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गन्ना किसानों के अच्छे दिन, सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी मददगार
Sat, 29 Aug 2020 06:04 AM IST
वी एम सिंह
वी एम सिंह, संयोजक-राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन
वी एम सिंह, संयोजक-राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन
Published by: वी एम सिंह
Updated Sat, 29 Aug 2020 06:04 AM IST
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sugarcane
कोविड-19 दुनिया भर के लिए मुसीबत का सबब है और उत्तर प्रदेश के गन्ना उत्पादक किसान इसके अपवाद नहीं हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का 80 फीसदी अपना घरेलू खर्च चलाने के लिए दूध की बिक्री पर निर्भर है। पर कोरोना के कारण दूध की कीमत घटने और आय प्रभावित होने से छह से बारह महीने बाद मिल से भुगतान पाने वाले गन्ना किसानों का कष्ट पहले से ज्यादा बढ़ गया है। यही नहीं, किसानों पर अपने किसान क्रेडिट कार्ड के कर्ज को ब्याज और जुर्माने के साथ लौटाने का दबाव है, बच्चों के स्कूल और कॉलेज की फीस जमा करने के
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साथ उन्हें अपना घर भी चलाना है। इससे उन पर भारी बोझ पड़ रहा है और कई किसानों ने आत्महत्या कर ली है। केंद्र सरकार द्वारा आगामी वर्ष के लिए गन्ने के उचित लाभकारी मूल्य (एफआरपी) में 10 रुपये की वृद्धि से भी किसान नाखुश हैं।
लेकिन गन्ना किसानों के आनेवाले दिन बेहतर होने वाले हैं। यह सर्वज्ञात तथ्य है कि 1995-96 के गन्ना सीजन तक चीनी मिलें किसानों से गन्ना तो ले लेती थीं, पर किसानों को भुगतान करने में वर्षों लगा देती थीं। लेकिन 1997 में सर्वोच्च न्यायालय ने जब चीनी मिलों को गन्ना किसानों के 29 करोड़ रुपये ब्याज समेत चुकाने को कहा, तब चीनी मिलें ब्याज से बचने के लिए गन्ना
किसानों का भुगतान समय पर करने लगीं। गौरतलब है कि जब गन्ना आयुक्त ब्याज के मुद्दे पर लगभग दो वर्ष तक फैसला लेने में असमर्थ रहे, तब मैंने एक याचिका दायर की थी। जब उन्हें गिरफ्तार किए जाने की चेतावनी दी गई, तो उन्होंने 2019 में एक हलफनामा दायर किया कि उन्होंने यह निर्णय लिया है कि 2012-13, 2013-14 और 2014-15 के लिए लाभ कमाने वाली चीनी मिलें 12 फीसदी ब्याज का भुगतान करेंगी और नुकसान उठाने वाली मिलें किसानों को प्रति वर्ष सात फीसदी ब्याज का भुगतान करेंगी।
एक बार जब गन्ना आयुक्त ने ब्याज के भुगतान के बारे में हलफनामा दायर कर दिया, तब पैसे का भुगतान तुरंत होना चाहिए था, लेकिन राज्य और चीनी मिलों ने लंबी अवधि तक हड़ताल और बाद में महामारी के कारण अदालत न चलने का फायदा उठाया। अदालतें कुछ दिनों में काम करना शुरू कर देंगी और फिर गन्ना आयुक्त को ब्याज के भुगतान में देरी का कारण बताना होगा। एक बार जब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दे दिया कि गन्ना आयुक्त के पास ब्याज राशि को माफ करने या कम करने का अधिकार नहीं है, तो राज्य सहित मिल मालिक 14 दिनों के बाद भुगतान में एक दिन की भी देरी नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें 15 फीसदी ब्याज देना होगा, जबकि उन्हें 10 से 12 फीसदी ब्याज पर कॉरपोरेट कर्ज मिलता है। ये तथ्य बताते हैं कि किसानों को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। निश्चित रूप से ब्याज का भुगतान होगा।
गन्ना उत्पादकों को समझना होगा कि खराब समय बीत गया है और यदि 1996 से 15 फीसदी प्रति वर्ष की दर से ब्याज का भुगतान किया जाता है, तो उन्हें प्रति एकड़ एक लाख रुपये मिलेंगे और यदि 2011-12 से 2019-2020 तक भुगतान किया जाता है, तो भी उन्हें प्रति एकड़ 50,000 रुपये से कम नहीं मिलेगा। एफआरपी में दस रुपये की वृद्धि होने से भी किसानों को उदास होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के अनुसार एसएपी के हकदार हैं, जिसने मेरे मामले में उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। राज्य को एसएपी तय करने का अधिकार है, जो एक वैध मूल्य है।
यह उम्मीद है कि अक्तूबर में जो एसएपी तय किया जाएगा, वह प्रधानमंत्री के वादे के मुताबिक उत्पादन लागत के 50 फीसदी ज्यादा के फार्मूले के अनुसार 450 रुपये प्रति क्विंटल होगा। और एक बार जब 15 फीसदी प्रति वर्ष की दर से किसानों को ब्याज का भुगतान कर दिया जाएगा, तो गन्ने के मूल्य का भुगतान समय से होगा, जो नोटबंदी और महामारी के दौरान नौकरी गंवा चुकी युवा पीढ़ी के लिए एक मंच तैयार करेगा और वह अपनी आजीविका के लिए कृषि क्षेत्र में आएगी। इससे किसानों की क्रय क्षमता भी बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
लेकिन गन्ना किसानों के आनेवाले दिन बेहतर होने वाले हैं। यह सर्वज्ञात तथ्य है कि 1995-96 के गन्ना सीजन तक चीनी मिलें किसानों से गन्ना तो ले लेती थीं, पर किसानों को भुगतान करने में वर्षों लगा देती थीं। लेकिन 1997 में सर्वोच्च न्यायालय ने जब चीनी मिलों को गन्ना किसानों के 29 करोड़ रुपये ब्याज समेत चुकाने को कहा, तब चीनी मिलें ब्याज से बचने के लिए गन्ना
किसानों का भुगतान समय पर करने लगीं। गौरतलब है कि जब गन्ना आयुक्त ब्याज के मुद्दे पर लगभग दो वर्ष तक फैसला लेने में असमर्थ रहे, तब मैंने एक याचिका दायर की थी। जब उन्हें गिरफ्तार किए जाने की चेतावनी दी गई, तो उन्होंने 2019 में एक हलफनामा दायर किया कि उन्होंने यह निर्णय लिया है कि 2012-13, 2013-14 और 2014-15 के लिए लाभ कमाने वाली चीनी मिलें 12 फीसदी ब्याज का भुगतान करेंगी और नुकसान उठाने वाली मिलें किसानों को प्रति वर्ष सात फीसदी ब्याज का भुगतान करेंगी।
एक बार जब गन्ना आयुक्त ने ब्याज के भुगतान के बारे में हलफनामा दायर कर दिया, तब पैसे का भुगतान तुरंत होना चाहिए था, लेकिन राज्य और चीनी मिलों ने लंबी अवधि तक हड़ताल और बाद में महामारी के कारण अदालत न चलने का फायदा उठाया। अदालतें कुछ दिनों में काम करना शुरू कर देंगी और फिर गन्ना आयुक्त को ब्याज के भुगतान में देरी का कारण बताना होगा। एक बार जब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दे दिया कि गन्ना आयुक्त के पास ब्याज राशि को माफ करने या कम करने का अधिकार नहीं है, तो राज्य सहित मिल मालिक 14 दिनों के बाद भुगतान में एक दिन की भी देरी नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें 15 फीसदी ब्याज देना होगा, जबकि उन्हें 10 से 12 फीसदी ब्याज पर कॉरपोरेट कर्ज मिलता है। ये तथ्य बताते हैं कि किसानों को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। निश्चित रूप से ब्याज का भुगतान होगा।
गन्ना उत्पादकों को समझना होगा कि खराब समय बीत गया है और यदि 1996 से 15 फीसदी प्रति वर्ष की दर से ब्याज का भुगतान किया जाता है, तो उन्हें प्रति एकड़ एक लाख रुपये मिलेंगे और यदि 2011-12 से 2019-2020 तक भुगतान किया जाता है, तो भी उन्हें प्रति एकड़ 50,000 रुपये से कम नहीं मिलेगा। एफआरपी में दस रुपये की वृद्धि होने से भी किसानों को उदास होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के अनुसार एसएपी के हकदार हैं, जिसने मेरे मामले में उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। राज्य को एसएपी तय करने का अधिकार है, जो एक वैध मूल्य है।
यह उम्मीद है कि अक्तूबर में जो एसएपी तय किया जाएगा, वह प्रधानमंत्री के वादे के मुताबिक उत्पादन लागत के 50 फीसदी ज्यादा के फार्मूले के अनुसार 450 रुपये प्रति क्विंटल होगा। और एक बार जब 15 फीसदी प्रति वर्ष की दर से किसानों को ब्याज का भुगतान कर दिया जाएगा, तो गन्ने के मूल्य का भुगतान समय से होगा, जो नोटबंदी और महामारी के दौरान नौकरी गंवा चुकी युवा पीढ़ी के लिए एक मंच तैयार करेगा और वह अपनी आजीविका के लिए कृषि क्षेत्र में आएगी। इससे किसानों की क्रय क्षमता भी बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।