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शुक्रिया डॉ रघुराम राजन

Tue, 06 Sep 2016 07:24 PM IST
mohandas pai मोहनदास
Updated Tue, 06 Sep 2016 07:24 PM IST
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Thank you, Dr. Raghuram rajan
टीवी मोहनदास पई

डॉ रघुराम राजन शिक्षा जगत में लौट गए, जहां से वह आए थे। उनका लौटना उन लोगों को खल रहा है, जो उनके प्रति स्नेह रखते हुए इस उम्मीद में उनका सम्मान करते थे कि वह हमारी वित्तीय व्यवस्था को खोलेंगे और उसे अनावश्यक नियमों से मुक्त करेंगे। उन्होंने बहुत अच्छा काम किया, लेकिन अपना काम वह अधूरा छोड़ गए। उन्हें अगर दो और वर्ष मिलते, तो शायद हम उस शानदार दृश्य को देख पाते, जिसे वह पूरी भव्यता के साथ चित्रित कर रहे थे। लेकिन यह नहीं होना था और यही भारत की कहानी है-तीन कदम आगे और एक कदम पीछे-यानी सुधार फिर भी निराशाजनक।


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जब वह रिजर्व बैंक के गवर्नर बने, तो रुपया काफी कमजोर था। उन्होंने उन तत्वों को पहचाना जो व्यापक रूप से अटकलें लगा रहे थे और फिर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करके उनकी रीढ़ तोड़ दी। उन्होंने जमा के रूप में 30 अरब डॉलर पाया, हमारे लालची बैंकों को प्रोत्साहित किया और हमारे मुद्रा भंडार को मजबूती देना सुनिश्चित किया। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह चुनौतियों से घबराते नहीं थे। वह दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संस्थान से आए थे, उसकी कार्यपद्धति को जानते थे और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख अर्थशास्त्री होने के नाते वह वैश्विक बाजारों को जानते थे कि वे कैसे काम करते हैं। वह बहुत साहसी और स्पष्टवादी हैं। शिकागो यूनिवर्सिटी में काम करते हुए वह वैकल्पिक वित्तीय सोच के एक बड़े केंद्र में थे और स्वभाव से प्रतिमाभंजक। डॉ रघुराम राजन के रूप में भारत के पास एक ऐसा गवर्नर था, जो बड़ी-बड़ी वित्तीय व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर जानता था और जो जरूरत पड़ने पर साहसिक फैसले ले सकता था।

उन्होंने क्रांतिकारी बदलाव लाया। मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के लिए लंबे समय से थोक मूल्य सूचकांक (डब्लूपीआई) पर निशाना साधने के बजाय उन्होंने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर निशाना साधा। पहली बार रिजर्व बैंक के किसी गवर्नर ने हमें बताया कि उपभोक्ता और बचतकर्ता के रूप में डब्लूपीआई के मुकाबले सीपीआई हमें ज्यादा प्रभावित करता है। उन्होंने इसे हमें 'डोसा अर्थशास्त्र' का उदाहरण देकर समझाया। यह ज्यादातर उन लोगों को समृद्ध बनाता है, जो सरकार से उधार लेते हैं। शायद ही कोई देश होगा, जहां भारत की तरह करोड़ों बचतकर्ताओं का इतना विशाल धन लंबे समय तक मिलीभगत से चंद पूंजीवादी लोगों को हस्तांतरित किया जाता होगा। शीर्ष दस कर्ज लेने वालों और मुसीबत में फंसे लोगों की सूची देखकर कोई भी समझ सकता है कि नागरिकों के नुकसान की कीमत पर कैसे कुछ लोगों ने व्यवस्था पर कब्जा जमा रखा है।

हमारे सहचर पूंजीवादी लोग (जो ईमानदार नहीं हैं और अब भी बहुत हैं) काफी धन बैंक से उधार लेते हैं और उसका कुछ हिस्सा कुछ अन्य प्रोजेक्ट में लगाकर उससे अपनी पूंजी बनाते हैं और जब बाजार गिर जाता है, तो कर्ज के पुनर्गठन और उसे खत्म करने के लिए इच्छुक बैंक के पास गिड़गिड़ाते हैं। ऐसे कई बैंक थे, जो कर्ज माफ करने के लिए तत्पर थे, जो गुमराह होकर अपना उद्देश्य भूल गए थे कि उनका काम वैसे ईमानदार उधारकर्ताओं की देखभाल करना है, जो पाई-पाई चुकाते हैं और सहचर पूंजीवादी लोगों की गलतियों की भरपाई के लिए भी उच्च दर चुकाते हैं। लेकिन डॉ राजन ने ईमानदारी से इस भय को दूर किया। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों की सफाई करने में समर्थन का वायदा किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी घोषणा की कि ऐसे लोगों के लिए सरकार में कोई सहानुभूति नहीं है और उन्हें पाई-पाई चुकाना ही होगा। आखिरकार व्यवस्था में ईमानदारी चाहिए।

 उन्होंने बैंकिंग व्यवस्था को खोला, नए लाइसेंस जारी किए और उन्हें भुगतान बैंक की श्रेणी में रखा, जिन पर यथास्थिवाद का खतरा था। उन्होंने बैंकों से ईमानदार और पारदर्शी बनने के लिए कहा। जब वे हमेशा की तरह आनाकानी कर रहे थे, तो उन्होंने फिर समय-सीमा निर्धारित की और बैंकों से गैर निष्पादित संपत्तियों की सफाई करने तथा कर्ज न चुकाने वालों के नाम उजागर करने के लिए कहा। सच्चाई जानकर देश हैरान था, लेकिन जानबूझकर कर्ज न चुकाने वाले भाग रहे थे। कर्ज न चुकाने वालों ने वही किया, जो वह जानते थे, उन्होंने उन पर व्यक्तिगत हमले किए, उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने के लिए तर्कहीन झूठे आरोप गढ़े और उन्हें भारत की सार्वजनिक ईमानदारी का सबसे बड़ा योद्धा बना दिया।

डॉ. राजन अध्यापन और शोध के प्रति अपने पहले प्यार को नहीं भूल सकते। उन्होंने साहसपूर्वक भारत में आर्थिक शोध की गुणवत्ता सुधारने की कोशिश की और उन्होंने पाया कि यहां गुणवत्तापूर्ण शोध करने वाले नहीं हैं। जब राजन ने गुणवत्ता के अभाव की बात की, तो 'मेरा भारत महान' में यकीन करने वाले देशभक्तों ने उनकी निंदा की। मीडिया में उन्हें लगातार गलत ढंग से उद्धृत किया गया, जिससे देशभक्त नाराज थे कि कैसे कोई रिजर्व बैंक का गवर्नर हमें हमारी सच्चाई बता सकता है! किसी ने भी उनके पूरे भाषण को नहीं पढ़ा, जहां उन्होंने भारत के प्रति अपनी पूरी प्रतिबद्धता दिखाई थी। इस पद के लिए उन्होंने काफी त्याग किया, लेकिन सच्चाई से व्यथित लोगों ने उसे नजरंदाज कर दिया।

आखिरकार देशभक्त जीते और भारत के लोग हार गए और रघुराम राजन बड़ी वैश्विक चुनौतियों पर विचार करने के लिए वापस चले गए। फिर भी उन्होंने जो किया, उसने भारत को बदल दिया। वह उद्योगपतियों, युवा उद्यमियों, प्रौद्योगिकी उद्योग, आम नागरिक तथा साधारण बचतकर्ताओं के मित्र थे। उन्होंने हमारे जीवन और हमारी अर्थव्यवस्था पर अपनी छाप छोड़ी है। उन्होंने वायदा किया है कि वह हमेशा हमारी मदद करेंगे। विदा डॉ. राजन, शुक्रिया आपने जो किया, उसके लिए! दुनिया खुले दिल से आपका स्वागत करेगी। उन्हें वैश्विक अर्थव्यवस्था की सच्चाई का सामना करने के लिए आपके सलाह की जरूरत है, जहां राजनेताओं और केंद्रीय बैंकर विचार और जरूरी असलहे से खाली हैं।

आरिन कैपिटल पार्टनर के चेयरमैन

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