तमिलनाडु का तमाशा
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तमिलनाडु का घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है। वहां की राजनीति के लिए सितंबर का यह महीना बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। प्रमुख विपक्षी दल द्रमुक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और खासकर भाजपा के खिलाफ लगातार आक्रामक रुख अपनाए हुए है। एम के स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक राजभवन से राष्ट्रपति भवन तक के चक्कर लगा रही है। पर अन्नाद्रमुक पूरी मजबूती के साथ प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के साथ खड़ी है। राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति चुनाव में अन्नाद्रमुक ने क्रमशः रामनाथ कोविंद और एम वेंकैया नायडु के पक्ष में मतदान किया था। भाजपा भी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अन्नाद्रमुक की एकजुटता बनी रहे, क्योंकि अन्नाद्रमुक न केवल कांग्रेस-विरोधी है, बल्कि हिंदुत्व की नीति की भी पक्षधर है।
बहुत संभव है कि जल्दी ही तमिलनाडु विधानसभा के स्पीकर उन 19 विधायकों को निलंबित कर दें, जिन्होंने टीटीवी दिनाकरन के साथ निष्ठा जताई थी। इसके बाद सियासी ड्रामा तेज होगा। आगामी 12 सितंबर को अन्नाद्रमुक जनरल काउंसिल की महत्वपूर्ण बैठक होगी। अन्नाद्रमुक में शशिकला की अंदरूनी पैठ को खत्म करने के लिए गतिविधियां तेज होंगी और टीटीवी दिनाकरन राजनीतिक मुद्दों को हवा देंगे। राजनीतिक रूप से हाशिये पर फेंक दिए जाने पर दिनाकरन को द्रमुक की शरण लेनी होगी।
उधर आगामी 20 सितंबर को नई दिल्ली में 2जी मामले में फैसला सुनाया जाने वाला है। चाहे अदालत का फैसला जिस पक्ष में आए, इससे द्रमुक-विरोधी माहौल बनेगा। इसका कारण यह है कि कांग्रेस भी 2जी के फैसले से अलग रहना चाहती है। वह द्रमुक के साथ ज्यादा सहानुभूति नहीं दिखाएगी। 2जी मुद्दे पर जयललिता ने दो चुनाव जीते। उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में इसी मुद्दे पर द्रमुक को हराया। 2जी मुद्दे पर नकारात्मक वोटिंग के चलते कांग्रेस का भी राज्य में सफाया हो गया। विधानसभा चुनाव में भी इसी मुद्दे पर जयललिता ने जीत हासिल की।
इन दो घटनाओं से न केवल नकारात्मक राजनीति शुरू होगी, बल्कि पलानीस्वामी सरकार के पतन में भी तेजी आएगी। दिनाकरन अन्नाद्रमुक की धुर विरोधी पार्टी द्रमुक के नेता एम के स्टालिन के संपर्क में हैं। स्टालिन तमिलनाडु विधानसभा में पलानीस्वामी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करेंगे। विधानसभा में फ्लोर टेस्ट कराने के लिए हंगामा होना लगभग तय है। इस बात की ज्यादा संभावना दिखती है कि अक्तूबर के मध्य में विधानसभा को निलंबित कर वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाए। इसकी मुख्य वजह यह है कि एक बार जब पलानीस्वामी सरकार गिर जाएगी, तब दिनाकरन द्रमुक में शामिल नहीं होंगे। अगर पलानीस्वामी सरकार गिर जाती है, तो राज्यपाल को द्रमुक को सरकार गठन के लिए बुलाना होगा। दो बार अल्पमत की सरकार का नेतृत्व करने के मामले में धोखा खा चुके स्टालिन तात्कालिक व्यवस्था के तौर पर सरकार बनाने की हिम्मत नहीं करेंगे, इसके बजाय वह तमिलनाडु में समय पूर्व चुनाव में जाना पसंद करेंगे। कहा जाता है कि फरवरी, 2018 में तमिलनाडु विधानसभा के चुनाव होंगे। पर क्या तब तक अन्नाद्रमुक को अपना दो पत्ती वाला चुनाव चिह्न वापस मिल पाएगा?
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह तमिलनाडु विधानसभा में फ्लोर टेस्ट नहीं चाहते, क्योंकि अन्नाद्रमुक के दोनों धड़ों का विलय हो चुका है। अब यह विपक्षी दलों का काम है कि वे विधानसभा अध्यक्ष से पलानीस्वामी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के बारे में बात करें। राज्यपाल और राष्ट्रपति से मुलाकात करने के बजाय मुख्य विपक्षी पार्टी द्रमुक और अन्य विपक्षी पार्टियों को विधानसभा अध्यक्ष को सत्र बुलाने के लिए कहना चाहिए, जहां वे सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएंगी। अन्नाद्रमुक के शिष्टमंडल को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से यही स्पष्ट संदेश प्राप्त हुआ है।
राजनाथ सिंह ने जो संकेत अन्नाद्रमुक को दिया है, वही संदेश वह तमिलनाडु के राज्यपाल और राष्ट्रपति को भी देंगे। दिलचस्प बात यह है कि अन्नाद्रमुक के शिष्टमंडल के साथ राजनाथ सिंह की मुलाकात के समय लोकसभा के उप सभापति थंबीदुरई भी मौजूद थे। उसके बाद अन्नाद्रमुक के नेताओं ने केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली और निर्मला सीतारमण से भी मुलाकात की।
क्या सुपर स्टार रजनीकांत तमिलनाडु की राजनीति में कूदेंगे या क्या कमल हासन द्रमुक के साथ कोई मोर्चा बनाएंगे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब समय आने पर ही मिलेगा। लेकिन तमिलनाडु की राजनीति को समझने के लिए जाति व्यवस्था, राजनीतिक सत्ता के वितरण और सियासी ड्रामे के पीछे के लोगों को समझना जरूरी है। अन्नाद्रमुक को चलाने वाली तीन प्रमुख जातियां हैं-थेवर, गोंडर और नडार। मुस्लिम और ईसाई जैसे अल्पसंख्यक भी अन्नाद्रमुक में बड़ी संख्या में हैं। पर अन्नाद्रमुक में राजनीतिक सत्ता के दो ध्रुव हैं-पहले मुख्यमंत्री पलानीस्वामी और दूसरे सर्वाधिक समृद्ध राजनेता दिनाकरन। अन्नाद्रमक के महासचिव पद से शशिकला को हटाए जाने के तुरंत बाद सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं ने चुनाव आयोग से संपर्क कर यह सुनिश्चित करना चाहा कि पार्टी का चुनाव चिह्न-दो पत्ती-पलानीस्वामी के नेतृत्व में चल रहे अन्नाद्रमुक को वापस लौटाया जाए।
क्या 2019 में मोदी तमिलनाडु के मतदाताओं को अपने पक्ष में कर पाएंगे? इसमें थोड़ा संदेह है, क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव अब दूर नहीं हैं। भाजपा वहां सांगठनिक स्तर पर कमजोर है। हां, पैंतीस वर्ष से कम उम्र के मतदाताओं के बीच मोदी की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। पर राष्ट्रीय स्तर की दोनों पार्टियां कांग्रेस और भाजपा वहां कमजोर हंै और वे द्रमुक या अन्नाद्रमुक पर निर्भर हैं। तमिलनाडु में उम्मीद किसी गैर द्रविड़ पार्टी से ही है। कड़गम को दरवाजा दिखा सकने वाली राष्ट्रीय पार्टियां एक दूसरे से होड़ ले रही हैं। ऐसे में तमिलनाडु के तमाशे के और दिलचस्प होने की संभावना है।