परिदृश्य: मुंबई हमले के डेढ़ दशक बाद भी अल्प-विकसित है हमारी शहरी निगरानी व्यवस्था
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विस्तार
पंद्रह साल पहले मुंबई में हुए 26/11 के आतंकी हमले ने भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान को स्तब्ध कर दिया था। जिस दुस्साहस के साथ उसे अंजाम दिया गया था, उससे बाकी भारत असहाय और अनिर्णय की स्थिति में दिखने लगा था। लेकिन पंद्रह साल बाद भी पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान को कठघरे में लाने में भारत विफल रहा है, जबकि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों ने आतंकवादी कार्रवाइयों के खिलाफ प्रतिबंधों का समर्थन किया था। संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न मंचों पर पाकिस्तान को समर्थन उसे अभियोजन से बचाता है, क्योंकि पश्चिम असहाय रहता है। आतंकी हमलों का इस्तेमाल पाकिस्तान की विदेश नीति का विश्वसनीय हिस्सा है, जिसे वह नहीं छोड़ेगा। उरी एवं बालाकोट हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद यह भारत की चिंता का विषय है।
आतंकवाद के खिलाफ सफल खुफिया ऑपरेशन वास्तव में रक्षा के लिए पहली जरूरत है और ऐसे संभावित खतरों को रोकने के लिए हमारी खुफिया एजेंसियों की सराहना की जानी चाहिए। लेकिन क्या हम उन स्थितियों से निपटने के लिए गंभीरता से तैयारी कर रहे हैं, जो हमें आतंकी हमलों से बचा सकती है, और क्या हम पाकिस्तान से आ रहे अशुभ बादलों को देख पा रहे हैं? यह रुका नहीं है, जैसा कि हमने हाल ही में देखा कि नियंत्रण रेखा के उस पार से हमले हो रहे हैं। बार-बार हो रहे ये आतंकी हमले अशुभ संकेत हैं। आत्मघाती हमलों के लिए उपयोग की जा रही ये तकनीकें भविष्य में भी हमलों के लिए मॉडल प्रदान करती हैं।
वास्तव में 26/11 हमले के बाद से पश्चिमी सरकारों (यहां तक कि अमेरिका और ब्रिटेन तक) ने शहरी ठिकानों पर हमले के लश्कर के 'मुंबई टैम्पलेट' का विस्तार से विश्लेषण किया, प्रोटोकॉल तैयार किए और अपनी प्रतिक्रिया (जवाबी कार्रवाई) का पूर्वाभ्यास किया। पर भारत में हम तैयारी से कोसों दूर नजर आते हैं। हमारे शहरों ने, कम से कम मेट्रो शहरों ने अभी तक इसका अनुसरण क्यों नहीं किया? जबकि आज लगभग सभी सुरक्षा जरूरतों के लिए तकनीकी समाधान उपलब्ध हैं।
मुंबई के गृह मंत्रालय और पुलिस विभाग ने किस तरह तटीय सुरक्षा के प्रति पूर्णतः गैर-पेशवर रुख दिखाया है, इसकी एक ताजा रिपोर्ट देखिए। कथित रूप से पिछले तीन वर्षों में मुंबई पुलिस ने मुंबई के तटीय इलाकों की सुरक्षा के लिए 46 नावें खरीदीं, लेकिन आज उनमें से मात्र आठ नावें ही काम कर रही हैं। पाकिस्तान द्वारा मुंबई को लक्ष्य के रूप में चुनने का एक कारण पूरे मुंबई में तैयारियों की दयनीय स्थिति थी। इसने भारत की बहुत खराब छवि पेश की और इसके पुलिस बल पॉइंट 303 बोल्ट ऐक्शन राइफल भी चलाने में असमर्थ थे, एके 47 या 56 तो दूर की बात थी।
अफसोस की बात है कि जो लोग पुलिस में भर्ती होते हैं, उन्हें आतंकियों या विद्रोहियों से लड़ने में दिलचस्पी नहीं है। वे ट्रैफिक चालान काटने में ही सक्षम हैं। इससे कसाब जैसे आतंकवादी को डर नहीं लगेगा। सबसे बड़ी बात है कि जब दुनिया भर में आतंकवाद से निपटने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जा रहा है, तब हमारे शहरों की निगरानी व्यवस्था अल्प-विकसित बनी हुई है। जैसा कि मुंबई की जंग खा रही नावों के साथ हुआ है, पूरे देश में पुलिस विभाग अपने राजनीतिक आकाओं को तब तक नए उपकरणों की मंजूरी के लिए कहती रहती हैं, जब तक वे भी सड़ न जाएं। जो भी थोड़ी-सी नावें बची हैं, वे मुश्किल से काम करती हैं। पुलिस में प्रशिक्षण एवं उपकरणों के रख-रखाव की अवधारणा सशस्त्र बलों से अलग है, जो कि पुराने उपकरणों से भी सबसे बुरी स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहते हैं।
राज्यों की राजधानियों में हाई-टेक पुलिस कमांड सेंटर बनते हैं और मंत्रियों को दिखाया जाता है, जो फिर घर जाकर आराम से सोते हैं। लेकिन बीट कॉन्स्टेबल को अक्सर अकेले बिना वॉकी-टॉकी के लाठी के सहारे हमारे शहरों और लोगों की सुरक्षा के लिए छोड़ दिया जाता है। हालांकि कुछ सीमाएं हैं। राज्य पुलिस का बजट बेहद अपर्याप्त है, जिससे मुश्किल से ही पुलिस का खर्च निकल पाता है। इसमें मुख्यमंत्रियों का भी दोष है। पुलिस आधुनिकीकरण लगभग पूरी तरह से केंद्र सरकार के अनुदान पर निर्भर है। दूसरी समस्या यह है कि हम केंद्रीय आतंकवाद विरोधी क्षमताओं को बढ़ाकर ऊपर से नीचे की ओर समाधान थोपना चाहते हैं, जबकि सांविधानिक एवं कानूनी ढांचा पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था को राज्य की जिम्मेदारी बताता है। इस प्रकार राज्य पुलिस बल आतंकवादी हमलों सहित सभी प्रकार के अपराधों की रोकथाम करने, पता लगाने, पूर्व-निवारण और फिर निष्प्रभावी करने और जांच करने के लिए प्राथमिक तंत्र है।
राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) अपने चार क्षेत्रीय केंद्रों और दिल्ली स्थित मुख्यालय से कितने शहरों में समय पर सक्रिय हो सकता है? वे स्वीकार करते हैं कि वे ऐसा नहीं कर सकते। इस पर भी विचार करें कि एक शहर के भीतर कई जगहों पर हमला हो सकता है। अगर जवाब अपरिष्कृत रेडियोलॉजिकल उपकरण (जिसे वे गंदा बम कहते हैं) से देना हो, तो स्थिति समझी जा सकती है। मान लीजिए कि एनएसजी इकाइयां भारी अभियान, एयरलिफ्ट क्षमताओं और खाली सड़कों के साथ आगे बढ़ती हैं, तब भी क्या हम असहाय नागरिकों पर विशेष रणनीति के तहत हमला करने वाले उच्च प्रशिक्षित आतंकवादियों के समक्ष शुरुआती कुछ घंटे समर्पण का जोखिम उठा सकते हैं? वैसी स्थिति में मुंबई की तरह 60 घंटे तक बंधक बने रहने की घटना दोहराई जा सकती है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे जाएंगे और लाखों लोग परोक्ष रूप से पीड़ित होंगे, क्योंकि वे अपने टीवी स्क्रीन से चिपके रहेंगे। आतंकवादी बिल्कुल यही चाहते हैं।
यदि आतंकवादियों को शुरुआती लाभ से वंचित करना है, तो स्थानीय पुलिस और थानों को इस सामरिक जिम्मेदारी के लिए उपकरणों एवं प्रशिक्षण से सुसज्जित कर तैयार करना होगा। दिल्ली में आतंकवाद विरोधी क्षमताओं को विवेकपूर्ण ढंग से बढ़ाया जाना चाहिए, उनकी प्रभावकारिता का परीक्षण किए बिना केंद्रीय अधिकारों का विस्तार करने से बचना चाहिए। हमें अपने राज्य पुलिस बलों में किसी आतंकवादी हमले पर प्रारंभिक मुकाबले के लिए भी अधिक निवेश करने की आवश्यकता है। इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह से राज्य सरकारों को उठानी चाहिए।