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स्मृति: सच्चे राष्ट्र निर्माता, गांधी और नेहरू से प्रेरित थे सुब्रमणियम चेन्ना केशु और श्री गोपाल त्रिवेदी

Sun, 18 Jun 2023 07:09 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 18 Jun 2023 07:09 AM IST
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सार
सुब्रमणियम चेन्ना केशु और श्री गोपाल त्रिवेदी उन हजारों विशिष्ट भारतीयों में से थे, जिन्होंने आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाई थी। स्वतंत्रता संग्राम और खासकर गांधी व नेहरू से प्रेरित इन दो लोगों ने अपने ज्ञान और विशेषज्ञता का इस्तेमाल देश की सेवा में किया।
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Subramanyan Chenna keshu and sri Gopal Trivedi was True nation builders inspired by Gandhi-Nehru
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

विस्तार

मेरी जान-पहचान के दो बुजुर्गों की पिछले महीने मृत्यु हो गई, एक की मुंबई में और दूसरे की बंगलूरू में। दोनों नब्बे से अधिक उम्र के थे। इनमें से एक उदयपुर रियासत में पले-बढ़े थे, तो दूसरे की परवरिश मद्रास प्रेसीडेंसी के शहरों में हुई थी। दोनों ब्रिटिश राज के आखिरी वर्षों में जवान हुए थे और दोनों ने पहले ब्रिटिश भारत में, फिर ब्रिटेन में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। पश्चिम के देशों में ये दोनों अपने लिए सुखद और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन चुन सकते थे। पर ये 1947 के तुरंत बाद आजाद भारत में काम करने के लिए लौट आए। भारत लौटने के बाद इनमें से कोई यहां काम कर रहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों से नहीं जुड़ा, न ही उन्होंने टाटा या किर्लोस्कर जैसे निजी भारतीय कंपनियों में काम करने की रुचि दिखाई। इसके बजाय दोनों ने कम आकर्षक (लेकिन जो शायद उनके लिए ज्यादा सम्मानजनक था) सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़ने को वरीयता दी।



हाल ही में गुजरे ये दो लोग एक दूसरे के अस्तित्व से सर्वथा अपरिचित थे। मेरा सौभाग्य है कि मैं इन दोनों को जानता था। एक को बेहद अच्छी तरह, क्योंकि वह मेरे पिता के छोटे भाई थे, जबकि दूसरे से मेरा सिर्फ परिचय था, क्योंकि वह मेरे एक दोस्त के पिता थे। दोनों ने एक जैसा जीवन तो जिया ही, इनका पेशा भी एक तरह का था। इस खासियत ने ही देश के निर्माण में मदद करने वाले इन दो विस्मृत भारतीयों पर लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया।


इनका जन्म समृद्ध परिवारों में नहीं हुआ था, पर सांस्कृतिक दृष्टि से दोनों को समृद्ध विरासत मिली थी। दोनों ऊंची जातियों से थे और शुरुआत से ही ताकत व प्रतिष्ठा दिलाने वाली अंग्रेजी भाषा तक इनकी पहुंच थी। इस विशेषाधिकार से उन्हें वे लाभ मिले, जो उनकी पीढ़ी के कामगारों और महिलाओं को नहीं मिल पाए होंगे, जैसे-अच्छे स्कूल, गुणवत्तापूर्ण तकनीकी शिक्षा और रोजगार की व्यापक संभावनाएं। हालांकि यह भी आश्चर्यजनक रूप से सच है कि इन सहूलियतों का इस्तेमाल उन्होंने भौतिक लाभ हासिल करने के लिए नहीं किया। स्वतंत्रता संग्राम और खासकर गांधी व नेहरू जैसे इसके नेताओं से प्रेरित इन दो लोगों ने अपने ज्ञान और विशेषज्ञता का इस्तेमाल देश की सेवा करने में किया।

उदयपुर में रहने वाले मेरे दोस्त के पिता ने, जो इंजीनियर थे, अपनी पेशेवर सेवाएं भारतीय रेल को दीं। उन्होंने भारतीय रेल की बेहतरी की दिशा में कई कदम उठाए, जिनमें मुंबई-वड़ोदरा ट्रेन रूट को स्टीम इंजन से बिजली चालित रूट में रूपांतरित करने में योगदान सर्वाधिक उल्लेखनीय था। मैं अपने चाचा के काफी करीब था, और इस देश में रहकर काम करने के मेरे फैसले में उनकी प्रेरणा का भी योगदान था।

उन्होंने अपने पेशेवर जीवन का शुरुआती हिस्सा भारतीय वायुसेना में और शेष हिस्सा एचएएल (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) में बिताया। वहां से रिटायर होने के बाद उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में पढ़ाया और एयरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया को आगे बढ़ाने में मदद की। उनकी तकनीकी योग्यता के बारे में मेरी समझ हालांकि कम थी, पर जाति गौरव और धार्मिक कट्टरवाद के उनके विरोध से मैं बेहद प्रभावित हुआ। यह गुण संभवत: उनमें अपने चाचा आर गोपालस्वामी अय्यर से आया, जो मैसूर रियासत में दलितों की बेहतरी के लिए किए कामों के कारण प्रसिद्ध थे।

अपने देश के सांस्कृतिक वैविध्य के बारे में इस इंजीनियर की समझ व्यापक थी। मंगलोर में पले-बढ़े इस व्यक्ति ने अपनी पहली डिग्री बनारस में हासिल की थी और पेशेवर जीवन के अंत में उन पर ओडिशा के आदिवासी बहुल क्षेत्र में एचएएल की फैक्टरी के परिचालन की देखभाल की जिम्मेदारी थी। एमए के छात्र के तौर पर मैंने अपने फील्ड वर्क के लिए वहां कुछ वक्त बिताया था और उस उम्र में काम करने का उनका जोश देखकर दंग था।

अब जरूरी यह है कि मैं उन दोनों के नाम बताऊं। कर्नाटक के उस इंजीनियर का नाम सुब्रमणियम चेन्ना केशु और राजस्थान के इंजीनियर का नाम श्री गोपाल त्रिवेदी था। मैंने इन दोनों के बारे में लिखा, क्योंकि मुझे लगा कि इनका जीवन और काम उन लोगों के लिए भी जरूरी है, जो व्यक्तिगत रूप से इन्हें नहीं जानते थे। दोनों सच्चे अर्थों में राष्ट्र-निर्माता थे, भले हमारे देश के मौजूदा प्रतिनिधि इन्हें राष्ट्र निर्माता के रूप में देखने को प्रोत्साहित न करे।

हाल के अपने एकाधिक भाषणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि इस देश ने पिछले आठ-नौ साल में ही तरक्की की है। यह आश्चर्यजनक है कि मोदी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए की पिछली सरकार के रचनात्मक कामकाज को भी स्वीकार नहीं करते। अपने प्रधानमंत्री काल में राष्ट्र की 'उन्नति' के बारे में मोदी के दावों का उनके कैबिनेट मंत्रियों और सोशल मीडिया सेल द्वारा जोरदार तरीके से प्रचार-प्रसार किया जाता है। इन्हें पढ़ते-सुनते हुए ऐसा लगता है, जैसे मई, 2014 से पहले यह देश आर्थिक और तकनीकी पिछड़ेपन में डूबा हुआ था।

जबकि इससे अलग एक दूसरा विमर्श भी है, जिसके मुताबिक,  देश की प्रगति की शुरुआत इससे पहले हुई। मुक्त बाजार के समर्थकों का कहना है कि भारत की वास्तविक प्रगति ने वर्ष 1991 में आकार लिया, जब देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई। नरेंद्र मोदी के दावों के विपरीत यह विमर्श ज्यादा दमदार है, हालांकि इसमें भी उन भारतीयों की अनदेखी कर दी गई है, जिन्होंने 1947 से 1991-यानी 44 वर्षों तक देश की बेहतरी के लिए अनथक काम किया।

वर्ष 1947 में भारत हताशाजनक रूप से गरीब, गहरे तौर पर विभाजित और व्यापक रूप से अशिक्षित था। इसी कारण आशंका जताई जा रही थी कि यह देश अपनी कमजोरियों और विरोधाभासों के दबावों से टूट जाएगा या गृहयुद्ध, अकाल  या फिर सैन्य तानाशाही के कारण टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। ये आशंकाएं सच नहीं हुईं। भारत एकजुट रहा, इसने लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाई, खाद्य क्षेत्र में यह आत्मनिर्भर बना और इसने मजबूत औद्योगिक और तकनीकी आधार बनाया। अगर 1947 से 1991 तक एकीकृत करने वाले ये सांस्थानिक और तकनीकी आधार निर्मित नहीं किए जाते, तो न आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) क्रांति होती, न स्टार्ट अप संस्कृति विकसित हो पाती, न कोई अखिल भारतीय श्रम या पूंजी बाजार संभव था।

यहीं पर सुब्रमणियम चेन्ना केशु और श्री गोपाल त्रिवेदी जैसे लोगों का महत्व समझा जा सकता है। वे उन हजारों विशिष्ट भारतीयों में से थे, जिन्होंने प्रशासनिक सेवा, सशस्त्र बल, रेलवे, रक्षा क्षेत्र में काम कर या फिर खेतों, फैक्टरियों, स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों या प्रयोगशालाओं में मजदूरी कर यह सुनिश्चित किया कि आने वाली पीढ़ियों के लिए वे ऐसा भारत छोड़ जाएंगे, जिसे वे आगे और निर्मित करें या फिर ध्वस्त करें।

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