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मानव जीवन: करुणा पैदा नहीं कर सकती तकनीक, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में सावधानी जरूरी
Wed, 23 Oct 2024 06:01 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
दलाई लामा
दलाई लामा
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Wed, 23 Oct 2024 06:01 AM IST
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विस्तार
आज हम इस संसार में जो युद्ध और अनेकों तरह के संघर्ष देखते हैं, वे सभी भौतिक संसाधनों या शक्ति प्राप्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित संघर्ष हैं। हम अक्सर इस बात को भूल जाते हैं कि हमारे जन्म के समय जो पहला अनुभव होता है, वह आमतौर पर करुणा का होता है, जो हमारी माताओं के प्रेम और उनकी देखभाल से मिलता है। इसके बाद, बच्चों के रूप में हम खुद को करुणा के माहौल में पाते हैं। बचपन में हम दूसरे बच्चों के साथ खुलकर खेलते हैं। बच्चों के रूप में, हम जाति, धर्म या पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव किए बिना दूसरे बच्चों के साथ खेलने में खुश होते हैं। हम जैसे-जैसे बड़े होते हैं, भौतिक संसाधनों या शक्ति प्राप्ति के पीछे दौड़ने लगते हैं और जीवन के असली मूल्यों को भूलते जाते हैं।
मन की शांति बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और डर कम होता है। हमें अपने माता-पिता, खासकर अपनी माताओं से जो करुणा मिली है, वह एक बहुत ही कीमती चीज है, जिसे हमें अपने जीवन भर साथ रखना चाहिए। मेरा मानना है कि इस समय संसार में तकनीक ने वास्तव में मानवीय क्षमता को बढ़ाया है, लेकिन तकनीक करुणा पैदा नहीं कर सकती। विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने समाज को बहुत लाभ पहुंचाया और इसके बिना मानवता का कोई भविष्य नहीं है, लेकिन हमें सावधान रहना होगा कि हम इतने मशीनीकृत न हो जाएं कि अपनी मानवीय भावनाओं को ही खो दें। अत्यधिक विकसित प्रौद्योगिकी के कारण हमारे जीवन में चिंता और भय भी बढ़ा है। मुझे हमेशा लगता है कि मानसिक विकास और भौतिक विकास को अच्छी तरह से संतुलित किया जाना चाहिए, ताकि वे एक साथ मिलकर एक अधिक मानवीय दुनिया बना सकें। यदि हम इस भौतिक विकास की दौड़ में मानवीय मूल्यों को खो देते हैं, तो हम सभी एक मशीन का हिस्सा बन जाते हैं। अगर हम इस समय पश्चिमी देशों को देखें, तो तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता ने वहां के लोगों में धैर्य की कमी को दर्शाया है। जब हम तकनीक का उपयोग करते हैं, तो सबकुछ एक बटन के स्पर्श पर हमें प्राप्त हो जाता है। और यह हमें इतना अधीर बना देता है कि जब कभी कोई व्यक्तिगत या भावनात्मक संकट में होता है, तो हम समाधान को प्रभावी होने का समय नहीं देते, जिसकी वजह से लड़ाई-झगड़े जैसी जल्दबाजी वाली प्रतिक्रियाएं होती हैं और सही एवं गलत के बीच अंतर करना बहुत मुश्किल हो जाता है। अगर हम केवल भौतिक विकास पर निर्भर रहते हैं, तो क्रोध और घृणा से प्रेरित तकनीक का उपयोग विनाशकारी हो सकता है। इसलिए हम सकारात्मक परिणाम के बारे में सुनिश्चित नहीं हो सकते। यह तभी लाभकारी होगा, जब हम सभी प्राणियों का कल्याण चाहें। मनुष्य ही एकमात्र ऐसी प्रजाति है, जो अनियंत्रित इच्छा और लालच के कारण दुनिया को नष्ट करने की ओर भी बढ़ सकती है। इसलिए हमें संतोष और सादगी विकसित करने की आवश्यकता है।
सूत्र: उत्साह को खुशी न समझें
बहुत से लोग सोचते हैं कि उत्साह ही खुशी है, लेकिन जब उत्साहित होते हैं, तब आप शांत नहीं होते। सच्ची खुशी शांति में है। जीवन को समझने के लिए मन को असाधारण रूप से शांत, स्थिर होना चाहिए। शांत होने पर फरिश्तों की आवाज सुनेंगे, आसमान को हीरों-सा चमकता हुआ देखेंगे। सफलता मन की शांति है, जो आत्म-संतुष्टि का प्रत्यक्ष परिणाम है ।