तवा मुफ्त में बदनाम
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जैसे राजा के मुंह से निकली हर बात दरबार को अच्छी और सच्ची लगती है, वैसे ही रिजर्व बैंक के गवर्नर की डोसे और तवे वाली बात भी उस दिन सेमिनार के प्रतिभागियों को भली लगी होगी। जिस लड़की ने महंगाई दर और डोसा की कीमत के रिश्ते पर सवाल किया था, वह रघुराम राजन के जवाब से कम, उनके प्रभाव से ज्यादा संतुष्ट हुई होगी। खैर, उस तवे का क्या, जो युगों-युगों से रंगभेदी कमेंट (कलमुंहा) सुनने को अभिशप्त है। बेचारा कभी कड़ाही, कभी कटोरी, तो कभी रसोई के दूसरे बर्तनों से ताने सुना करता है और किचन में खुद को सबसे उपेक्षित महसूस करता है। लिहाजा तवे को आरक्षण दिए जाने की जरूरत है, न कि उसे लज्जित करने की। मेरे मुहल्ले का ‘मद्रासी’ ठेले वाला तो रिजर्व बैंक के गवर्नर के प्रभाव में कतई नहीं आया। तवे पर लगाई जा रही तोहमत को उसने खारिज कर दिया। कहने लगा-घोल के कई विकल्प हो सकते हैं, तवा तो तवा ही रहेगा, उसमें क्या बदल लोगे?
ठेलेवाले की बात मुझे भी गलत नहीं लगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि रघुराम राजन जिसे तवे की कमजोरी बता रहे हैं, वह तवे की ताकत है? मैंने मुहल्ले के ‘मद्रासी खोमचे’ से लेकर ‘मिस्टर इडली’ तक पड़ताल कर ली, साइज बेशक अलग-अलग हो, तवा के सिस्टम में कोई फर्क नहीं दिखा। ऊंची दुकान में भी घोल फैलाने से पहले तवे के ऊपर छिड़काव करने पर तवे के मुंह से सी-सी की आवाज निकली, छोटी दुकान में भी। वही तवा, वही घोल, वही मसाला, फिर ऊंची और छोटी दुकान के डोसा में फर्क क्या रहा? ‘मद्रासी खोमचे’ वाले ने कहा-फर्क यह है कि ऊंची दुकान पर आने वाले ग्राहक डोसे की कीमत पर सवाल नहीं उठाते। बात अब मेरी समझ में आई। उस दिन गवर्नर साहब से डोसे की कीमत का रोना रोने वाली लड़की छोटी दुकानों पर डोसा खाती होगी। खोमचे वाला ठीक कहता है। ऊंची दुकानों पर डोसे के लिए जितना ‘टिप’ दे देते हैं, उतने में तो ठेले पर पूरा डोसा मिल जाता है। नीयत खराब है लड़की की और बदनाम हमारा तवा हो रहा है।