सूफी का तालिबानी बन जाना: मजारों, मस्जिदों में आत्मघाती हमलों का लंबा इतिहास है
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लाहौर में सूफी संत सैयद अली बिन उस्मान की दरगाह पर हुआ हमला पाकिस्तान में चल रहे वहाबी तालिबानी वर्चस्व की जंग की ही एक कड़ी है। वहां सूफी शिया मजारों, मस्जिदों में आत्मघाती हमलों का लंबा इतिहास है। हमले और भी होंगे, क्योंकि पकिस्तान को पूरी तरह कट्टर इस्लामी मुल्क बनाने का लक्ष्य अभी बाकी है। कट्टर वहाबी-सलाफी इस्लाम में पीरों, दरगाहों की जगह नहीं है।
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लाहौर में सूफी संत सैयद अली बिन उस्मान की दरगाह पर हुआ हमला पाकिस्तान में चल रहे वहाबी तालिबानी वर्चस्व की जंग की ही एक कड़ी है। वहां सूफी शिया मजारों, मस्जिदों में आत्मघाती हमलों का लंबा इतिहास है। हमले और भी होंगे, क्योंकि पकिस्तान को पूरी तरह कट्टर इस्लामी मुल्क बनाने का लक्ष्य अभी बाकी है। कट्टर वहाबी-सलाफी इस्लाम में पीरों, दरगाहों की जगह नहीं है।
इस्लाम के आंतरिक वैचारिक संघर्ष में दरगाहों, मजारों पर मत्था टेकना, जियारत करना इस्लाम से बाहर है और कुफ्र की शक्ल लिए हुए है। कल वह समय आएगा, जब तालिबानी सोच सूफियों को भी अहमदियों की तरह इस्लाम से खारिज कर देगी। वहाबी तालिबानी विचारधारा के प्रर्वतकों का उद्देश्य इन्हें इस्लाम से खारिज करना नहीं है। बल्कि वे चाहते है कि ये लोग पुनः अपना पंथ बदलते हुए पीरों, फकीरों को छोड़ उनके कट्टर अनुयायी बनने की राह पर चले आएं।
सूफी पंथ, जिसे भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सांस्कृतिक इस्लाम के नाम से भी जाना जाता है, तलवार के बाद इस्लामी धर्म परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक बना। सूफी इस्लाम का एक प्राचीन रहस्यवादी पंथ है, जिसने भारत में इस्लामी विचारों के साथ स्थानीय परंपराओं को समन्वित करते हुए धार्मिक विस्तार का कार्य किया है। बौद्ध-हिंदू परंपराओं के भिक्षुओं-साधुओं से मुकाबला करने के लिए संतों के स्थान पर पीरों, मठों के स्थान पर खानकाहों और मंदिरों के स्थान पर मजारों के विकल्प दिए। मंदिरों की परंपराओं, भजन, पूजा-पद्धतियों के स्थान पर मजारों को अपनी श्रद्धा के स्थल के रूप में ढाला। इस प्रकार इस्लाम में धर्म परिवर्तन का काम आसान हुआ।
उदाहरण के लिए, कश्मीर में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया सूफी संत बुलबुल शाह के कश्मीरी शासक रिंचेन को इस्लाम में दीक्षित करने के साथ प्रारंभ होती है। सूफी पंथ भारत के अन्य बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में इस्लाम के विस्तार का माध्यम बना। शासक वर्ग तो तलवार के दम पर धर्मांतरित हो रहा था। इस तरह पंजाब और बंगाल के गांवों तथा दक्षिण भारत के तटीय प्रदेशों में इस्लाम का क्षेत्र विस्तार होता गया। उस समय इस्लामी शासकों का जोर विस्तार पर था, वैचारिक शुद्धता पर नहीं। 20वीं सदी में आकर सऊदी अरब और ईरान के तेल के धन ने इस वैचारिक शुद्धता के अभियान को हवा दी। अब फोकस उस जेहाद पर है, जिसे दुनिया इस्लामी आतंकवाद के रूप में जानती है।
कश्मीर में इस्लाम का विस्तार सुल्तानों की तलवार और सूफियों के धर्म प्रचार द्वारा किया गया था। पिछले कश्मीर भ्रमण में एक कश्मीरी बुद्धजीवी ने स्वीकार किया कि सूफी परंपरा के कश्मीर को अब पुनः पंथ परिवर्तन की स्थितियों से गुजरना पड़ रहा है। लाल देद और शेख नरूद्दीन को, जिनकी शिक्षाओं से कश्मीरियत का ताना-बाना बना था, आज कोई पूछने वाला नहीं हैं। मजारों, खानकाहों, पीरों-फकीरों का सूफी संप्रदाय आज रक्षात्मक स्थिति में आ गया है।
मजहब की वैचारिक शुद्धता का यह अभियान, मानने वालों को उनकी जमीन से काटकर वैश्विक वर्चस्व और कट्टरवाद की सोच से जोड़ता है। भारतीय मूल के नोबल पुरस्कार प्राप्त प्रसिद्ध लेखक वीएस नायपॉल ने अपनी पुस्तक बियांड बिलीफ : एमंग कन्वर्टेड पीपल में कहा है, 'धर्म परिवर्तित व्यक्ति की विश्वदृष्टि बदल जाती है। उनका इतिहास बदल जाता है, वह अपने इतिहास को खुद खारिज कर देता है, उसे वह सब छोड़ना पड़ता है, जो पहले उसका अपना रहा था।' लेकिन भारत में धर्म परिवर्तन के बहुत बाद तक भी भारतीय मुस्लिम समाज अपनी मूल संस्कृति से जुड़ा रहा।
इस देश के नागरिकों को इस्लामी जगत में हो रहे इस वैचारिक परिवर्तन को समझना जरूरी है, जो आतंकवाद में परिणत हो रहा है। विचारों का यह टकराव भारतीय उपमहाद्वीप में विशेष रूप से होगा। गैर-मुस्लिम देशों में भारत में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी का निवास है। यहां का सांस्कृतिक इस्लाम कट्टरवादी वैश्विक इस्लाम की राह में सबसे बड़ी बाधा भी है। हम अपने देश में समानता, सांस्कृतिक तथा सामाजिक समरसता का लक्ष्य लेकर चले हैं।
एक इस्लाम है पीरों-फकीरों का और दूसरा है जाकिर नाइक जैसे जेहादियों का। सदियों पहले आक्रांता हाथ में तलवारें लेकर आए थे, आज कहीं कोई तलवार नहीं है। हमारे अल्पसंख्यक समाज को अब अपने विवेक से निर्णय लेना है। यह निर्णय भारतीय मुसलमानों को ही नहीं, भारत की सांस्कृतिक समरसता के पक्षधर समस्त नागरिकों को भी लेना है। किसी सूफी का तालिबानी बन जाना इस्लाम का आंतरिक मामला नहीं रहा।
भारतीय समाज को इस्लामी जगत में हो रही इस उठापटक से तटस्थ नहीं रहना है, क्योंकि इससे देश के भविष्य का मार्ग प्रभावित होता है। हमें तो उस विचाराधारा का साथ देना है, जो सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से भारतीय राष्ट्रीय सोच के साथ खड़ी होती हो।