आर्थिक मुश्किलों की परीक्षा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पिछले एक वर्ष के दौरान भारत में विकास दर, उत्पादन, निवेश और रोजगार के क्षेत्र में धीमापन एक नई चुनौती बन गया है। इन पर ध्यान न दिए जाने पर देश मंदी के दरवाजे पर दस्तक देता दिखाई दे सकता है। हाल ही में सीएमआई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकोनॉमी) तथा रिजर्व बैंक द्वारा पेश किए गए आंकड़ों में विकास और निवेश में कमजोरी की बात कही गई है। सरकार द्वारा विगत 11 अगस्त को पहली बार संसद में पेश की गई अर्धवार्षिक आर्थिक समीक्षा में भी अर्थव्यवस्था की हालत चिंताजनक बताई गई है। कहा गया है कि फरवरी 2017 में जारी समीक्षा में 6.75-7.5 फीसदी विकास दर की जो उम्मीद जताई गई थी, 2017-18 में उसे हासिल कर पाना मुश्किल है। रुपये में मजबूती, किसान कर्ज माफी, नोटबंदी और जीएसटी की दिक्कतों को इसकी वजह बताया गया है।
हाल ही में वैश्विक रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने भारत की रेटिंग बीबीबी ऋणात्मक पर अपरिवर्तित रखी है और भारत के भावी आर्थिक परिदृश्य को स्थिर बताया है। ऐसे ही विश्व बैंक ने 2017-18 के लिए विकास दर 7.6 फीसदी से घटाकर 7.2 फीसदी कर दी है। उसने नोटबंदी के असर और निवेश माहौल के सुधरने में अधिक समय लगने का हवाला देते हुए जीडीपी का अनुमान घटाया है।
पिछले साल सरकार द्वारा 1000 और 500 रुपये के नोट बंद किए जाने से 87 फीसदी करेंसी चलन से बाहर हो गई थी, जिससे बाजार मांग में तेज गिरावट आई थी। वैसे तो 2016-17 की शुरुआत से ही वैश्विक सुस्ती से अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना शुरू हो गया था, पर नवंबर, 2016 से मार्च, 2017 के बीच तीन बड़ी चुनौतियों ने अर्थव्यवस्था को अधिक प्रभावित किया है। ये हैं-रोजगार, निर्यात और उद्योग-कारोबार में निजी निवेश की भारी कमी।
सेवा क्षेत्र के तहत कई क्षेत्रों में नौकरियों की बढ़ोतरी का अनुपात समान नहीं रहा। कई सेवाओं और आईटी सेक्टर में टेक्नोलॉजी तथा ऑटोमेशन के कारण रोजगार घटे हैं। विनिर्माण और कृषि क्षेत्र धीमी विकास गति के कारण पर्याप्त रोजगार नहीं निर्मित कर पाए। स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं को रोजगार बढ़ाने में आशातीत सफलता नहीं मिली।
वैश्विक निर्यात मांग कम होने से निर्यात क्षेत्र में भी कुछ खास नहीं हुआ। निर्यात क्षेत्र की चुनौती और बढ़ेगी,क्योंकि विश्व व्यापार संगठन के नियमों के मुताबिक 2018 तक भारत को निर्यात को सब्सिडी देना बंद करना होगा।
एक जुलाई से जीएसटी लागू होने के बावजूद जुलाई, 2017 में औद्योगिक, कारोबार और सेवा क्षेत्र में प्रगति के मूल्यांकन की जो रिपोर्टें आ रही हैं, उनके अनुसार, पिछले 100 महीनों की तुलना में जुलाई 2017 में सबसे कम विकास हुआ है। चूंकि सरकार ने जीएसटी के जिस ढांचे को अंगीकृत किया है, वह मूल रूप से सोचे गए जीएसटी के ढांचे से काफी अलग है, ऐसे में, यह एहतियात बरतना होगा कि पहले लगाए गए अप्रत्यक्ष करों की तरह जीएसटी भी उलझनों और उत्पीड़न के मकड़जाल में न फंस जाए।
आर्थिक समीक्षा में इस सवाल का जवाब नहीं है कि सरकार द्वारा कई नीतिगत फैसले लिए जाने के बावजूद अर्थव्यवस्था को पूरी क्षमता के साथ बढ़ने में कितना समय लगेगा। देखना है कि अब विकास के लक्ष्यों के लिए सरकार मौद्रिक नीति, विनिमय दर नीति, राजकोषीय नीति और रोजगार वृद्धि के लिए किस तरह के कदम उठाएगी।