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आचरण पर सवाल: आई-पैक मामले पर सुप्रीम कोर्ट की ममता बनर्जी को फटकार, राजनेताओं के लिए क्यों जरूरी?

Fri, 24 Apr 2026 06:44 AM IST
Devesh Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 24 Apr 2026 06:44 AM IST
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सार
हाल ही में, एसआईआर कार्य में जुटे न्यायिक अधिकारियों को, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं, नौ घंटों तक बंधक बनाए रखने पर भी अदालत ने ममता सरकार की खिंचाई की थी। दरअसल, आर्थिक अपराधों, भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर मामलों की पड़ताल कर रही ईडी जैसी संस्थाओं की जांच को अगर सत्ता में बैठे लोग अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कमजोर करने की कोशिश करते हैं, तो इससे न्याय प्रक्रिया तो बाधित होती ही है, आम जनता का भरोसा भी कमजोर होता है।
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supreme court reprimand mamata banerjee ed IPAC probe interference west bengal
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

राज्य में पहले चरण के मतदान की पूर्व संध्या पर सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में आई-पैक के दफ्तर में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी में बाधा डालने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जो फटकार लगाई है, वह राजनेताओं को सांविधानिक व्यवस्था का स्मरण कराने के लिए जरूरी होने के साथ तृणमूल सरकार के लिए एक बड़ा झटका भी है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया है कि यदि राज्य का मुखिया किसी केंद्रीय एजेंसी की जांच में बाधा उत्पन्न करता है, तो यह केंद्र व राज्य के बीच राजनीतिक टकराव का नहीं, सीधे तौर पर व्यक्ति के आचरण का मामला है, जो पद की गरिमा और कानून के शासन को चुनौती देता है। उल्लेखनीय है कि गत आठ जनवरी को ईडी ने राजनीतिक परामर्शदाता कंपनी आई-पैक के निदेशक के घर और दफ्तर पर छापा मारा था और इसी दौरान ममता बनर्जी पुलिस बल के साथ वहां पहुंचीं और कुछ फाइलें अपने साथ लेकर चली गईं। बंगाल के लिए ये स्थितियां नई नहीं हैं। हाल ही में, एसआईआर कार्य में जुटे न्यायिक अधिकारियों को, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं, नौ घंटों तक बंधक बनाए रखने पर भी अदालत ने ममता सरकार की खिंचाई की थी। दरअसल, आर्थिक अपराधों, भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर मामलों की पड़ताल कर रही ईडी जैसी संस्थाओं की जांच को अगर सत्ता में बैठे लोग अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कमजोर करने की कोशिश करते हैं, तो इससे न्याय प्रक्रिया तो बाधित होती ही है, आम जनता का भरोसा भी कमजोर होता है। इस संदर्भ में महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार का वह दौर भी याद आता है, जब अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत मामले की जांच के दौरान पुलिस व एजेंसियों की ऐसी ही खींचतान ने पूरे देश को अचंभित कर दिया था। बेशक, इसका दूसरा पहलू भी है। विपक्ष अक्सर आरोप लगाता है कि ईडी व सीबीआई जैसी एजेंसियां केंद्र के इशारे पर काम कर रही हैं। पर इसका समाधान जांच में बाधा डालना नहीं हो सकता। अगर किसी को लगता है कि जांच दुर्भावनापूर्ण है, तो अदालतों के दरवाजे खुले हैं। इस तरह मुख्यमंत्री का जांच में बाधा बनना अराजकता को तो निमंत्रण देता ही है, इससे नागरिकों में भी गलत संदेश जाता है। राज्य की सीमाओं के नाम पर राजनेता जो कर रहे हैं, उससे यही लगता है कि राजनीति किस हद तक नीचे उतर चुकी है। इस पर सभी राजनीतिक दलों को सोचना चाहिए, क्योंकि इस तरह से तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कभी तार्किक परिणति तक पहुंचने से रही।
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