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अम्मू की कहानी

Wed, 24 Jan 2018 07:12 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Wed, 24 Jan 2018 07:12 PM IST
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Story of Ammu
सुभा‌षिनी सहगल अली

26 जनवरी, 1950 के दिन देश में संविधान लागू किया गया। संविधान तैयार करने में बहुत समय लगा था। संविधान तैयार करने के लिए 425 सदस्यीय संविधान समिति का चुनाव किया गया था। इन सदस्यों में केवल 15 महिलाएं ही थीं, लेकिन उनमें से हरेक महिला अनोखी थी। उन सबने आजादी के आंदोलन में पुलिस की लाठी खाई थीं। उनमें से सभी महिलाओं के अधिकार, उनकी समानता और लैंगिक न्याय की जबर्दस्त पक्षधर थीं। संविधान समिति की हर बैठक में वे उपस्थित रहती थीं और हर बहस में आगे बढ़कर भाग लेती थीं। उन 15 महिलाओं में अम्मू स्वामीनाथन भी थीं।


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अम्मू का जन्म केरल के पालघाट जिले के आनकरा गांव के एक नायर परिवार में हुआ था। इसलिए वह अपनी मां के घर में ही पली-बढ़ी। सबसे छोटी होने के कारण वह बहुत लाडली थी। पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई। उनकी मां परिवार की मुखिया थी और उनके मजबूत व्यक्तित्व का असर अम्मू पर पड़ा। घर से दूर केवल लड़कों को पढ़ने भेजा जाता था, इसलिए अम्मू स्कूल नहीं गई। उन्हें घर पर ही मलयालम में थोड़ी बहुत शिक्षा ग्रहण करने का मौका मिला।

जब अम्मू तेरह साल की थी, तब मद्रास से स्वामीनाथन नाम के वकील उनके घर आए। बचपन में ही अम्मू के पिता ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उनकी मदद की थी। छात्रवृतियों के सहारे स्वामीनाथन को देश-विदेश में पढ़ने का मौका मिला और उन्होंने मद्रास में वकालत शुरू कर दी थी। जब उन्होंने घर बसाने की सोची, तो मदद करने वाले अम्मू के पिता को याद किया। स्वामीनाथन को आनकरा पहुंचने के बाद अम्मू के पिता के देहांत की खबर मिली। स्वामीनाथन ने अपना प्रस्ताव अम्मू की मां के सामने ही रख दिया-अगर उनकी कोई बेटी शादी के लायक हो, तो वह उससे शादी करने के लिए उत्सुक हैं। अम्मू की मां ने कहा, सबसे छोटी ही बची है, लेकिन वह तो बहुत चंचल स्वभाव की है। वह घर क्या संभालेगी?

स्वामीनाथन को अम्मू की बातें अच्छी लगीं और उन्होंने पूछ लिया, क्या तुम मुझसे शादी करोगी? अम्मू ने कहा, कर सकती हूं। पर मैं गांव में नहीं, शहर में रहूंगी। और मेरे आने-जाने के बारे में कोई कभी सवाल न पूछे। स्वामीनाथन ने सारी शर्तें मान लीं।

उस जमाने में किसी ब्राह्मण की शादी नायर महिला से नहीं होती थी, केवल संबंध संभव था। स्वामीनाथन संबंध जैसी महिला-विरोधी प्रथा के विरोधी थे। उसने अम्मू से शादी की और विलायत जाकर कोर्ट मैरिज भी की। ब्राह्मण समाज ने इसका विरोध किया।

अम्मू ने लैंगिक और जातिगत उत्पीड़न का हर स्तर पर विरोध किया। वह हमेशा मानती थी कि नायर एक पिछड़ी जाति है। उन्होंने चुनाव लड़ा और संविधान सभा की सदस्य चुनी गई। महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में उन्होंने हमेशा बात की। महिलाओं को समान कानूनी अधिकार दिलवाने के लिए डॉ. आंबेडकर के अथक प्रयासों के साथ खुद को उन्होंने पूरी ताकत के साथ जोड़ा। संविधान पारित होने के बाद भी वह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहीं। वह लोकसभा और राज्यसभा की सदस्य बनीं, साथ ही, स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत योगदान किया। यह अम्मू नामक महिला की नहीं, संभावनाओं की कहानी है। वे संभावनाएं, जो तमाम महिलाओं में दबकर बुझ जाती हैं। वे संभावनाएं, जिनको अनुकूल परिस्थितियां और वातावरण प्रतिभा, हुनर और बड़े योगदान करने की क्षमता में परिवर्तित करते हैं। और हां, अम्मू मेरी नानी भी थीं!

-माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य 

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