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आईना : सहृदय समाज में हिंसा क्यों, मानसिकता में बदलाव से ही संभव है इस पर विराम

Shyoraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Thu, 04 Jul 2024 06:55 AM IST
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सार
कानूनी संरक्षण प्राप्त होने के बावजूद सामाजिक मानसिकता में बदलाव नहीं होने से दलितों का उत्पीड़न होता है, जिस पर ध्यान देना होगा।
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Stopping violence is possible only with change in mentality in a compassionate society
पुलिस (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ANI

विस्तार

परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।'-यह अवधी के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास की पंक्ति है, लेकिन उनसे सदियों पूर्व आदिकवि वाल्मीकि के मुखारविंद से व्यक्त हुई थी पहली कविता। हालांकि वह उनकी आत्मपीड़ा की उपज नहीं थी। बहेलिया ने तो तीर ‘क्रौंच' पक्षी को मारा था, फिर कविवर क्यों कराह उठे थे? उन्हें कैसे बेचैनी हुई, जो श्लोक रचने लगे-'मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौंचमिथुनादेकं वधीः काममोहितम्॥' अर्थात-'हे निषाद, तुमने कामक्रीड़ा में रत क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से एक को मारा है। तुझे कभी प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी।'



ऐसी रचनात्मक सहृदयता दुनिया के कम ही समाजों में रही होगी, जो हमारे देश और समाज में रही है। परंतु आज क्रूरता/अनुदारता और परपीड़ा को सहज सामान्य मानकर हम मानवीय संवेदना को कितने युगों पीछे छोड़ चुके हैं, इसकी कोई चिंता किसी को होती दिखाई नहीं पड़ती है। जीव-जंतुओं, नदियों, पेड़ों-पक्षियों की पूजा करने वाला और चीटियां एवं चिड़ियों को चुगाने वाला, कन्याएं जिमाने वाला समाज परजाति प्रेम या परजाति हित के विरुद्ध इतना असहिष्णु कैसे हो जाता है? संसार की संपूर्ण मानव-सृष्टि अभेद है। सब मनुष्य नैसर्गिक रूप से एक ही जाति के हैं।


ईश्वर-कृत, कोई भेदभाव नहीं है, मनुष्य ने स्वयं प्रेम, सहयोग और सहानुभूति जैसे उदार भावों का अंत कर दिया है, जो रोजमर्रा की क्रूर और हिंसक घटनाओं से प्रकट हो रहा है। मसलन, ऑनर किलिंग (आन के लिए हत्या) के मामले में हरियाणा की हिसार पुलिस ने मीना और उसके पति तेजवीर की हत्या के जुर्म में मीना के भाई सचिन, जो बारहवीं कक्षा में कंप्यूटर शिक्षा ले रहा है और स्कूल छोड़ चुके उसके ममेरे भाई राहुल को गिरफ्तार किया है। ये दोनों इसी वर्ष मतदान करने योग्य हुए हैं। पोस्टमार्टम से पता चला है, इन्होंने पांच गोलियां तेजवीर को मारीं और दो बहन को। गौरतलब है कि 22 अप्रैल, 2024 को मीना ने परिवार की मर्जी के खिलाफ आर्य समाज मंदिर (गाजियाबाद) में तेजवीर से शादी की थी।

दादरी से भी ऐसी ही एक सनसनीखेज खबर आई कि एक दलित महिला का अंतिम संस्कार रोकने पर इलाके में तनाव की स्थिति पैदा हो गई। सूचना मिलने पर जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक आदि ने मौके पर पहुंच कर अंततः अंतिम संस्कार कराया। इससे पहले भी ऐसी घटनाएं हुई हैं और ये करुण-कहानियां किसी एक-दो गांव की नहीं हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में ऐसे दर्जनों गांव हैं, जहां दलितों के परंपरागत श्मशानों की जमीनों पर दबंगों ने कब्जा किया और गैर-दलितों के श्मशानों में उनके शवों का दाह-संस्कार रोक दिया गया।

अनुदारता, क्रूरता और असहिष्णुता की चपेट में सद्भाव और प्रेम-सौहार्द की चिंदियां उड़ती दिखाई पड़ती हैं। देववंद गंगदासपुर गांव में मजदूरी मांगने पर अनुसूचित जाति के एक युवक से पंचायत में उठक-बैठक लगवाने, जाति सूचक अपशब्दों का इस्तेमाल करने का मामला ‘भीम आर्मी' के कार्यकर्ताओं के सामने आया। इसी वर्ष चार जनवरी को एक खबर प्रकाशित हुई थी-‘वाराणसी में घर बुलाकर प्रेमी को पेड़ से बांधा, फिर पेट्रोल डाल कर जिंदा जलाया।' यह घटना चोलापुर थाना क्षेत्र के टिसौरा गांव की है।

इन मामलों में कानून अपना काम करेगा, लेकिन चिंता का विषय है कि हमारे सामाजिक सौहार्द और भाईचारे को क्या हो गया है। कमजोर, दलित लोग उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं। चार जनवरी को ही अमर उजाला में एक बड़ी खबर प्रकाशित हुई-‘जिलों में जाति आधारित भेदभाव पर केंद्र व 11 राज्यों को सुप्रीम नोटिस।' खबर में बताया गया था कि बंगाल की नियमावली में जाति के अनुसार, जेल में कामों का बंटवारा है। खाना-पकाने का काम प्रभावशाली जातियां करती हैं। सफाई का काम कुछ खास जातियां।

बेशक यह नहीं कह सकते कि पूरा समाज अनुदार है, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में अब भी अनुसूचित जातियों के प्रति सामंती अनुदारता कायम है। निश्चित रूप से उन्हें कानूनी संरक्षण प्राप्त है, लेकिन सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन अब भी नहीं आया है। इसलिए युगीन सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार कार्य उतने ही जरूरी हैं, जितने राजनीतिक उपाय।

-लेखक साहित्यकार एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर हैं।

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