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और अंत में प्रार्थना
निकोलस क्रिस्टोफ
Updated Fri, 11 Sep 2015 08:34 PM IST
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पोप फ्रांसिस, एंजेला मर्केल और जर्मनी व ऑस्ट्रिया के उन तमाम साधारण लोगों को शाबाशी, जिन्होंने अपनी धरती पर शरणार्थियों का स्वागत किया। उन अमेरिकी राजनीतिज्ञों की भी प्रशंसा की जानी चाहिए, जिन्होंने माना कि अमेरिका को और सीरियाई शरणार्थियों को शरण देनी चाहिए। जब चार वर्ष पहले यह दयनीय युद्ध शुरू हुआ था, तो अमेरिका ने मात्र 1,500 शरणार्थियों को पनाह की अनुमति दी थी।
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अगर आपके पास दिल है, तो आप शरणार्थियों से प्रभावित होंगे। लेकिन आपके पास दिमाग है, तो आप यह भी महसूस करेंगे कि जर्मनी द्वारा शरणार्थियों के स्वागत करने से ही इस संकट का समाधान नहीं होने वाला। दुनिया भर में छह करोड़ लोग विस्थापित हैं और उनमें से ज्यादातर अभी समुद्र पार करने के लिए कमजोर नावों में सवार होना चाहते हैं। ओक्लाहोमा विश्वविद्यालय में सीरिया विशेषज्ञ जोशुआ लैंडिस बताते हैं कि 'शरणार्थियों की संख्या बढ़ेगी ही। एक बार जब लोग देखेंगे कि शरणार्थियों को पश्चिम में पनाह मिल रही है, तो भगदड़ मच जाएगी। यह संकट और बढ़ने वाला है।'
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अगर हम सचेत नहीं होते, तो और भी मासूम बच्चे डूब कर मर सकते हैं। अगर हम अनजाने में शरणार्थियों के इस ज्वार को बढ़ावा देते हैं, तो उसका फायदा मानव तस्कर, विद्रोही लड़के, नव-नाजी और धुर दक्षिणपंथी संकीर्णतावादी राजनीतिज्ञ भी उठाएंगे। एक आप्रवास विरोधी पार्टी अभी स्वीडन में चुनाव में आगे है, और जर्मनी से खबर आ रही है कि शरण पाने वालों पर 340 हमले हुए हैं, जिसमें बीते हफ्ते एक पनाह घर में आगजनी की घटना भी शामिल है। इसलिए शरणार्थियों के प्रति करुणा के साथ हर तरह से इस संकट से निपटने की जरूरत है। लेकिन झटके के रूप में नहीं, जैसा कि हंगरी के अधिकारी कहते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात है कि हमें इस संकट को मूल से खत्म करना होगा, खासकर पश्चिमी एशिया के संदर्भ में।
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इसके लिए सबसे जरूरी कदम लेबनान, तुर्की और जॉर्डन में 37 लाख सीरियाई शरणार्थियों की स्थिति में सुधार है। विश्व खाद्य कार्यक्रम जॉर्डन में 2.29 लाख शरणार्थियों के राशन में कटौती को मजबूर हुआ, क्योंकि उसके पास धन की कमी पड़ गई, और अगर विश्व से जॉर्डन के शरणार्थियों को खिलाने के लिए वित्तीय सहायता नहीं मिली, तो पश्चिम को उनके लिए इंतजाम करना होगा।
उसके बाद सीरिया को फिर से रहने योग्य बनाने की कोशिश भी कम मुश्किल काम नहीं है। यह असंभव हो सकता है, लेकिन स्पष्ट बता दूं कि, जैसे ही यह बात स्थापित हो जाएगी कि हम सीरिया के लिए एक मार्गदर्शक बन गए हैं, स्थिति अब से ज्यादा भयावह हो जाएगी। कई विशेषज्ञों को आशंका है कि युद्ध वर्षों लंबा खिंचेगा, लाखों और लोग मारे जाएंगे और लाखों लोग पलायन के लिए मजबूर होंगे।
मैं सीरिया के विद्रोहियों के कब्जे वाले शहर जाबदानी में महिलाओं की मिन्नतों को देखकर हिल गया हूं। इस शहर को महीनों से सरकार समर्थक बलों ने घेर रखा है। इन महिलाओं को भय है कि अगर सरकारी बल ने जाबदानी को अपने कब्जे में कर लिया, तो नरसंहार होगा। इसलिए सैकड़ों महिलाओं ने संघर्ष विराम, अंतरराष्ट्रीय संरक्षण और घायलों की निकासी के आह्वान-पत्र पर हस्ताक्षर किया। इस जोखिम के बावजूद कि अगर शहर पर कब्जा कर लिया जाता है, तो उनकी हत्या या उनके साथ बलात्कार भी हो सकता है, उन्होंने साहसपूर्वक उस पर अपना नाम लिखा है।
सीरिया पर किताब लिखने वाले पश्चिम एशिया विश्लेषक एमिल होकायम कहते हैं, 'मैं कभी इतना निराश नहीं हुआ था। शुरू में कई विकल्प थे, लेकिन आज वे विकल्प काफी महंगे, जोखिमपूर्ण बन गए हैं और उससे बहुत ज्यादा फायदा नहीं होने वाला।' फिर जब तक हम सीरिया संकट पर बात करते हैं, हमें यूरोपीय और अमेरिकी संकट पर भी ध्यान देना चाहिए। ओबामा प्रशासन ने बार-बार सीरिया संकट का गलत आकलन किया है और इस समस्या को कम करके आंका है, भले ही समस्या तेजी से भयावह होती गई। और कुछ प्रमुख रिपब्लिकन इस्लामिक स्टेट से मुकाबला करने के लिए अपने जवान भेजना चाहते हैं। यानी इराक जैसी स्थिति की वापसी।
कम से कम बुरा विकल्प आज यह है कि सीरिया के दक्षिण में नो फ्लाई जोन (उड़ानों के निषिद्ध क्षेत्र) बनाया जाए। यह कम पैसे में बिना स्थल सेना के उपयोग के अमेरिकी पोतों में भूमध्यसागरी मिसाइल की तैनाती से किया जा सकता है। इससे बैरल बम के धमाके खत्म होंगे। इसी तरह नो फ्लाई जोन से फायदा उठाकर सीरिया सरकार और उसके रूसी एवं ईरानी सहयोगियों पर समझौते के लिए दबाव बनाया जा सकता है। अभी सीरिया के विपक्ष को अपने गुट इंडिपेंडेंट डिप्लोमैट के जरिये सलाह दे रहे पूर्व ब्रिटिश राजनयिक रेजा अफसर का कहना है कि 'यदि वे अपने विमानों का उपयोग नहीं करेंगे, तो एक दिन ऐसा आएगा, जब वे समझ जाएंगे कि वे बच नहीं सकते और वही उन्हें वार्ता की मेज पर लाएगा।'
किसी भी पक्ष की ओर से बिना किसी पूर्व शर्त की बातचीत का उद्देश्य सीमा रेखा में सुधार के साथ संघर्ष विराम होगा। बेशक यह बुरा विकल्प है, क्योंकि इससे सीरिया में वास्तव में विभाजन होगा और आंशिक रूप से ही शासन बचा रहेगा। शायद राष्ट्रपति बशर अल असद की जगह एक नया अलवाइट जनरल राष्ट्रपति बनेगा। अन्यथा हम तेजी से नरसंहार की तरफ बढ़ते रहेंगे।
सीरिया में अमेरिका के पूर्व राजदूत रॉबर्ट फोर्ड, जिन्होंने ओबामा प्रशासन की सीरिया से संबंधित नीति को बचाव करने में अक्षम पाने के कारण अपने पद से त्यागपत्र दे दिया, का कहना है कि अगर समझौता सफल भी होता है, तब भी दो वर्षों तक नरसंहार जारी रहेगा। फिर भी यह अन्य विकल्पों की तुलना में बेहतर है। वह आगे कहते हैं कि वहां अपना वर्चस्व दिखाना गैर-जिम्मेदाराना तरीका है और वहां कुछ भी नहीं किया जा सकता। निश्चित रूप से स्थितियां और बदतर होंगी।