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चीन को घेरने की रणनीति
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से गले मिलते भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। दूसरी तस्वीर में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग।
- फोटो : Amar Ujala
अपने कम्युनिस्ट अवतार में बीजिंग ने अपने कन्फ्यूशियस आधार को तिलांजलि दे दी है और विस्तारवादी लोकाचार में यथार्थवादी सिद्धांतों को लागू किया है। यथार्थवादी स्कूल के अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक जॉन मियर्सहाइमर की थ्योरी ऑफ ऑफेंसिव रियलिज्म ऐंड द राइज ऑफ चाइना इस घटना को स्पष्ट करती है। ट्रेजिडी ऑफ ग्रेट पावर पॉलिटिक्स (2001) में मियर्सहाइमर ने चीन के उदय के संबंध में अपने सिद्धांतों के निहितार्थ के बारे में विस्तार से लिखा है।
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2010 में उन्होंने तर्क दिया था कि चीन के वर्तमान या भविष्य के इरादों का सटीक अनुमान लगाने का कोई तरीका नहीं है, चीन की रक्षात्मक और आक्रामक सैन्य क्षमताओं के बीच अंतर करना मुश्किल है और चीन के अतीत का शांतिपूर्ण व्यवहार भविष्य के व्यवहार का एक अविश्वसनीय संकेतक है। उनके अनुसार चीन ने अकेले दूसरे देशों के ऊपर अपनी राष्ट्रीय शक्ति को तवज्जो दी।
इतिहास हमें बताता है कि चीन का यह रवैया अपने आप में हमें अतीत के हान शासन की याद दिलाता है, जिसने कोरिया, मंगोलिया, वियतनाम और जापान जैसे कई पड़ोसी देशों को प्रभावित करते हुए अपनी भूमि और संस्कृति का उद्देश्यपूर्ण विस्तार किया। सैन्य अभियानों और मुहिमों की शृंखला के जरिये इसने अब आधुनिक चीन और उत्तरी वियतनाम का निर्माण किया है।
सैन्य अभियानों और चीनी प्रवासियों ने एक ऐसी संस्कृति बनाई, जो चीनी परंपराओं को स्वदेशी तत्वों के साथ मिलाती है। तिब्बत पर कब्जे के रूप में हमने वैसा ही देखा है। उत्तरी चीन से दक्षिण तक चीन का विस्तार हान शासन के दौरान अपने चरम पर पहुंच गया था। लेकिन चीनी नेताओं के इस आक्रामक और विस्तारवादी रवैये के बावजूद, उसमें शामिल कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों के चलते वैश्विक समुदाय ने चीन को गले लगाया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसकी उपस्थिति का स्वागत किया।
हमने भी बाकी दुनिया की तरह व्यवहार किया और वास्तव में भारत की सभी सरकारों ने इसे अलग-अलग तरीके से बढ़ावा दिया। यह एक ऐसा दर्शन था, जिसे हम भारत के लोग स्वीकार नहीं करना चाहते थे। पर अब भी चीन को उदारवादी नजरिये से देखा जा रहा है। दक्षिण चीन सागर में और हमारी सीमाओं पर उसकी गतिविधियां हमें उसकी कुटिलता से लड़ने के तैयार नहीं कर पाईं, क्योंकि हमने कूटनीति में अंतिम उपकरण के रूप में 'खुशमिजाजी' को देखा।
और हम उसके जाल में फंस गए। वे हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं और हम उसके दबाव के आगे झुक रहे हैं। उसने भारत के व्यापार और प्रौद्योगिकी में इस तरह से घुसपैठ कर ली है कि उसके जाल से बाहर निकलना लगभग असंभव है। पिछले कई दशकों से वह देश के विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े एनजीओ में लगातार निवेश करता आ रहा है।
हाल के दिनों में ऐसी रिपोर्टें आई हैं कि पार्टी प्रतिनिधि मंडलों ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों से मुलाकात की है, ताकि कैडर निर्माण की बारीकियों को समझा जा सके। इसके बारे में यह स्पष्टीकरण दिया गया कि उनकी अच्छी तरह से पड़ताल करके मंजूरी दी गई और यहां तक कि विभिन्न सरकारों द्वारा उसका समर्थन किया गया।
यह बताता है कि रणनीतिक दृष्टि और सुरक्षा उपायों की कैसी अनदेखी की गई। चीनी हमारे साथ माइंड गेम खेल रहे थे, और हमने खुद ही अपने महत्वपूर्ण हितों को समझना छोड़ दिया। हमें हर मोर्चे पर यथार्थवादी खेल खेलना होगा। सबसे पहले हमें उन्हें अपनी सीमा में घुसने से रोकने की तत्काल आवश्यकता है, क्योंकि वे दौलत बेग ओल्डी सेक्टर, गलवां घाटी, पैंगोंग झील और अन्य जगहों पर अपनी गतिविधियों को बढ़ाते हैं।
और हम ऐसा कर भी रहे हैं। विदेश मंत्रालय द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थिति को बदलने के किसी भी प्रयास के खिलाफ चेतावनी जारी की गई है। हमें उनकी गतिविधियों की पुष्टि की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि चीन के खेल को समझना कठिन है और उसने हमारे विश्वास को धोखा दिया है। अब हमें उस पर कार्रवाई करनी चाहिए।
सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय नौसेना को मलाबार अभ्यास की तर्ज पर नौसैनिक अभ्यास शुरू करना चाहिए। मलाबार अभ्यास हमने अमेरिका के साथ किया था, जिसमें जापान ने भी हिस्सा लिया था। इसे आयोजित करने का सबसे बेहतर स्थल समुद्री मार्ग (सी लेन्स) होगा, जहां से चीनी मर्केंटाइल सामग्री दक्षिण अमेरिका के पेरु से मलक्का जलडमरूमध्य होते हुए चीन की जरूरत का 58 फीसदी तांबा चीनी बंदरगाहों पर ले जाया जाता है।
यह कार्रवाई अंततः वायरस के प्रभाव के बाद पहले से प्रभावित चीनी उत्पादन क्षमता को बाधित करेगी। इसी तरह के लक्ष्य वाले अभ्यास ईंधन और हाइड्रोकार्बन ले जाने वाले समुद्री मार्गों पर भी किया जा सकता है, जिसकी चीनी उद्योगों को भारी जरूरत है। क्वाड्रिलेटरल रिजीम ग्रुप (क्वाड) को भी तत्काल सक्रिय करने की आवश्यकता है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के साथ भारत भी शामिल है।
इसका उद्देश्य दक्षिण चीन सागर में नाइन डैश लाइन के भीतर मलाबार अभ्यास की तर्ज पर नौसैनिक अभ्यास का संचालन करना होना चाहिए, ताकि चीनी नौसेना से समुद्री मार्ग संचार की रक्षा की जा सके, जो वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया को भी डराने की कोशिश कर रहा है। सिंगापुर सहित दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र के सभी बंदरगाहों को मजबूत राजनयिक पहल के जरिये मनाने की कोशिश की जानी चाहिए कि वे चीनी जहाजों को अपने बंदरगाह में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दें।
यह आसियान देशों में अपने दोस्तों की खोज का वक्त है, जो हमारी भूमिका और दोस्ती को महत्व देते हैं। भारत को व्यापार, उद्योग, संस्कृति और यहां तक कि लोगों से सभी चीनी संपर्कों को तोड़ने के लिए एक त्वरित कार्यप्रणाली तैयार करना, निष्कर्ष निकालना और निर्णायक फैसले लेना होगा। अगर कोई यह सोचता है कि ऐसा करना आसान नहीं होगा, तो उसे समझना चाहिए कि यह एक ऐसी कीमत है, जो राष्ट्र को अपनी संप्रभुता और स्वतंत्रता के लिए चुकानी होगी। (लेखक रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।)