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तकनीक: पुलिस भी तो स्मार्ट बने, चुनौतियों के हिसाब से खुद को तैयार करने की जरूरत
Wed, 06 Aug 2025 07:37 AM IST
शिव शुक्ला
सुनील कुमार गुप्ता, पूर्व आईपीएस, विधिक एवं प्रशासनिक मामलों के विशेषज्ञ
सुनील कुमार गुप्ता, पूर्व आईपीएस, विधिक एवं प्रशासनिक मामलों के विशेषज्ञ
Published by: शिव शुक्ला
Updated Wed, 06 Aug 2025 07:37 AM IST
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विस्तार
साइबर धोखाधड़ी, तस्करी, शहरी अपराध और सीमा पार आतंक जैसी जटिल समस्याएं बढ़ रही हैं, पुलिस व्यवस्था को भी उतनी ही तेजी से विकसित होने की जरूरत है। इसके लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अनिवार्य तत्व बन गया है। कानून प्रवर्तन एजेंसियां जांच प्रक्रिया को तेज करने के लिए एआई को सक्रिय रूप से अपना रही हैं।
हवाई अड्डों पर ‘डिजीयात्रा’ परियोजना के तहत चेहरा पहचानने के सिस्टम से न िसर्फ बोर्डिंग की प्रक्रिया तीव्र हो रही है, बल्कि वांछित व्यक्ति भी पहचाने जा रहे हैं। हाईवे पर एआई आधारित नंबर प्लेट पहचान प्रणाली का पायलट परीक्षण हो रहा है, ताकि संदिग्ध या चोरी हुए वाहनों की पहचान कर उन्हें समय रहते रोका जा सके। ये प्रणाली केंद्रीय अपराध डाटाबेस से जुड़ी होती हैं और निकटतम गश्ती दल को त्वरित सूचना भेजती हैं। यह प्रणाली विशेष रूप से अंतरराज्यीय तस्करी, अपहरण या वाहन चोरी जैसे मामलों में प्रभावी सिद्ध हो रही है। टोल प्लाजा, सीसीटीवी नेटवर्क और सीमा चौकियां अब एक जुड़े हुए निगरानी तंत्र का हिस्सा बनती जा रही हैं।
पारंपरिक तरीकों की सीमाएं हैं-जैसे धुंधले सीसीटीवी फुटेज या अधूरी गवाही-एआई आधारित समाधान सहायक सिद्ध हो रहे हैं। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एआई-सक्षम स्केचिंग सॉफ्टवेयर का परीक्षण किया गया है, जो गवाहों द्वारा दिए गए विवरणों के आधार पर डीप लर्निंग तकनीक से चेहरे की डिजिटल छवियां तैयार करता है। तैयार की गई छवियों की तुलना राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा बनाए गए चेहरे पहचान डाटाबेस से की जाती है। यह प्रणाली विशेष रूप से गुमशुदा व्यक्तियों, झपटमारी और नए अपराधियों की पहचान में प्रभावी रही है। एनसीआरबी के अनुसार, भारत में साइबर अपराधों में 20 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई है। तेलंगाना व कर्नाटक जैसे राज्यों में एआई-सक्षम साइबर प्रयोगशालाएं स्थापित की गई हैं।
एनसीआरबी द्वारा विकसित ‘ई-साक्ष्य’ एप पुलिस अधिकारियों को वीडियो या ऑडियो जैसे डिजिटल साक्ष्यों को मेटाडाटा और एन्क्रिप्शन सहित प्रस्तुत करने की सुविधा देता है, जिससे वे अदालत में स्वीकार्य और छेड़छाड़ से मुक्त रहते हैं। इसी तरह, ‘ई-प्रोसीक्यूशन’ पोर्टल जो अपराध और आपराधिक ट्रैकिंग नेटवर्क और सिस्टम (सीसीटीएनएस) से जुड़ा हुआ है, पुलिस थानों से अभियोजन कार्यालयों तक प्रकरण विवरण को स्वचालित रूप से भेजता है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश ने इस प्लेटफॉर्म का सबसे प्रभावी उपयोग किया है और मामलों का त्वरित निपटारा किया है।
एआई आधारित पुलिसिंग केवल दिल्ली, मुंबई या बंगलूरू जैसे महानगरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों में भी इसे ‘डिजिटल इंडिया’ के तहत परीक्षण के लिए अपनाई जा रही है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक रीयल-टाइम एआई डैशबोर्ड लागू किया गया है, जो एफआईआर की प्रगति पर नजर रखता है, समय पर चार्जशीट दाखिल करने को सुनिश्चित करता है और प्रक्रियात्मक त्रुटियों की पहचान करता है। आगरा और भोपाल जैसे जिलों में पुलिस अधिकारियों को एआई आधारित चैट असिस्टेंट के माध्यम से एफआईआर का मसौदा तैयार करने, केस लॉ का सारांश बनाने और शिकायतों का भाषाई अनुवाद करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
2024 में प्रकाशित एक अध्ययन ने एआई को लेकर प्रमुख चिंता उजागर की है-‘ब्लैक बॉक्स समस्या’, यानी पारदर्शिता की कमी। उदाहरण के लिए, चेहरे की पहचान प्रणालियों में विश्व स्तर पर महिलाओं, वृद्धों और गहरे रंग की त्वचा वाले व्यक्तियों में त्रुटि दर अधिक पाई गई है। भारत में जिम्मेदार और प्रभावी एआई पुलिसिंग को साकार करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुधार आवश्यक हैं। पहले, राज्यों को एक समान राष्ट्रीय ढांचा अपनाना चाहिए, जो एआई उपकरणों की खरीद, प्रशिक्षण, जवाबदेही और सार्वजनिक शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को निर्धारित करे। दूसरे, प्रत्येक जिले में समर्पित ‘टेक सेल्स’ की स्थापना की जानी चाहिए, जो स्थानीय पुलिस को एआई के नैतिक व प्रभावी उपयोग में मार्गदर्शन दे सकें। तीसरे, पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (बीपीआरडी) को चाहिए कि वह पुलिस प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में एआई संबंधित मॉड्यूल अनिवार्य करे-जिसमें संचालनात्मक उपयोग के साथ-साथ नैतिक साक्षरता भी शामिल हो। सबसे महत्वपूर्ण, नागरिकों को यह जानकारी दी जानी चाहिए कि उनका डाटा कैसे एकत्र और उपयोग कैसे होता है, और उसकी सुरक्षा कैसे की जाती है। पुलिस की जनसंपर्क गतिविधियों को सीसीटीवी कवरेज तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह भी समझे कि एआई का उपयोग कैसे निष्पक्ष और वैध तरीके से किया जा रहा है।
विशाल और युवा जनसंख्या, स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच और क्षेत्रीय विविधता के चलते भारत में एक ऐसा मॉडल विकसित हो सकता है, जो नवाचार व अधिकारों के बीच संतुलन बनाए। सही कानूनी सुधारों, संस्थागत दूरदर्शिता व जनविश्वास के साथ पुलिस बल तकनीकी रूप से उन्नत होकर और प्रभावी बन सकता है।
-साथ में अक्षिता गुप्ता, शोध छात्रा (विधि)।