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ईमानदार बनने से मानव जीवन सफल
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 30 Nov 2012 09:52 PM IST
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धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जो व्यक्ति अपना कर्म ईमानदारी से करता है, उससे मिलने के लिए प्रभु स्वयं तत्पर हो उठते हैं। महात्मा रामलाल इसी तरह के संत रहे हैं। उनके सत्संग के कारण एक धनिक व्यक्ति ने व्यापार में ईमानदारी बरतने का संकल्प लिया। एक ईमानदार व्यापारी के रूप में उसकी ख्याति फैलती गई। कुछ ही वर्षों में उसने अपने उद्यम एवं ईमानदारी के बल पर करोड़ों रुपयों का लाभ अर्जित किया।
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एक दिन उद्योगपति महात्मा रामलाल जी के पास पहुंचा और उनके समक्ष एक लाख रुपये प्रस्तुत कर बोला, महाराज, आपके सत्संग की प्रेरणा के कारण ही मैंने व्यापार में सफलता पाई है। मैं यह छोटी-सी धनराशि आपके चरणों में कृतज्ञता ज्ञापन के रूप में अर्पित करने आया हूं।
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संत जी बोले, भइया, तुम्हारे मेरे संबंध सांसारिक नहीं, पारमार्थिक थे। मैंने तुम्हें व्यापार में ईमानदारी बरतने की प्रेरणा इस लोक में धन कमाने के उद्देश्य से नहीं दी थी। मैंने ईमानदारी बरतकर मानव जीवन सफल करने तथा परलोक में अच्छा स्थान प्राप्त करने की दृष्टि से तुम्हें उपदेश दिया था।
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मैं तुम्हारा धन लेकर क्या करूंगा! इसे वापस ले जाओ। किसी अनाथ या बीमार की सेवा-सहायता में इस धन का उपयोग करना। धनिक सज्जन संत जी की बात सुनकर आह्लादित हो उठा और उनकी विरक्ति को प्रणाम करने लगा।