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यही तो भारत की विशेषता है
अवधेश कुमार
Updated Thu, 22 Oct 2015 06:48 PM IST
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भारत को लेकर हम प्रायः निराश प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। हम मानते हैं कि जब समाज प्रतिकार नहीं करता, तो गलत करने वालों का हौसला बढ़ता है, वे ज्यादा बड़ी गलतियां करते हैं और उनकी संख्या बढ़ती जाती है। यह मनोविज्ञान पूरी तरह गलत नहीं है। किंतु यह पूरी स्थिति का एक पहलू है। जरा दूसरे पहलू को देखिए। शिवसेना ने सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर कालिख पोतने वाले अपने कार्यकर्ताओं के इस कार्य को न केवल महिमामंडित किया, बल्कि उद्धव ठाकरे ने उन्हें सम्मानित भी किया।
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दूसरी ओर जो लोग कुलकर्णी द्वारा पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की पुस्तक के विमोचन और उसके प्रचार को लेकर अपनाई जा रही भूमिका के घोर विरोधी थे, उन्होंने भी कालिख पोते जाने का विरोध किया। महाराष्ट्र में शिवसेना न केवल भाजपा की गठबंधन सरकार में है, बल्कि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का भी हिस्सा है। इसके बावजूद भाजपा ने औपचारिक तौर पर इसका विरोध किया। भारत का यह एक और रूप है, जो हमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन जैसे पड़ोसी देशों से अलग करता है।
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कल्पना कीजिए कि किसी भारतीय की पुस्तक के विमोचन को लेकर कोई पाकिस्तानी ऐसे ही सक्रिय होता और उसके चेहरे पर कालिख पोती जाती, तो पाकिस्तान में इसके विरुद्ध किस तरह की प्रतिक्रिया होती। जियो टीवी के पत्रकार हामिद मीर की दशा देखिए। उन्होंने कोई पाकिस्तान-विरोधी बात नहीं की थी, सेना द्वारा सरकार में हस्तक्षेप पर प्रश्न उठाए थे, आतंकवादियों के खिलाफ आवाज उठाई थी। वह मरते-मरते बचे और आज भी सार्वजनिक तौर पर काम नहीं कर सकते। बांग्लादेश में भी अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ प्रताड़ना तथा उनके जबरन धर्म परिवर्तन की घटनाएं सामने आतीं हैं। तस्लीमा नसरीन ने थोड़ी आवाज उठाई, तो उनकी दशा देख लीजिए।
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दूसरी ओर यहां दादरी के बिसाहड़ा में अफवाह में इकलाख नामक व्यक्ति की हत्या कर दी गई। चारों ओर से इसकी निंदा हुई। कुछ साहित्यकारों ने पुरस्कार वापसी की घोषणा भी कर दी। उनके विरोध और समर्थन में भी लोग हैं। कर्नाटक में एमएम कलबुर्गी की हत्या हुई। उसकी सबने निंदा की। कलबुर्गी एक नामी इतिहासकार, साहित्यकार एवं चिंतक थे। वह हिंदू धर्म के अनेक प्रतीकों या कर्मकांडों का उपहास उड़ाते थे, जिसकी वजह से उनसे असहमत होने वालों की संख्या भी कम नहीं थी। लेकिन जब उनकी हत्या हुई, तो पूरे देश ने उसकी निंदा की। महाराष्ट्र के दो ऐसे ही सकिय्रतावादियों की हत्याओं का विरोध पूरे देश ने किया। उसकी जांच चल रही है।
बांग्लादेश में तीन ब्लॉगरों की हत्या हो गई, जो मजहबी कट्टरता के विरुद्ध आवाज उठाते थे। उनकी नृशंस हत्या की पूरी दुनिया में निंदा की गई। ऐसी घटनाओं पर जिस तरह का मुखर विरोध भारत में दिखता है, वह बांग्लादेश में कहां दिखा? वहां समाज का वातावरण ऐसा बना हुआ है, जिसमें खुलकर ऐसी हत्याओं के विरोध में आने से लोग डरते हैं। यह सामूहिक डर हमारे पड़ोस के कई देशों में दिखता है। गुलाम अली के मुंबई एवं पुणे के दो गायन कार्यक्रम शिवसेना के विरोध में रद्द हुए, तो ऐसे लोग भी खड़े हो गए, जिन्होंने कहा कि हम पाकिस्तान नहीं हो सकते। आप किसी घटना का विरोध कीजिए, समर्थन कीजिए; पर यह भारत में ही संभव है, पाकिस्तान या बांग्लादेश में नहीं।