फणीश्वर नाथ रेणु : एक विरल वनस्पति
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फणीश्वरनाथ रेणु की जीवनी लिखने में लगा हुआ हूं और उनके जीवन के कई अनछुए पहलुओं तथा प्रसंगों को याद करता रहता हूं। वह बहुत कम उम्र से ही नाटक, अभिनय, गायन, वादन से जुड़े हुए थे। कहीं भी ऐसा अवसर आए, तो उसका उपयोग करने में नहीं चूकते थे। लेकिन जगह-जगह जहां भी सीख मिलती थी, उसे अपने मन की गांठ में बांध लेते थे। उनका मन कक्षा के बंधे-बंधाए पाठ में नहीं रमता था। वह जीवन के विभिन्न अवसरों को अपने अनुभव में बदलते रहते थे। मैला आंचल का मेरीगंज भारत के एक पिछड़े गांव का प्रतीक है। बावजूद इसके वह भरा-पूरा, सतत आंदोलित, जीते-जागते विचित्र स्वभाव और स्वरूप के लोगों से निर्मित गांव है। गांव के पिछड़ेपन का कारण गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा है। कथा के परंपरागत ढांचे को कायम रखते हुए फणीश्वरनाथ रेणु ने नाटकीयता के साथ कथा के पूरे वृत्त का निर्माण किया है। मैला आंचल का प्रारंभिक वाक्य है, 'गांव में यह खबर तुरत बिजली की तरह फैल गई-मलेटरी ने बहरा चेथरू को गिरफ्फ कर लिया है और लोबिनलाल के कुएं से बाल्टी खोलकर ले गए हैं।' यह वाक्य लिखकर रेणु अपनी कथाभूमि में पाठकों का प्रवेश करवाते हैं। आगे वह मेरीगंज गांव का परिचय परंपरागत आख्यान कहने की शैली में करते हैं। लेकिन गौर से देखें, तो यह नाटक में सूत्रधार द्वारा कहे गए संक्षिप्त कथन की तरह लगेगा। इसके बाद कथा का दृश्य रूप प्रकट होता जाता है। कथा का प्रारंभ एक खबर के फैलने से होता है, फिर तहसीलदार के इस कथन से इस खबर का खंडन होता है, 'लोबिन बाल्टी कहां से लाया था? जरूर चोरी की बाल्टी होगी! साले सभी चोरी करेंगे और गांव को बदनाम करेंगे।'
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अब एक खबर और बन गई-चोरी की बाल्टी होगी। तहसीलदार का घर ही अपने-आप में मालिक टोला है। वहां से खबर जब राजपूत टोले में पहुंची, तो इस तरह पहुंची कि कायस्थ टोली के विश्वनाथ प्रसाद और ततमाटोली के बिरंची को मलेटरी के सिपाही पकड़कर ले गए हैं। ऐसी खबर सुनकर ठाकुर रामकिरपाल सिंह को खुशी हुई, 'इस बार तहसीलदारी का मजा निकलेगा। जरूर जमींदार का लगान वसूल कर खा गया है। अब बड़े घर की हवा खाएंगे बच्चे!' यादव टोली में जब खबर पहुंची, बलिया गिरफ्फ नहीं, गिरफ्तार कर लिया गया और यादव टोली के लोग बालदेव को रस्सी से बांधकर मलेटरी वालों को भेंट चढ़ाने पहुंचे। तरह-तरह की खबरों की अनुगूंज अलग-अलग लोगों के पास जाकर अपना स्वरूप बदल रही है। एक बेचैनी भरा वातावरण है। वर्ष 1942 के आंदोलन की दहशत भरी खबरों की छाया सबके दिमाग पर हावी है। लेकिन मलेटरी वालों की जगह डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के लोग मिलते हैं, तो तनाव का वातावरण सरस माहौल में बदल जाता है। खबर के चक्कर से निकल कर सच का सामना एक सहज हास्य में बदल जाता है। इस क्रम में तरह-तरह के भावों की अभिव्यक्ति और नाटकीयता का रमणीय रूप मैला आंचल को विलक्षण बना देता है।
रेणु कथा की नैरेटिव या आख्यानक पद्धति के साथ नाटकीयता का समन्वय कर कथा की एक अलग प्रणाली विकसित करते हैं। इस सृष्टि में कितने तरह के जीव-जंतु हैं और वनस्पतियों की संख्या कितनी है! अब तक इन्हें खोजने की प्रक्रिया जारी है! रेणु भी विरल वनस्पतियों की खोज में लगे रहते थे। जब कोशी नदी पर डैम बनाया जा रहा था और वृहद स्तर पर नहरों का निर्माण किया जा रहा था, तब कोशी प्रोजेक्ट की एक कॉलोनी ही फारबिसगंज के पास बस गई थी। उसमें एक बंगाली डॉक्टर रायचौधुरी काम करते थे। वह विरल वनस्पतियों की खोज में लगे रहते थे। विश्व के दुर्लभ पेड़-पौधों की उन्हें अद्भुत जानकारी थी। रेणु जी से उनकी पाइरिथ्रम नामक पौधे पर अक्सर बातें हुआ करती थी। पाइरिथ्रम वह दुर्लभ वनस्पति है, जिसकी गंध से मच्छर, कीट-पतंगे दूर भागते हैं। कीटनाशक गुण के कारण ही इसे पाइरिथ्रम कहते हैं।
रेणु जी के पिता जी और दोनों छोटे भाई मलेरिया से काल-कवलित हो चुके थे। इसलिए उन्होंने इस खोज के बाद विदेश से बहुत मुश्किल से यह पौधा मंगवा कर अपने घर में लगवाया था। उसके बाद उनके घर में मलेरिया से किसी की मृत्यु नहीं हुई। विरल वनस्पतियों की खोज में लगे रहने वाले डॉक्टर रायचौधुरी को उन्होंने सुझाव दिया कि यदि इस पौधे को वराह क्षेत्र में बहुतायत में उगाया जाए, तो कोशी के जल में उसके फूल और पत्तियों के घुल-मिल जाने पर पूरे अंचल से मलेरिया का प्रकोप दूर हो जाएगा। डॉक्टर रायचौधुरी ने वराह क्षेत्र में यह प्रयोग किया और वह सफल रहा। मैला आंचल के प्रकाशन के बाद रेणु जी ने घर के सामने अनेक दुर्लभ पौधे खोजकर लगाए थे। अपने इलाके की बंजर जमीन पर पेड़ लगाने का सपना लेकर उन्होंने परती : परिकथा लिखी, जिसे उन्होंने अपने छोटे भाई को इन शब्दों में समर्पित किया, 'भैया महेन्दर, तुम नहीं रहे, तुम्हारी कल्पना साकार हुई है! सिमराहा की सपाट धरती पर हजारों पेड़ लग गए हैं।-भैया' महेन्द्र रेणु के सबसे छोटे भाई थे। कुशाग्र बुद्धि और प्रतिभाशाली! रेणु जी अपनी तरह-तरह की खोजपरक बातें उन्हें सुनाया करते थे। उनकी भी प्रबल इच्छा थी कि सिमराहा की सपाट धरती पर पेड़ लगें और हरियाली का आगमन हो! वर्ष 1950 में वह दिवंगत हो गए। चूंकि वह इस जगत को छोड़कर चले गए, इसलिए रेणु से भी वरिष्ठ हो गए। इसीलिए रेणु ने उन्हें भैया महेन्दर कहा। घर में सभी उसे महेन्द्र की जगह महेन्दर ही कहा करते थे और वह रेणु जी को सदैव भैया ही कहा करते थे। रेणु की खोज पूरी हुई। विरल वनस्पतियों की खोज में लगे रहने वाले रायचौधुरी ने जब रेणु के वनस्पतियों के ज्ञान को देखा, तो कहा था, तुम स्वयं एक विरल वनस्पति हो!
रेणु की रचनाशीलता में ज्ञान के इतने विविध विषय और रूप समाहित हैं कि उन्हें देखकर आश्चर्य होता है। पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, मछलियों, कुत्तों, कारों, मिट्टी, फसलों, कई-कई भाषाओं, मनुष्य के अनेकानेक रूपों और उनकी मानसिकताओं, शास्त्र और साहित्य की जातीय परंपरा आदि का उनका ज्ञान हतप्रभ कर देता है। संगीत, चित्रकला और कविता के वह मर्मज्ञ थे! इस मैले आंचल में एक ऐसे साधक को देखकर सहसा आश्चर्य होता है और आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक भी है।