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मुद्दा: मौसमी आपदाओं की आशंका के बीच सरकार और समाज, गर्मी से पहले सूखे का डर
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अमर उजाला
विस्तार
जम्मू-कश्मीर में ठंड अभी पूरी तरह से गई नहीं है। कुछ दिन की गुनगुनी धूप के बाद बारिश व बर्फबारी का दौर लौट आया है। लेकिन, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य के निवासियों को आगामी गर्मी में पेयजल संकट को लेकर आगाह किया है। अब्दुल्ला ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर कई वर्षों से जल संकट से जूझ रहा है। सरकार अपने स्तर पर जल प्रबंधन और जल संरक्षण के प्रयास कर रही है, लेकिन लोगों को पानी खर्च करने का तरीका बदलना होगा।मौसमजनित चिंता सिर्फ जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं है। ऐसी चुनौतियां पूरे देश में हैं और अलग-अलग रूपों में सामने आ रही हैं। कहीं बाढ़, तो कहीं सूखा। कहीं पेयजल संकट के रूप में, तो कहीं खाद्यान्न की चुनौती के रूप में। जलवायु परिवर्तन का असर अब देश की खेती-बाड़ी एवं आम लोगों की जिंदगी पर साफ-साफ देखा जा सकता है। बेमौसम बारिश, बाढ़, सूखा और ओलावृष्टि की आवृत्ति बढ़ गई है, जिससे फसलों, पशुधन और जान-माल का भारी नुकसान होता है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की जिला स्तरीय जोखिम मूल्यांकन रिपोर्ट बताती है कि देश के 51 जिले अत्यंत उच्च बाढ़ जोखिम और 118 जिले उच्च बाढ़ जोखिम की श्रेणी में आते हैं। अत्यंत उच्च या उच्च बाढ़ जोखिम श्रेणी वाले लगभग 85 प्रतिशत जिले असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, ओडिशा और जम्मू-कश्मीर में हैं। इसी तरह सूखे से प्रभावित क्षेत्रों की बात करें, तो देश के 91 जिले अत्यंत उच्च सूखा जोखिम व 188 जिले उच्च सूखा जोखिम की श्रेणी में आते हैं। अत्यंत उच्च या उच्च सूखा जोखिम वाले जिलों में 85 प्रतिशत से अधिक जिले बिहार, असम, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, केरल, उत्तराखंड और हरियाणा में हैं।
बाढ़ और सूखे के सबसे ज्यादा जोखिम वाले शीर्ष 50-50 जिलों की बात करें, तो इनमें 11 जिले बाढ़ और सूखे के बहुत ज्यादा जोखिम में हैं। इस दोहरे जोखिम का सामना करने वाले जिलों में बिहार में पटना, केरल में अलपुझा, असम में चराईदेव, डिब्रूगढ़, सिबसागर, दक्षिण सलमारा-मनकाचर और गोलाघाट, ओडिशा में केंद्रपाड़ा और पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद, नदिया और उत्तर दिनाजपुर शामिल हैं।
मौसम के दुष्प्रभाव का संकेत करती एक अन्य रिपोर्ट गौर करने लायक है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के जलवायु अनुकूल कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (निक्रा-एनआईसीआरए) प्रोजेक्ट का एक अध्ययन सामने आ चुका है। इसमें देश के कृषि प्रधान 651 जिलों में जलवायु परिवर्तन से कृषि पर पड़ने वाले जोखिम और संवेदनशीलता का अध्ययन किया गया था। इस रिपोर्ट में 109 जिले अत्यधिक उच्च जोखिम और 201 जिले अत्यधिक संवेदनशील जिलों के रूप में चिह्नित किए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्षा आधारित चावल की पैदावार 2050 में 20 प्रतिशत तक और वर्ष 2080 में 47 प्रतिशत तक कम हो सकती है। इसी तरह सिंचित चावल की पैदावार में 2050 तक 3.5 प्रतिशत तक और वर्ष 2080 तक पांच प्रतिशत तक कमी आने का अनुमान है। गेहूं की पैदावार वर्ष 2050 तक 19.3 प्रतिशत तक व वर्ष 2080 तक 40 प्रतिशत तक तथा मक्के की पैदावार 2050 तक 18 प्रतिशत तक व 2080 तक 23 प्रतिशत तक कम हो सकती है। गेहूं व चावल पर आज भी हमारे देश की बड़ी आबादी के खान-पान की निर्भरता है।
जल संबंधी मौसमी आपदाएं किस तरह जन-धन का नुकसान कर रही हैं, इसका अंदाजा लोकसभा में चार फरवरी को एक सवाल पर सरकार की ओर से दी गई जानकारी से पता चलता है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024-25 के दौरान (27 जनवरी तक) बाढ़ से 14.24 लाख हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई। 2,936 लोगों की जान चली गई। 61,826 पशुओं का नुकसान हुआ। 3,63,381 मकान क्षतिग्रस्त हुए। इसमें सूखे से फसलों की बर्बादी के आंकड़े शामिल नहीं हैं। मौसमी आपदाएं हर साल कई राज्यों के किसानों की बर्बादी की वजह बनती हंै। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार और समाज को एक साथ मिलकर काम करना समय की जरूरत है।