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तोता, चूजा और कबूतर

Wed, 15 May 2013 02:56 PM IST
राजेंद्र शर्मा
राजेंद्र शर्मा Updated Wed, 15 May 2013 02:56 PM IST
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supreme court commented on cbi in coal block allocation case

दिग्गी राजा माफ करें, उनकी आपत्ति हमारी तो समझ में आई नहीं। सीबीआई को सुप्रीम कोर्ट ने तोता कह दिया, तो इसमें उन्हें क्या प्रॉब्लम है?

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सुना है कि उन्हें इसमें सीबीआई की बेइज्जती नजर आ रही है। अब हम वह पुराना घिसा हुआ डॉयलॉग नहीं दोहराना चाहते कि बेइज्जती उसी की होती है, जिसकी कोई इज्जत हो!
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फिर भी इतना तो जानना चाहेंगे कि आखिरकार बेइज्जती किस चीज से हुई है? तोता कहने से या सुप्रीम कोर्ट के तोता कहने से? पिंजरे में बंद तोता कहने से या फिर मालिक की ही बोली बोलने वाला तोता कहने से?
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इतना तो दिग्गी राजा भी नहीं कहेंगे कि अदालत के ही तोता कहने से बेइज्जती हो गई, क्योंकि अदालत की बेइज्जती का जोखिम वह नहीं उठाना चाहेंगे। रही बात पिंजरे में बंद, अपने मालिक की ही बोली बोलने वाले, कई-कई मालिकों वाले आदि, इत्यादि तोते की, तो इनमें बेइज्जती वाली बात नहीं लग रही। सच पूछिए तो हमें इनमें प्रशंसा के ही तत्व दिख रहे हैं।

जब तक मालिक, मालिक है, उसकी बोली बोलना क्या वफादारी का मामला नहीं माना जाएगा? लोग तो वफादार कुत्ता कहने का भी बुरा नहीं मानते हैं और यहां वफादार तोता कहने में बेइज्जती खोजी जा रही है! जहां तक तोते के कई-कई मालिकों की बात है, तो बहुलतावाद के इस जमाने में मालिक जितने ज्यादा हों, उतने ही अच्छे।


अब बची पिंजरे की बात, तो पिंजरा अगर बंद करके रखता है, तो बाहर के खतरों से बचाता भी तो है! जिसे वह कैदी सीबीआई कहना समझ रहे हैं, सीबीआई को खतरों से सुरक्षित करना निकले तो? सरकार की उदारता देखिए कि सीबीआई को निश्चिंत करने में लगी है, जबकि बाबा तुलसीदास का सैकड़ों साल पुराना गुर है-भय बिनु होहिं न प्रीति! भाई, सिद्धांत की बात है।

जब भाई लोग सिद्धांत के लिए कर्नाटक की अपनी सरकार कुर्बान कर सकते हैं, तो डॉ साहब की सरकार क्या अपने प्रति सीबीआई की वफादारी भी कुर्बान नहीं कर सकती?

जरूर दिग्गी राजा को तोते के ही जिक्र में आपत्ति होगी। पर जब लोग खुद को शेर या हाथी बताते हैं, तो फिर सीबीआई को तोता या आईबी को मुर्गी का चूजा कहने में ही आपत्ति क्यों। हम तो सोचते हैं कि लगे हाथों सीएजी को भी कबूतर कह डालें-हर वक्त अरक्षित, फिर भी खतरों से आंखें मूंदकर चलने वाला! वैसे भी शांति के कबूतरों की किसी को जरूरत रह नहीं गई है।

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