जीवन की सांध्य बेला में सहारा
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त्रिशूर (केरल) के वृद्धाश्रम में रहते हैं, सढ़सठ साल के कोचनियां मेनन। वहीं रहती थीं छियासठ साल की पी वी लक्ष्मी। दोनों एक-दूसरे को अरसे से जानते थे। मेनन, लक्ष्मी के पति के मित्र थे। बहुत साल पहले लक्ष्मी के पति ने अपनी मृत्यु के बाद मेनन से उनकी पत्नी की देखभाल करने के लिए कहा था। हालांकि कुछ वर्षों तक अलग-अलग रहने के बाद अब दोनों बरसों बाद यहां मिले। हाल ही में दोनों ने विवाह कर लिया। वृद्धाश्रम के लिए भी इस तरह का विवाह नई बात थी, लेकिन वृद्धाश्रम के अधिकारियों ने इन दोनों बुजुर्गों का साथ दिया। केरल के कृषि मंत्री वी एस सुनीलकुमार भी इस मौके पर उपस्थित थे। मेनन को कुछ दिन पहले लकवा मार गया था, लेकिन इलाज के बाद अब उनके हाथ-पांव काम करने लगे हैं। लक्ष्मी मेनन की देखभाल करना चाहती थीं। मेनन भी लक्ष्मी को पसंद करते थे, लेकिन अपने मन की बात कभी कह नहीं सके। लक्ष्मी ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि अब कितना जीवन बचा है, क्योंकि दोनों की उम्र हो गई। मगर जितना भी जीवन है, वे दोनों साथ बिताना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने और मेनन ने विवाह का फैसला किया।
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इन दोनों का विवाह और रोमांस मन में कितनी कोमल भावनाएं जगाता है! साथ में यह भी दर्शाता है कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती। आम तौर पर मान लिया जाता है कि चालीस की उम्र के बाद मनुष्य की सारी कोमल भावनाएं खत्म हो जाती हैं। वह सिर्फ जिम्मेदारियां निभाने वाला मशीन बनकर रह जाता है। मगर ऐसा है नहीं। मनुष्य की कोमल भावनाएं कभी खत्म नहीं होतीं। उन्हें उम्र की तुला पर तोला नहीं जा सकता, न तोला जाना चाहिए। जिन बुजुर्गों के साथी नहीं रहते, वे तरह-तरह के रोगों और अवसाद का शिकार बन जाते हैं। एक अनुमान के अनुसार, अपने देश में बुजुर्गों की संख्या दस करोड़ के आसपास है। लेकिन सरकारी संस्थाओं से लेकर स्वयं सहायता समूहों, सरकारी योजनाओं में इनकी जगह या तो बेहद मामूली है, या है ही नहीं। जबकि ये भी मतदाता हैं। बहुत से लोग कहते हैं कि बुजुर्ग जब तक काम करना चाहें, उन्हें करने देना चाहिए। दशकों से चली आ रही रिटायरमेंट की उम्र सीमा में बदलाव करना चाहिए, क्योंकि अब मनुष्य की औसत आयु बढ़ गई है। उसका स्वास्थ्य भी पहले के मुकाबले अच्छा रहता है।
जिन बुजुर्गों के साथी नहीं रहते, यदि वे अपना अकेलापन दूर करने के लिए किसी और साथी की तलाश करें, तो इसमें गलत भी क्या है! ऐसे लोगों को समाज हंसी का पात्र क्यों बनाता है? बहुत बार बच्चे भी आड़े आ जाते हैं। अहमदाबाद में अकेले बुजुर्गों के लिए साथी ढूंढ़ने का काम एक संगठन वर्षों से कर रहा है। इसका नाम है –बिना मूल्य अमूल्य सेवा। यह संगठन अहमदाबाद के अलावा देश के बहुत से शहरों में सम्मेलन करता है और बुजुर्ग स्त्री-पुरुषों को मिलवाता है। संगठन का जोर दो बुजुर्गों के अकेलेपन को दूर करने पर होता है। ये बुजुर्ग शादी कर सकते हैं। चाहें तो लिव इन में भी रह सकते हैं। इसमें बहुत से बच्चे भी अपने माता-पिता को लेकर आते हैं। पिछले दिनों एक दिलचस्प खबर आई थी कि एक बेटा विज्ञापन देकर अपनी मां के लिए रिश्ता ढूंढ़ रहा है। आज से कुछ दशक पहले अगर किसी बेटे से यह बात कही भर जाती, तो वह मरने-मारने पर उतारू हो जाता। वह इसे अपनी मां और अपने परिवार की बेइज्जती समझता।
समय बदल रहा है। बहुत से बुजुर्गों के पास हर तरह की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन उनकी कोई सुनने वाला नहीं है। बच्चे हैं भी, तो वे अपने कामों में व्यस्त हैं, या अलग रहते हैं, या विदेश चले गए हैं। ऐसे में इन बुजुर्गों के अकेलेपन को दूर करने के लिए अगर साथी ढूंढ़ने के प्रयास किए जाएं, तो अच्छा ही है।