खुद को बड़ा भाई बताते रहे हैं और नीतीश कुमार को छोटा। यह बात और है कि 1993 से दोनों भाइयों में बनना बंद हुआ और दोनों राजनीतिक तौर पर एक-दूसरे की जान के दुश्मन बन गए। जिसकी परिणति नीतीश कुमार की अगुआई में समता पार्टी के गठन के तौर पर सामने आई। भाजपा से नीतीश कुमार की समता पार्टी का गठजोड़ पूरे 17 साल चला और 2013 में यह गठबंधन जब टूटा, तब से अब तक इस मसले पर न जाने कितना लिखा जा चुका है। सवाल है कि क्या नीतीश कुमार की नजर में वह लालू यादव बदल गए हैं, जिन्हें वह बिहार में जंगल राज का वाहक मानते हुए उनसे जनतांत्रिक ढंग से सत्ता हथियाई थी।
विज्ञापन


पिछले आम चुनावों के पहले तक नीतीश कुमार को उम्मीद थी कि अपने आठ साल के शासन में उन्होंने जिस तरह महादलित और अतिपिछड़ों के उत्थान की योजनाएं चलाईं, उनका फायदा उन्हें जरूर मिलेगा। भाजपा से अलग होने के बाद नीतीश कुमार को उम्मीद तो यह भी थी कि उन्हें मुस्लिम वोटरों का भरपूर साथ मिलेगा। पता नहीं, उनके किन सलाहकारों ने ये सलाहें दीं। लेकिन नतीजों ने साबित किया कि सलाहकार तो गलत थे ही, उन पर अमल करने वाले नीतीश कुमार भी फिसड्डी रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन


आम चुनाव के नतीजों में राजद नीतीश कुमार के जेडीयू से भी बड़ा दल बना। उसे चार सीटें और 20.1 फीसदी मत मिले। जबकि जदयू को सिर्फ दो सीटें और 15.8 फीसदी वोट मिला। राजद के साथ कांग्रेस का गठबंधन था। उस कांग्रेस का, जिसके उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने लालू यादव को जेल से बाहर लाने की भूमिका तैयार कर रहे अध्यादेश को ही कूड़ेदान में डालने वाला बताकर फाड़ दिया था। उस कांग्रेस को बिहार में लालू का साथ देने का फायदा महज 8.4 फीसद वोटों के तौर पर मिला और सिर्फ एक लोकसभा सीट से संतोष करना पड़ा। कांग्रेस की महाराष्ट्र में सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को तो उसकी तुलना में करीब एक चौथाई यानी 1.2 फीसद वोट ही मिला। लेकिन उसे भी तारिक अनवर के तौर पर एक सीट मिल गई। भाजपा को 29.4 फीसदी वोट और 22 सीटें मिलीं। उसकी सहयोगी लोकजनशक्ति पार्टी को छह सीटें और 6.4 प्रतिशत वोट मिला। दूसरी सहयोगी राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी को तीन प्रतिशत वोट और इतनी ही सीटें मिलीं। कुल मिलाकर नीतीश कुमार का सपना धाराशायी रहा।


राजद से नीतीश का गठबंधन नीतीश की ही पहल पर हो रहा है। दोनों दलों के साथ ही अगर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के वोटों को जोड़ दें, तो यह 45.5 फीसदी बैठता है। जबकि भाजपा गठबंधन का सिर्फ 38.8 फीसदी ही वोट बैंक बनता है। यानी अगर अगले चुनाव में दो गठबंधन के तौर पर लड़ाई हुई, तो निश्चित तौर पर आमने-सामने की लड़ाई में लालू-नीतीश का गठबंधन भारी रहेगा। जाहिर है कि विधानसभा चुनाव की नजर से ही यह गठबंधन बनाया जा रहा है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति में दो जमा दो हमेशा चार नहीं होता।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed