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रियो में शरणार्थियों की जगह

Wed, 10 Aug 2016 07:24 PM IST
रोजर कोहेन
रोजर कोहेन Updated Wed, 10 Aug 2016 07:24 PM IST
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Team refugee at Rio
यूसरा मर्दिनी और उनकी बहन सारा

रियो ओलंपिक में शरणार्थियों की टीम की मौजूदगी से दुनिया द्रवित है। उद्घाटन समारोह में सबने खड़े होकर उनका स्वागत किया। सिर्फ संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने ही अपनी भावना का असाधारण प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि सभी मुस्करा रहे थे। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इन दस एथलीटों के समर्थन में ट्विट करते हुए लिखा कि इसका कोई मतलब नहीं कि आप कहां से हो, लेकिन आप सफल हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत सामंता पावर ने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट की, जिसमें वह दुनिया के 6.5 करोड़ विस्थापित लोगों (द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से यह विस्थापितों की सबसे बड़ी संख्या है) को संबोधित करते हुए कहती हैं कि वे बड़ा सपना देख रहे हैं, क्योंकि वे वह कर रहे हैं, जो वही कर सकते हैं।

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इनसे प्रेरित हुए बिना कौन रह सकता है? वे बहादुर लोग हैं। उन्होंने बेहतर जीवन की तलाश में नहीं, बल्कि जीवन की तलाश में विस्थापन की पीड़ा भोगी है। दूसरे शब्दों में कहें, तो उन्होंने विकल्प होने के बावजूद शरणार्थी बनना पसंद नहीं किया, बल्कि उनके पास इसके अलावा और कोई उपाय नहीं था। उदाहरण के लिए, 18 वर्षीया यूसरा मर्दिनी को ही लें, जो दमिश्क उपनगर की सीरियाई शरणार्थी हैं, उन्होंने उस मुल्क को छोड़ा, जो अब नाम भर में रह गया है और उनकी छोटी-सी नाव उफनते समुद्र में हिचकोले खाती हुई उन्हें तुर्की से यूनान लेकर आई और वह किसी तरह जर्मनी पहुंची। वह और उनकी बहन सारा पानी में गिर गई और तीन घंटे से ज्यादा समय तक पानी में तब तक हिचकोले खाती रहीं, जब तक कि वे लेस्बस द्वीप पर नहीं पहुंच गई। रियो में मर्दिनी ने 100 मीटर बटरफ्लाई जीत ली, लेकिन अपने न्यूनतम समय के कारण वह आगे नहीं बढ़ पाई। फिर भी उसने एक उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
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बेशक दुनिया शरणार्थियों की टीम से प्रभावित है, लेकिन शरणार्थियों से अब भी नहीं। वे समुद्र में मरते हैं, वे ट्रक के पिछले हिस्से में बंद होने के कारण घुटकर मर जाते हैं। वे गुमनाम लोगों की मौत मरते हैं। उनकी राह में बाधाएं खड़ी हैं, दीवारें हैं। पोस्टरों के जरिये उन पर दोष मढ़े जाते हैं। वे खतरे का प्रतिनिधित्व करते हैं और विघटन की आशंका पैदा करते हैं। वे मुफ्तखोर कहलाते हैं। वे दुर्गम प्रशांत द्वीपों पर सड़ने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। उनसे यूरोपीय सभ्यता (ईसाई यूरोप पढ़ें) को खतरा पैदा होने की बातें हो रही हैं। अमेरिका को फिर से महान (श्वेत पढ़ें) बनाने की चर्चा हो रही है।
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उन्हें बलि का बकरा बनाकर दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टियां फल-फूल रही हैं। कोई भी अपने देश में शरणार्थी नहीं चाहता। वे आतंकवादी या बलात्कारी हो सकते हैं। वे दहलीज पर बैठे हैं। अमेरिका ने चालू वित्त वर्ष में कम से कम दस हजार सीरियाई शरणार्थियों को अपनाने का वचन दिया है। पिछले चार वर्षों में इसने 1,900 को स्वीकर किया। यह बहुत कम है। जब से युद्ध शुरू हुआ है, करीब 48 लाख सीरियाई अपने देश से पलायन कर गए हैं। सिर्फ जर्मनी ने इस चुनौती के अनुरूप राजनीतिक साहस दिखाया और अपने द्वार खोल दिए। अनैतिकता की गहराई को भांपते हुए, उसने नैतिक अनिवार्यता को समझा।

दुनिया शरणार्थियों की टीम से प्यार करती है, जिसमें सीरिया से दो तैराक, दो मूलतः कांगो से जुडो खिलाड़ी, इथियोपिया से मैराथन और दक्षिण सूडान से पांच धावक शामिल हैं। अब बेल्जियम में रहने वाले सीरियाई तैराक सामी अनीस की दुनिया गुण गा रही है। उसका गृह नगर अलेप्पो पश्चिम द्वारा कायरतापूर्ण ढंग से रूसी बलों द्वारा बम धमाके लिए छोड़ दिया गया है। सीरिया में रूस की गतिविधि तब हुई, जब कई वर्षों के युद्ध के बाद उसे महसूस हुआ कि अमेरिका उस पर ऊंगली नहीं उठाएगा।

रियो में भाग लेने वाली अपनी तरह की पहली शरणार्थी टीम के लिए जरूर खुश होइए, लेकिन सिर्फ शब्दों से नहीं, और सीरिया संबंधी हमारी चेतना को दूर करके नहीं। वे फिलहाल एक ओलंपिक ध्वज के साथ हैं। मगर वे अपने देश का ध्वज चाहते हैं। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के अध्यक्ष थॉमस बाख कहते हैं, 'हम हमारी दुनिया के सभी शरणार्थियों को उम्मीद का एक संदेश भेजना चाहते हैं।' लेकिन ओलंपिक की धूमधाम के बाद क्या कोई उन्हें याद करेगा?

दुनिया एक साथ दो दिशाओं में खींची जा रही है। भूमंडलीकरण की ताकत, खानाबदोश मानवता, सीमाविहीन साइबरस्पेस द्वारा पैदा राष्ट्रवाद के खिलाफ उतना ही मजबूत बल, स्वदेशी राजनीति और आप्रवासी विरोधी कट्टरता-सब एक साथ चल रहे हैं। दो प्रवृत्तियां संतुलन पैदा कर रही हैं।

मैं कई वर्षों से ब्राजील में रह रहा हूं। यह एक उदार देश है। शायद ही किसी देश में इस तरह की मिश्रित संस्कृति, इस तरह की मेलजोल की स्थायी आदत होगी। यह मानना सही है कि इसने मिश्रित नस्लीयता और खुलेपन के शहर रियो में शरणार्थी टीम को प्रोत्साहित किया होगा।

शरणार्थी टीम की प्रशंसा और शरणार्थियों की निंदा एक साथ हो रही है। ऐसा कैसे हो सकता है? पुराना सिद्धांत है-दोष मत देखो। उपन्यासकार पॉल अस्टर मुझसे कहते हैं-हम एक ही समय में सबसे अच्छा और सबसे बुरा कर रहे हैं और वह भी एक ही गति से।

मुझे प्रसिद्ध इतिहासकार और अपने दोस्त फ्रिट्ज स्टर्न की बातें याद आ रही हैं-'मैं टाले जाने लायक आपदा के मुहाने पर इस दुनिया में पैदा हुआ।' उसने आगे कहा था, 'आजादी की कमजोरी मेरे जीवन और काम की सबसे सामान्य और गंभीर सीख है।'


स्वतंत्रता का निर्माण बहिष्कार और घृणा के आधार पर नहीं हो सकता। यह सार्वभौमिक मानवीय अधिकार है। ब्राजील और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने दुनिया को मानवता और प्रत्येक शरणार्थी को आकांक्षा की एक झलक दिखाई है। संभवतः अंत में हम बुराई के बजाय तेजी से अच्छाई की तरफ बढ़ेंगे और बाधाएं निरंतर खत्म होती रहेंगी, लेकिन यह सब खोखले शब्दों से नहीं होगा।

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