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तकनीक : क्या चैटजीपीजी युद्ध में दुश्मन के संदेश पढ़ सकता है, कुछ ही पलों में टूट सकता है एनिग्मा कोड
Sat, 10 May 2025 08:50 AM IST
अनुज कुमार
निकोला डेविस
निकोला डेविस
Published by: अनुज कुमार
Updated Sat, 10 May 2025 08:50 AM IST
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अमर उजाला
विस्तार
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान, जर्मनी द्वारा उपयोग किया गया एनिग्मा कोड अपनी जटिलता के लिए कुख्यात था। यह कोड युद्ध के मैदान के संदेशों को सुरक्षित रखने का एक महत्वपूर्ण साधन था, जिसे तोड़ना मित्र राष्ट्रों के लिए एक असंभव चुनौती बन गया था। ब्रिटिश गणितज्ञ एलन एम ट्यूरिंग और उनकी टीम ने 1930 के दशक में एनिग्मा कोड के शुरुआती संस्करणों को तोड़ लिया, लेकिन जब जर्मनी ने अपनी सुरक्षा का स्तर और बढ़ाया, तो ट्यूरिंग को नई मशीनें विकसित करनी पड़ीं। 1943 तक ये मशीनें हर मिनट में दो संदेशों को पढ़ लेती थीं। एनिग्मा कोड को तोड़ने के लिए ट्यूरिंग ने जो मशक्कत की, जिस पर बाद में हॉलीवुड की कई फिल्में भी बनीं, उसे दूसरे विश्वयुद्ध को दो साल छोटा करने का श्रेय मिलता है।
अगर आज के दौर में एनिग्मा कोड को तोड़ने की चुनौती हो, तो इसे कितना बड़ा माना जाएगा? ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर विज्ञान के प्रोफेसर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के विशेषज्ञ माइकल वूल्ड्रिच का मानना है कि एनिग्मा कोड आधुनिक कंप्यूटिंग के सामने टिक नहीं सकता।
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान धुरी शक्तियों (जर्मनी और उसके सहयोगी) द्वारा संचार के लिए इस्तेमाल होने वाला एनिग्मा उपकरण एक इलेक्ट्रो-मैकेनिकल मशीन थी, जो टाइपराइटर जैसी दिखती थी। इसकी सेटिंग ऐसी होती थी, कि एक ही कुंजी को अगर दो बार दबाया जाए, तो हर बार एक अलग अक्षर उत्पन्न होता था। यही नहीं, इसकी सेटिंग हर 24 घंटे में बदलती भी रहती थी। एनिग्मा कोड को तोड़ना इसलिए मुश्किल था, क्योंकि इसके संदेश को पढ़ने के संभावित तरीकों की प्रायिकता बहुत ज्यादा थी, जिसे एक इन्सान के लिए पूरी तरह से जांच पाना तकरीबन असंभव था।
वूल्ड्रिच के अनुसार, ट्यूरिंग की मशीनें कच्चे हार्डवायर्ड मैकेनिकल उपकरण थे, जो नाजी संदेशों को पढ़ने के संभावित विकल्पों की खोज करते थे। मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के सॉफ्टवेयर सुरक्षा के वरिष्ठ व्याख्याता डॉ. मुस्तफा कहते हैं कि ट्यूरिंग और उनके सहयोगियों को कामयाबी मिलने की बड़ी वजह यह थी कि एनिग्मा में कई कमजोरियां थीं, जिनमें से एक यह थी कि एक बार एनक्रिप्ट होने के बाद कोई भी अक्षर अपने-आप प्रस्तुत नहीं हो पाता था।
वूल्ड्रिच कहते हैं कि आज की तारीख में उसी ढंग से कोड को तोड़ना काफी आसान होगा, क्योंकि चैटजीपीटी सर्वशक्तिमान है। इसके अलावा, उस वक्त के इन्सान के लिए आधुनिक कंप्यूटरों की शक्ति की कल्पना करना भी कठिन होगा। वूल्ड्रिज यह भी कहते हैं कि ट्यूरिंग ने जो किया, उसे अगर आज दोहराना हो, तो आधुनिक कंप्यूटरों की गति और सांख्यिकीय व कंप्यूटेशनल तकनीकों की एक शृंखला के साथ यह काम बहुत कम समय में हो सकता है। एनिग्मा कोड, जो अपने समय में अत्यंत जटिल था, आज के सुपरकंप्यूटरों और एआई मॉडलों के सामने एक सामान्य पहेली जैसा है।
यह प्रगति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि एआई की यह शक्ति आज के समय में कहां तक पहुंच सकती है। साइबर सुरक्षा, डाटा एन्क्रिप्शन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में एआई की भूमिका अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। लेकिन, यह शक्ति अपने साथ जोखिम भी लाती है। अगर एआई इतनी आसानी से पुराने कोड तोड़ सकता है, तो क्या यह वर्तमान एन्क्रिप्शन प्रणालियों को भी खतरे में डाल सकता है? एआई की यह क्षमता हमें इसके नैतिक उपयोग और नियंत्रण के सवालों की ओर ले जाती है।
आज एआई अनेक संभावनाओं को खोल रहा है। लेकिन इसके दुरुपयोग की आशंका को देखते हुए नीतियां बनाने की जरूरत है। एनिग्मा कोड को तोड़ने की कहानी हमें याद दिलाती है कि तकनीक का उपयोग सावधानी और जिम्मेदारी से होना चाहिए। हालांकि, दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान एनिग्मा कोड को तोड़ना केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं थी; यह युद्ध में रणनीतिक जीत को दर्शाता था। तब इस कोड को तोड़ने में कई महीने, बल्कि एक साल से भी ज्यादा का समय लगा।
हालांकि, सीमित संसाधनों को देखते हुए युद्ध के दौरान ही इसे हल कर पाना अपने-आप में एक बड़ी बात थी। भगवान ही जानता है कि अगर एनिग्मा कोड न टूट पाता, तो शायद दूसरा विश्वयुद्ध दस साल और चलता। तब दुनिया शायद आज जैसी न होती।