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टैरिफ, युद्ध और कुत्ते: शोर हर तरफ है, लेकिन अंतिम समाधान किसी के पास नहीं

Wed, 20 Aug 2025 06:49 AM IST
Virendar Kapoor वीरेंदर कपूर
Updated Wed, 20 Aug 2025 06:49 AM IST
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सार
बेरोजगारी, ट्रंप के टैरिफ, इस्राइल-हमास युद्ध, अलास्का शिखर सम्मेलन, पुतिन और ट्रंप, गाजा में भुखमरी, खाने की कमी, यहां तक कि महंगाई को भूल आवारा कुत्ते राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गए हैं। समस्या यह है कि शोर हर तरफ है, लेकिन अंतिम समाधान किसी के पास नहीं है।
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Tariffs war and dogs There is noise everywhere but no one has the final solution
कुत्ते (फाइल) - फोटो : एएनआई

विस्तार

मैं कुत्तों का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। कुछ वर्ष पहले दिल्ली में एक आवारा कुत्ते ने मुझे बुरी तरह काट लिया था। मेरे एक मित्र मुझे पूर्वी कैलाश तक छोड़ने के लिए गए, जहां मैं रुका हुआ था। मैं कार से उतर कर कार को पीछे करने में उनकी मदद कर रहा था, कि तभी अचानक एक कुत्ता कहीं से आया और उसने मेरी पिंडली पर काट लिया। संयोग से मैं अपने भतीजे के पास ठहरा था, जो एक डॉक्टर है। उसने मुझे दर्द निवारक दवा दी और मरहम-पट्टी की।



सुबह चाय पीते वक्त घर में चौका-बर्तन करने वाली ने मेरे पैर पर पट्टी बंधी देखकर पूछा, ‘आपको भी काटा उसने? वह मुझे भी दो बार काट चुका है।’ उसी दिन से एंटी-रेबीज के इंजेक्शन लगने शुरू हो गए। एक इंजेक्शन 350 रुपये का था और महीने भर में पांच खुराक के 1750 रुपये खर्च करने पड़े। यह एक आवारा कुत्ते से सामना होने के लिए साप्ताहिक ईएमआई थी। काश!  कोई पेटा या अमीर पशु प्रेमी मेरे लिए इतने पैसे दे देता। लेकिन ऐसा नहीं होता, अगर कुत्ते ने आपको काटा है, तो कीमत आपको ही चुकानी पड़ेगी या फिर मरना पड़ेगा। संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में देश भर में 37 लाख से ज्यादा कुत्तों के काटने के मामले सामने आए और रेबीज के कारण 54 लोगों की संदिग्ध रूप से मौत हो गई।


हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि निश्चित समय-सीमा के अंदर एनसीआर क्षेत्र से सभी आवारा कुत्तों को हटाया जाए। अचानक कुत्तों के बजाय बड़ी संख्या में कुत्ता प्रेमी सड़कों पर उतर आए और टीवी स्टूडियो में दिखने लगे। बहस के दौरान आंसू बहाते हुए ये लोग टीवी एंकरों पर ऐसे टूट पड़े, जैसे उन्हें ही काट खाएंगे। किसी भी एंकर ने कुत्तों के अधिकारों के लिए लड़ने वालों से यह नहीं पूछा कि उनमें से कितनों का कुत्तों ने कभी पीछा किया, कितनों को (बेचारे कुत्तों के झुंड द्वारा) बुरी तरह घायल किया या काटा गया है, क्या उन्हें अस्पताल में 20 टांके लगवाने पड़े। मुझे यकीन है कि यह संख्या न के बराबर होगी।

विभिन्न अनुमानों के मुताबिक, एनसीआर में आवारा कुत्तों की संख्या छह से दस लाख तक है और राष्ट्रीय स्तर पर यह संख्या करीब छह से सात करोड़ है। आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों को देखते हुए सरकार उनकी नसबंदी करने की प्रक्रिया में तेजी लाने के विकल्प पर विचार कर रही है। सरकार एक नसबंदी के लिए आम तौर पर विभिन्न एजेंसियों को आठ सौ से पंद्रह सौ रुपये देती है। यह राशि अपर्याप्त मानी जा रही है, क्योंकि सर्जरी, पशु चिकित्सकों की फीस, कम से कम तीन दिनों तक कुत्ते के भोजन और आवास का खर्च कहीं ज्यादा है। पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह राशि कम से कम 1,800-2,200 रुपये होनी चाहिए। सात करोड़ का दो हजार से गुणा करें, तो यह राशि बहुत अधिक हो जाएगी। लेकिन, नसबंदी करने भर से कुत्तों के काटने या ‘कुत्तों के झुंड’ के हमले नहीं रुकेंगे, क्योंकि नसबंदी के बाद उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाएगा। समस्या यह है कि लोग गला फाड़कर चिल्ला तो रहे हैं, पर समाधान किसी के पास नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि उन्हें ताजा हवा और खुशी के लिए जंगलों में छोड़ दो, उन्हें ऐसे आश्रयों में भेज दो, जो मौजूद ही नहीं हैं आदि। यहां मर्फी का नियम सटीक बैठता है, ‘किसी भी समस्या को बहुत जटिल बनाया जा सकता है, यदि उस पर खूब बहस हो!’ हम बस बहसों में उलझे हुए हैं।

पूरा देश बेरोजगारी, ट्रंप के टैरिफ, इस्राइल-हमास युद्ध, अलास्का शिखर सम्मेलन, पुतिन और ट्रंप, गाजा में मरते बच्चे, खाने की कमी या जीडीपी या यहां तक कि महंगाई को भूल गया है। बहस आवारा कुत्तों पर केंद्रित हो गई है। क्या हम कुत्तों को नौकरी पर नहीं रख सकते? ये संकर नस्ल के कुत्ते मजबूत और फुर्तीले होते हैं। इन्हें लाड़-प्यार की जरूरत नहीं होती और इनका रखरखाव भी बहुत कम है। इनके सुनने और सूंघने की क्षमता भी अच्छी होती है। घर में रखने पर वैक्सीन समेत एक कुत्ते का मासिक खर्च औसतन ढाई हजार रुपये आएगा। भारत में 6.3 करोड़ एमएसएमई और करीब तीन लाख कारखाने हैं। इसके अलावा, लाखों भंडारण गोदाम भी हैं। उनमें से प्रत्येक को सुरक्षा की जरूरत होती है। ऐसे में ये कुत्ते सभी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा का बड़ा जरिया हो सकते हैं। आठ घंटे की शिफ्ट के लिए एक गार्ड को करीब 15,000 रुपये प्रतिमाह देने पड़ते हैं। इससे सुरक्षा मजबूत होगी और खर्च भी कम होगा। उन्हें जर्मन शेफर्ड होने की भी जरूरत नहीं है, कोई भी नस्ल घुसपैठिये को देखकर भौंक सकती है। इससे बेजुबानों को अच्छा जीवन मिल जाएगा और पेटा भी इससे खुश होगा। पेटा से तो इस योजना के क्रियान्वयन पर नजर रखने के लिए कहना चाहिए।

कंपनी अधिनियम, 2013 द्वारा परिभाषित भारत में कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) गतिविधियों में गरीबी उन्मूलन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देना, पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करना तथा राष्ट्रीय विरासत और संस्कृति का समर्थन करना शामिल है। एक या कई कुत्तों के रखरखाव की लागत को सीएसआर ऑफसेट में शामिल किया जा सकता है। कुत्ता प्रेमी और एनजीओ इस उद्देश्य के लिए एक कोष बना सकते हैं-उन्हें ‘कुत्तों को दान देकर’ खुश होने दें। अगर आप बाल अधिकार, गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, मानव अधिकार और आपदा राहत के लिए किसी भी एनजीओ को दान दे सकते हैं, तो कुत्तों के लिए क्यों नहीं? पूरे भारत में अनेक एनजीओ जानवरों के अधिकार संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं।

पेटा के अंतर्गत एक एनजीओ-एम्प्लॉयमेंट एंड डिग्निटी फॉर डॉग्स (ईडीएफओडी) बनाएं। रॉयसी व्हाइट के अनुसार, ‘यदि आप यथास्थिति को नहीं बदल सकते, तो आप बदलाव लाएं।’ पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) दुनिया का सबसे बड़ा पशु मुक्ति संगठन है। वैश्विक स्तर पर एक करोड़ से ज्यादा इसके सदस्य और समर्थक हैं। पेटा व्यक्तिगत दानदाताओं के योगदान से वित्तपोषित हो रहा है। पेटा इंडिया का राजस्व दस करोड़ रुपये से अधिक था। सड़क किनारे कुत्तों को खाना देने वाले सभी कुत्ता प्रेमी पैसा, समय और ऊर्जा खर्च करते हैं। इस भावना का उपयोग ईडीएफओडी के जरिये इन कुत्तों के लिए भुगतान करने में किया जा सकता है। जैसा कि वाल्टर बेजहोट का कथन है, ‘जीवन में सबसे बड़ा आनंद वह काम करने में है, जिसके बारे में लोग कहते हैं कि आप नहीं कर सकते।’

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