सिर्फ बयानों से नहीं बनेगी बात

अजय साहनी Updated Wed, 23 Oct 2013 07:34 PM IST
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जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के नजदीक लगातार संघर्ष विराम का उल्लंघन हो रहा है और इधर हमारी तरफ से बयानों का सिलसिला चल पड़ा। यह एक रीत-सी हो गई है। इससे पहले भी कड़े से कड़े बयान दिए गए हैं, लेकिन लंबे दौर के बाद अब इस प्रक्रिया को महज औपचारिकता ही कहा जाता है। अगर केवल कड़ी प्रतिक्रिया से सीमा उल्लंघन और फायरिंग की घटनाएं रुक जातीं, तो इसका परिणाम दशकों पहले मिल गया होता। पिछले महीने ही दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की न्यूयॉर्क में मुलाकात हुई थी, जिसमें नियंत्रण रेखा पर शांति बहाल करने के लिए तंत्र बनाने पर सहमति हुई थी, मगर पाकिस्तान की ओर से गोलाबारी की जा रही है। इसके अलावा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अभी कश्मीर मसले को नए सिरे से उठाने की कोशिश की है। इस घटनाक्रम को पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में भी देखने की जरूरत है।
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कुछ लोगों का यह मानना है कि सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच चुके जनरल कयानी अपने मुल्क को उसी आबोहवा में छोड़ना चाहते हैं, जिसमें वह अभी जी रहा है। इससे सत्ता के एक केंद्र के रूप में वहां फौज का दबदबा बना रहता है। कुछ लोग गोलाबारी और घुसपैठ की कोशिशों को नवाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना के बीच की कश्मकश का नतीजा मान रहे हैं। सियासी हवाओं में और भी बातें होंगी, लेकिन हमें इन बातों में क्यों उलझना चाहिए? हमें सिर्फ एक बात याद रखनी चाहिए कि पड़ोस से भारत को दशकों से तंग किया जा रहा है। सीमा पार से हर तरह की घटनाओं के बाद यहां हम उसका विश्लेषण ही करते रहे हैं। यही टटोलते रहे हैं कि इस बार की घटना का अंजाम पाक सेना की तरफ से है या आतंकियों की साजिश है। भारत ने कभी ऐसा रुख नहीं दिखाया कि ऐसी घटनाओं के जवाब में हम कर क्या रहे हैं, और क्या करने वाले हैं। भारत में कोई भी सरकार रही हो, पाकिस्तान की उसकी नीति में कोई खास फर्क नहीं आया है। एनडीए के शासन के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कश्मीर से जब यह कहते हुए गरजे थे कि पाकिस्तान के साथ हम आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार हैं, तब उनके इस बयान को मीडिया ने बहुत गंभीरता से लिया था। तब यह माना जा रहा था कि एनडीए सरकार पाकिस्तान को किसी न किसी रूप में सबक सिखाने को तैयार है। मगर इसके अगले दिन ही वाजपेयी पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाने की बात कह रहे थे!
असल में देश में कोई भी सरकार हो, वह बेहद लचीला रुख लेकर चलती है। मगर इसके मायने यह नहीं कि युद्ध ही एकमात्र रास्ता है। पड़ोसी को साधने के कई तरीके होते हैं। हममें यह इच्छाशक्ति कभी नहीं दिखी। बार-बार यही कोशिश रही कि पाकिस्तान किसी तरह हमसे बात कर ले। अजीब नजारा है, वह सीमाओं पर गोलाबारी करता रहे, और हम उससे बातचीत का अनुनय करते रहें। कोई कह सकता है कि भारत की वोट बैंक की नीति के चलते पाकिस्तान को ठोस जवाब नहीं दिया जाता है। पर मेरा मानना है कि यह भी एक कारण होगा, पर मूल वजह हमारी कमजोरी है। पाकिस्तान के साथ हमारे संवाद राजनयिक स्तर पर प्रभावशाली नहीं रहे। कई बार हमने स्थिति को स्वयं जटिल बनाया। इससे उसे हमारे ऊपर हावी होने का भरपूर अवसर मिला। इस संदर्भ में गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के बयान पर गौर करना चाहिए, जिन्होंने घुसपैठ के लिए हाफिज सईद को जिम्मेदार बताया है। नियंत्रण रेखा पर हो रही गोलाबारी पाकिस्तानी फौज के बिना संभव नहीं है, मगर गृह मंत्री के बयान से पूरी दिशा ही बदल गई है। सवाल है कि अगर घुसपैठ कराने के पीछे हाफिज का ही हाथ है, तो हमारे गृह मंत्री हाथ पर हाथ रखकर क्यों बैठे हैं। उन्होंने अपने स्तर पर क्या कदम उठाए हैं? पहले भी कई बार हुआ है कि कोई घटना घटती है, और हमारे शीर्ष स्तर पर पाक हुकूमत को सहूलियत पहुंचाने वाले बयान आने लगते हैं।
इस बीच, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का आक्रामक बयान भी आया है। उन्होंने तल्ख होकर कहा है कि अब हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रहा जा सकता। उमर अब्दुल्ला ने पहले भी ऐसा बयान दिया है। लेकिन कश्मीर की सियासत में उनकी नीति भी ढुलमुल रही है। वह कभी सक्षम रूप से सामने नहीं आए। उमर अब्दुल्ला ने कह तो दिया कि संघर्ष विराम समझौते के उल्लघंन का माकूल जवाब दिया जाना चाहिए, लेकिन माकूल और मुंहतोड़ जवाब क्या होता है, इस पर वह शायद ही कोई टिप्पणी करेंगे।

इतिहास यही बता रहा है कि पड़ोसी देश बिल्कुल नहीं बदला है। सत्ता में आने के बाद नवाज शरीफ कुछ दिन भले ही भारत के प्रति खुशगवार दिखे हों, लेकिन वह फिर पाकिस्तान की पुरानी राह पर ही चल रहे हैं। हम पाकिस्तान के किए-कराए का विश्लेषण ही करते रहते हैं। सीमा पर तनाव कायम है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी नियंत्रण रेखा पर हो रही भड़काने वाली कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान को आड़े हाथों लिया है। पर जब तक सरकार की ओर से कोई ठोस पहल नहीं होगी, स्थिति नहीं बदलेगी। चाहे राष्ट्रपति के स्तर पर कोई संदेश दिया जा रहा हो या फिर किसी सियासी मकसद के लिए ही सही, उमर अब्दुल्ला सख्त रुख अपनाने की बात कहते हों, तो मान लेना चाहिए कि अब हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा जा सकता। असल में किसी स्तर पर कोई न कोई कदम तो उठाना ही चाहिए। ये मसले आने वाली पीढ़ी के लिए नहीं छोड़े जा सकते हैं।

(लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कंफ्लिक्ट मैनेजमेंट के कार्यकारी निदेशक हैं)
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