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तेलंगाना : राजनीति के 'पुष्पा' बनना चाहते हैं केसीआर!, राष्ट्रीय स्तर पर जमीन तलाशने की महत्वाकांक्षा का फल

mahendar babu kuruwa महेंद्र बाबू कुरुवा
Updated Wed, 09 Nov 2022 06:34 AM IST
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सार
केसीआर ने तेलंगाना राष्ट्र समिति का नाम बदलकर भारत राष्ट्र समिति कर दिया है, लेकिन कोई क्षेत्रीय पार्टी सिर्फ नाम बदलने से राष्ट्रीय नहीं हो जाती।
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Telangana: KCR wants to be Pushpa of politics, Result of ambition to reach at national level Politics
तेलंगाना के सीएम केसीआर - फोटो : PTI

विस्तार

हाल ही में तेलंगाना विधानसभा की मुनूगोड़े सीट पर हुए उपचुनाव में राज्य में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने जीत दर्ज की है। 30 अक्तूबर को एक चुनावी रैली में मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने कहा था कि इस चुनाव में पार्टी की जीत उनकी भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के लिए राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने का मार्ग प्रशस्त करेगी। केसीआर ने हाल ही में राष्ट्रीय राजनीति की अपनी महत्वाकांक्षा का प्रदर्शन करते हुए तेलंगाना राष्ट्र समिति का नाम भारत राष्ट्र समिति करने का एलान किया था। 



ऐसे में एक घटना का जिक्र करना लाजिमी होगा। हाल ही में जब केसीआर सरकार के एक मंत्री केटी रामा राव (केटीआर) से केसीआर की राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षा के बारे में पूछा गया था, तो उन्होंने कहा था, जब पुष्पा जैसी तेलुगू फिल्म देश में तूफान खड़ा कर सकती है, तो राष्ट्रीय राजनीति में बाहुबली दृष्टिकोण वाले केसीआर सफल क्यों नहीं हो सकते? टीआरएस सुप्रीमो के बेटे और टीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष होने के नाते केटीआर ने जो कुछ कहा है, उसके राजनीतिक निहितार्थ स्पष्ट हैं। 


वास्तव में केसीआर 2018 से राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने और गैर भाजपा, गैर कांग्रेस गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वह अब तक इसमें सफल नहीं हो सके हैं। 2019 में भाजपा को मिली भारी जीत के बाद यह विचार ठंडे बस्ते में चला गया था। लेकिन पिछले कुछ महीनों के दौरान देश के विभिन्न राज्यों का दौरा करने के बाद केसीआर ने अपनी क्षेत्रीय पार्टी का नाम बदलकर उसे राष्ट्रीय रूप देने की कोशिश की है। भाजपा जैसी शक्तिशाली और अच्छी तरह से स्थापित राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को राष्ट्रीय राजनीति में चुनौती देने का उनका विचार सुपर हिट तेलुगु फिल्म पुष्पा के नायक के चरित्र के साथ बहुत मेल खाता है, जिसके बारे में केटीआर बात कर रहे थे। 

हालांकि भाजपा को चुनौती देने के उनके संकल्प के पीछे कोई ठोस चुनावी रणनीति नजर नहीं आती। भाजपा से लड़ने के लिए जिस आधार पर उन्होंने जवाब दिया, वह उनका तथाकथित तेलंगाना शासन मॉडल है। लेकिन यह मॉडल काफी हद तक दलित बंधु (अनुसूचित जातियों के लिए) और रायतु बंधु (किसानों के लिए) जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित है। दूसरी ओर अनेक राज्य और केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए सरकारें इस तरह की अनेक योजानाएं चला रही हैं, ऐसे में यह केसीआर ही बता सकते हैं कि उनका मॉडल अलग कैसे है। 

टीआरएस नाम तेलंगाना की भावना से सीधे जुड़ा हुआ था और जिसने पृथक तेलंगाना राज्य के गठन के बाद हुए दो विधानसभा चुनावों में केसीआर को सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाई। अब पार्टी का नाम बदलकर बीआरएस कर दिया गया है, जिससे तेलंगाना भावना को प्रज्वलित करने का भार अब विशेष रूप से केसीआर के व्यक्तिगत करिश्मे पर निर्भर होगा, जो कि पार्टी के लिए एक बड़ा जोखिम है। दूसरा, पुष्पा अकेला था, जो अपने प्रतिद्वंद्वी के साथ लड़ रहा था, जबकि केसीआर के मामले में अनेक मजबूत क्षेत्रीय दल हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव में अपना हिस्सा हासिल करने के लिए लड़ रहे हैं। 

कोई भी पार्टी अपने लाभ को किसी अन्य पार्टी के साथ तब तक साझा नहीं करती, जब तक कि उसे अपने लिए कोई चुनावी लाभ नहीं दिखाई देता। केसीआर दूसरे क्षेत्रीय दलों के साथ कैसा तालमेल बिठाते हैं और बदले में वे बीआरएस को कितनी जगह देते हैं, यह लाख टके का सवाल है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में एनसीपी या शिवसेना या कर्नाटक में जेडीएस जैसी पार्टी, आखिर क्यों किसी ऐसी पार्टी के लिए राजनीतिक त्याग करेंगी, जो कि उनके राज्यों में अभी है ही नहीं? यदि उनमें सीटों का तालमेल नहीं हो सका, तब तो इससे भाजपा विरोधी मतों के विभाजन से भाजपा को लाभ ही मिलेगा। 

दिलचस्प यह है कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, दोनों ही जगह नई राष्ट्रीय पार्टी बीआरएस को लेकर बहसें हो रही हैं। कई बार ऐसी बहसें आम लोगों में राष्ट्रीय पार्टी को लेकर भ्रम पैदा कर रही हैं, जिन्हें शायद पता नहीं है कि कोई क्षेत्रीय पार्टी सिर्फ नाम बदलने से राष्ट्रीय नहीं हो जाती। किसी भी दल को राष्ट्रीय दल की मान्यता मिलने के लिए कुछ जरूरी शर्तें हैं, जिनमें एक शर्त यह है कि उसने लोकसभा की दो फीसदी सीटें कम से कम तीन राज्यों से जीती हों।

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