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टैगोर, तैय्यबजी और साराभाई

Sun, 12 Apr 2015 04:08 PM IST
रामचंद्र गुहा
रामचंद्र गुहा Updated Sun, 12 Apr 2015 04:08 PM IST
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Tagore, Taiyabji and Sarabhai

कुछ महीने पहले, जब मैं कोलकाता में था, मुझे लईक फतेहली के निधन की खबर मिली। वह एक लेखिका और समालोचक थीं, जिनका मैं बड़ा प्रशंसक था। उस वक्त जिस दोस्त के साथ मैं था, वह लईक को नहीं जानता था, इसलिए मैंने काफी देर तक उस समय के प्रतिष्ठित जर्नल 'क्वेस्ट' के साहित्यिक संपादक और विविध विषयों पर कई किताबों की लेखिका के तौर पर लईक के काम के बारे में उसे बताया। वह जिस बड़े परिवार से ताल्लुक रखती थीं, उसके बारे में भी मैंने अपने मित्र को जानकारी दी। मैंने उसे बताया, 'लईक तैय्यबजी थीं। तुम तैय्यबजी परिवार को पश्चिमी भारत का टैगोर परिवार मान सकते हो। यह एक ऐसा परिवार था, जो कला और सार्वजनिक जीवन में सही मायनों में गौरव की मिसाल था।' यह सब सुनकर मित्र के चेहरे पर अविश्वास की लकीरें खिंच गईं। आखिर ऐसा कौन बंगाली होगा, जो किसी शख्स की टैगोर से तुलना बर्दाश्त कर सके। मैंने कुछ नामों के उदाहरण देते हुए बोलना जारी रखा। तैय्यबजी परिवार के पहले महान शख्स थे, बदरुद्दीन तैय्यबजी, जो कि बॉम्बे हाई कोर्ट के जज और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शुरुआती अध्यक्ष भी थे। प्रत्यक्ष तौर पर बदरुद्दीन की वंश बेल में टेनिस खिलाड़ी और कानूनी शोधकर्ता ए ए फैजी (इस्लामिक लॉ पर किताब के लेखक), राजनीतिज्ञ व सामाजिक सुधारक सैफुद्दीन तैय्यबजी, पर्यावरण संरक्षक जफर फतेहली और मशहूर भारतीय कूटनीतिज्ञ व लेखक बदरुद्दीन तैय्यबजी 'जूनियर' जैसी हस्तियां शामिल थीं। मेरी मित्र लईक फतेहली खुद बदरुद्दीन के बड़े भाई शम्सुद्दीन तैय्यबजी की वंशज थीं। शम्सुद्दीन के इकलौते पुत्र अब्बास तैय्यबजी थे, जो कभी बड़ौदा राज्य के मुख्य न्यायाधीश रहे थे। बाद में उन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद नमक सत्याग्रह की बागडोर संभाली। शम्सुद्दीन के पोते और अब्बास के भतीजे महान पक्षी विज्ञानी सलीम अली थे, जिन्होंने न केवल भारतीय पक्षियों के अध्ययनों पर किताब लिखी, बल्कि वह दुनिया भर के पर्यावरण संरक्षणवादियों के लिए प्रेरणा के स्रोत भी थे।

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तैय्यबजी परिवार की महिलाएं भी पुरुषों से पीछे नहीं थीं। सलीमा तैय्यबजी अपनी किताब में बताती हैं कि उनके परिवार की महिलाएं पश्चिम भारत में शुरुआती मुस्लिम महिलाएं थीं, जो बुर्के से बाहर आईं, जिन्होंने विदेश यात्रा की, जो स्कूल व कॉलेजों में गईं और जिन्होंने अपने अनुभवों को कागज पर उतारने की शुरुआत भी की। बाद की पीढ़ियों ने भी परिवार के नाम को ऊंचा बनाए रखा। अब्बास तैय्यबजी की पुत्रियों में से एक साहसी महिला अधिकार कार्यकर्ता शरीफा हामिद अली और आध्यात्मिक व मीराबाई के भजनों को अपनी आवाज देने वाली रेहाना तैय्यबजी थीं। यह उस टिप्पणी के पीछे की कहानी है, जो मैंने कोलकाता में तैय्यबजी परिवार के बारे में की थी। टैगोर से तुलना को लेकर की गई मेरी टिप्पणी से कई लोग नाराज हुए। मगर तब तक मुझे इस तुलना की वैधता का सबूत मिल चुका था। गांधी का अध्ययन करते वक्त एक चिट्ठी मेरे हाथ लगी, जो कि उन्होंने 17 अप्रैल, 1920 को अब्बास तैय्यबजी को लिखी थी। इसमें गांधी लिखते हैं, 'तैय्यबजी और टैगोर परिवार निस्संदेह भारत के लिए तोहफे जैसे थे।' इसमें संदेह नहीं कि टैगोर परिवार का योगदान काफी बड़ा है, और इससे हर कोई वाकिफ भी है। इस परिवार में सबसे मशहूर थे, रवींद्रनाथ, जो कवि, उपन्यासकार, नाटककार, संगीतकार, कलाकार, संस्थानों के निर्माता और नोबल पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई होने के साथ-साथ ऐसी हस्ती थे, जिन्होंने गांधी और नेहरू, दोनों को बेहद प्रभावित किया।
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रवींद्रनाथ का व्यक्तित्व असाधारण था, हालांकि इसमें उनके पूर्वजों का भी योगदान था। उनके बाबा द्वारकानाथ एक कामयाब उद्यमी थे, जिनकी संपत्ति ने आने वाली पीढ़ियों के कलात्मक शौकों के लिए जमीन तैयार की। उनके पिता देवेंद्रनाथ एक प्रगतिशील सुधारक और संपादक थे। रवींद्रनाथ के प्रतिभाशाली सहोदरों में बेहद विद्वान व संगीतकार द्विजेंद्रनाथ, अभिनेता व अनुवादक ज्योतिंद्रनाथ, गायिका, संपादक व सामाजिक कार्यकर्ता स्वर्णकुमारी के अलावा सत्येंद्रनाथ थे, जो भारतीय सिविल सर्विस के पहले अश्वेत सदस्य बने। टैगोर परिवार की आगे की पीढ़ी भी प्रतिभा के मामले में पीछे नहीं थी। रवींद्रनाथ के भतीजों में आधुनिक पेंटर अवनींद्रनाथ और गगनेंद्रनाथ शामिल थे। वहीं, उनकी भतीजियों में सरला देवी थीं, जो गायिका, लेखिका और देशभक्त थीं। सरला देवी पर गांधी इस कदर मोहित थे, कि एक बार उन्होंने उनको अपनी 'आध्यात्मिक पत्नी' बनाने की इच्छा भी जाहिर कर दी थी।
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सवाल उठता है कि टैगोर और तैय्यबजी परिवारों में ज्यादा महान कौन है? इस सवाल का जवाब देने के बजाय मैं एक तीसरे परिवार का परिचय देना चाहूंगा, जिसे इन दोनों परिवारों की तुलना में थोड़ा कम प्रतिभाशाली कहा जा सकता है। यह अहमदाबाद का साराभाई परिवार था। परिवार के बुजुर्ग थे, अंबालाल, जिनकी एक टेक्सटाइल मिल थी और वह एक परोपकारी शख्स थे। वह महात्मा गांधी के शुरुआती समर्थकों में से थे। 1915 में जब गांधी को फंड देने वालों ने इस आधार पर अपने हाथ खींच लिए कि उन्होंने एक 'अस्पृश्य' को आश्रम में प्रवेश की अनुमति दी थी, तब अंबालाल साराभाई गांधी की मदद के लिए आगे आए थे। अंबालाल की बहन अनासुया खुद गांधी के बेहद नजदीक थीं। वह अग्रणी नारीवादी और ट्रेड यूनियन समर्थक महिला थीं। मिल के कर्मचारियों और उनके बच्चों के लिए वह कई स्कूल चलाती थीं। 1918 में वाजिब वेतन के लिए किए जा रहे मजदूरों के एक आंदोलन का नेतृत्व करते वक्त उन्हें अपने भाई के खिलाफ खड़ा होना पड़ा था, जो मिल मालिकों का पक्षधर था। अनसूया ने कभी विवाह नहीं किया। हालांकि रूढ़ियों और परंपराओं को चुनौती देते हुए वह अपने गांधीवादी साथी और ट्रेड यूनियन समर्थक शंकरलाल बैंकर के साथ लिव इन रिश्ते में थीं। अंबालाल साराभाई के सात बच्चे थे। सभी प्रतिभाशाली थे, मगर उनमें से कम से कम चार असाधारण थे। इनमें से विक्रम विद्वान भौतिक विज्ञानी थे, जिन्होंने अहमदाबाद में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट की स्थापना की। इसके अलावा वह इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन के भी संस्थापक थे। मृदुला, जिन्होंने देश के विभाजन के बाद रिफ्यूजी समस्या से निपटने और उसके बाद, कश्मीरियों और उनके नेता शेख अब्दुल्लाह को, जिन्हें नेहरू सरकार ने कैद में डाला हुआ था, न्याय दिलाने में जबर्दस्त साहस दिखाया। गौतम सार्वजनिक कल्याण के लिए काम करने वाले एक उद्यमी थे, जिन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (एनआईडी) की स्थापना की। इसके अलावा, उत्कृष्ट डिजाइनर गिरा थीं, जिन्होंने एनआईडी और कालको टेक्सटाइल म्यूजियम की स्थापना में अपने भाई का सहयोग किया।


अगर गांधी को मौका मिलता, तो जिन परिवारों को उन्होंने भारत के लिए तोहफा कहा, उनमें टैगोर और तैय्यबजी के अलावा साराभाई परिवार को भी जरूर जोड़ते। इन तीन परिवारों में कई चीजें समान हैं। मसलन, सामाजिक बंधनों को नकारने के साथ अनुशासनात्मक सीमाओं को लांघने की क्षमता, रचनात्मकता का कभी न रुकने वाला प्रवाह और परिवार की महिलाओं को पूर्ण आजादी। महज एक लेख इन परिवारों की प्रतिभाओं और उपलब्धियों के साथ न्याय नहीं कर सकता। हालांकि यह भी सच है कि टैगोर परिवार के पास तो खुद पर लिखने वाले अपने कई इतिहासकार हैं, मगर तैय्यबजी और साराभाई परिवार को फिलहाल ऐसे 'अपनों' का इंतजार है।

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